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दुनिया मेरे आगेः समझ की उम्र

बचपन से लेकर अब तक हम यही सुनते आए हैं कि बच्चे मन के सच्चे होते हैं, दिल से भोले होते हैं, थोड़े नासमझ होते हैं वगैरह। विद्यालय से भी अक्सर ऐसी शिकायतें आती रहती हैं कि बच्चे अपना काम जिम्मेदारी से नहीं कर रहे हैं, खेलने में ज्यादा मन लगाते हैं आदि।

दुनिया मेरे आगेः किसके सपने

अरसा पहले एक गीत में एक बच्चा अपनी मां से कहता था कि वह गोली चलाना सीखेगा, क्योंकि उसे लीडर नहीं, फौजी अफसर बनना है! कई बार इस गीत को युवा पीढ़ी के अराजनीतिकरण की ‘गर्हित’ कोशिशों से भी जोड़ा जाता था।

दुनिया मेरे आगेः असल जीवन का अक्स

अपने स्कूली जीवन के दौरान देखी हुई एक फिल्म याद आती है जिसमें अभिनेत्री रेखा पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं और अपराधियों से लोहा लेती हैं।

दुनिया मेरे आगेः सुबह की सभा

सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में यों तो विद्यालय का हर क्षण अति महत्त्वपूर्ण होता है, लेकिन ‘मॉर्निंग असेंबली’ यानी प्रार्थना सभा का वक्त इसलिए अधिक महत्त्व रखता है, क्योंकि इस समय समूचे विद्यालय को एक नजर में समेटा जा सकता है।

दुनिया मेरेे आगेः शिक्षा का समाज

पिता कहते थे कि शिक्षा प्राप्त कर लोगे तो सब पा जाओगे; मैं शिक्षा नहीं पा सका, इसलिए जीवन में कष्ट है। पिता के निधन के बाद कुछ धनोपार्जन के उद्देश्य से मैं एक जगह प्राइवेट ट्यूशन के लिए जाने लगी थी।

दुनिया मेरे आगेः भ्रम के विज्ञापन

क्या हम विज्ञापनों से जी रहे हैं? टीआरपी के हिसाब से चैनल अपने धारावाहिक और अन्य कार्यक्रमों के बारे में फैसला करते हैं। दर्शकों की पसंद और उनके मूल्यांकन का कितना महत्त्व है, यह सभी जानते हैं।

दुनिया मेरे आगेः एक और कप

सुहानी सुबह कब होती है? जब आंख खुलने से पहले दिल और आंख को इत्मीनान हो कि सपना पूरा हो चुका है, हमदम जाग चुका है (जिनके हमदम हैं), अखबार आ गया है और बिस्तर के पास वाली मेज पर है चाय!

दुनिया मेरे आगेः दोस्त बनाते रहिए

पड़ोसी एक ऐसा शब्द है, जिसका भूगोल संदर्भ के साथ बदलता रहता है। शहरीकरण की प्रक्रिया और आजीविका के लिए इस शहर से उस शहर की यात्रा में हमारे पड़ोसी भी बदलते रहते हैं।

दुनिया मेरे आगेः समाजीकरण के दायरे

एक लंबे अरसे से भारतीय समाज में कुछ ऐसा घटित हो रहा है जो सभी चेतनशील नागरिक को असहज बनाता है।

दुनिया मेरे आगेः गांव की हत्या

पिछले दिनों बिहार के कुछ गांवों में जाने का मौका मिला। एक गांव में तकरीबन बीस साल के बाद गया था। मेरे मन-मस्तिष्क में गांव की वही छवि बैठी थी, जब मैंने नब्बे के दशक में उसे देखा था।

दुनिया मेरे आगेः कठिन प्रश्नों की जड़ें

परीक्षाओं के इस मौसम में एक नया रुझान देखने को मिल रहा है। अध्यापक, माता-पिता, प्राचार्य और मीडिया के लोग परीक्षा भवन से बाहर आ रहे छात्रों की मुस्कान की चौड़ाई से, उनकी आंखों की लाली और उनमें बसे पानी की मात्रा से छात्र के प्रदर्शन को जांचने लगे हैं।

दुनिया मेरे आगेः चिठिया हो तो

आज ई-मेल और कूरियर के जमाने में भी डाकिये का महत्त्व कम नहीं हुआ है। अपने इस जीवन में तरह-तरह के डाकियों से काम पड़ा है। कुछ डाकिये निहायत ईमानदार, कर्तव्यपरायण और कुछ बिल्कुल विपरीत।

दुनिया मेरे आगेः शहर में शोकसभा

एक बड़ा आदमी मरा। कोई बड़ा यानी ऊंचे कद वाला आदमी मरता है तो शोकसभा आयोजित करना ‘स्टेटस सिंबल’ बन जाता है। बड़े आदमियों को श्रद्धांजलि देने के दो फायदे होते हैं।

दुनिया मेरे आगेः एक नई परवाज

भारतीय सशस्त्र बलों में युद्ध अभियान में शामिल होना महिलाओं का हमेशा एक सपना रहा है। इसके लिए उन्होंने एक लंबा संघर्ष किया है, तब जाकर उनके इस ख्वाब की ताबीर होने वाली है।

दुनिया मेरे आगेः नागरिक का दायित्व

कुछ दिन पहले सुबह छह बजे दिल्ली में गोल मार्केट से राजीव चौक मेट्रो स्टेशन तक पैदल ही चला आ रहा था। सोचा, सुबह-सुबह तो शहर यातायात की रेलमपेल और लोगों की भीड़भाड़ से मुक्त होकर शांत-सुंदर लग रहा होगा।

दुनिया मेरे आगेः होड़ के हवाले बच्चे

विश्वविद्यालय में शिक्षा हासिल करने के दिनों में वहां पास का बाजार अचानक खाली लगने लगता था, क्योंकि वहां आए दिन पहुंचने वाले शिक्षकों और उनके परिवारजनों की भीड़ आनी बंद हो जाती थी।

दुनिया मेरे आगेः दहलीज और दीवारें

शहरों-महानगरों में शांति और स्थिरता की खोज अपने आप में एक सपना हो चुका है। बल्कि यों कहें कि हर तरफ से भागते हुए दृश्य ही शहरों की खासियत और चेहरे हैं।

दुनिया मेरे आगेः मौसम की तरह बदलना

थोड़ी देर भी धूप में बैठने पर शीतल छांव की चाहत जाग उठती है, लेकिन छाया का स्निग्ध शीतल स्पर्श मिलने लगे तो धूप की गरमाहट याद आती है।