jansatta blog

प्रसंगवशः आत्मा पर जमी काई

जीवन में जो कुछ ऊबड़-खाबड़, असुंदर है, अन्यायसंगत है, साहित्य का धर्म उसकी आलोचना है। और आलोचना का धर्म यह देखना है कि साहित्य अपनी भूमिका निभा रहा है या नहीं। ऐसी आलोचना भी लिखी जा रही है, दिक्कत यह है कि उसे पढ़ा या सुना नहीं जा रहा है। क्योंकि उसे सुनना आत्मा पर जमी काई को खुरचने जैसा है।

बेबाक- बोलः आर-पार

मौलाना मसूद अजहर आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का सरगना है। जैश-ए-मोहम्मद भारत में हमलों के लिए बनाया गया आतंकवादी संगठन है। पाकिस्तानी अधिकारियों ने भारत में हुए पठानकोट हमले के बाद उसे हिरासत में लिया था। भारत ने मसूद को उसकी आतंकी गतिविधियों की वजह से उसे अपने सबसे वांक्षित आतंकवादियों की सूची में रखा हुआ है। मोहाली की विशेष एनआइए जांच अदालत ने पठानकोट वायुसेना हमले को लेकर उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है। इस वारंट को अंतरराष्टÑीय जांच संस्था इंटरपोल को भेजा गया है। एक और दो जनवरी की दरम्यानी रात को जैश के आतंकियों ने पठानकोट वायुसेना अड्डे पर हमला कर दिया था जिसमें सात सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए थे। आतंकवादियों और सुरक्षाबलों के बीच चली 80 घंटे की मुठभेड़ के बाद घटनास्थल से चार आतंकियों के शव बरामद किए गए थे।

बेबाक बोलः अहं, हिंसा और हम

तृप्त जानवर होने से बेहतर है अतृप्त इनसान बन कर रहना। दरअसल, इनसान और जानवर के बीच मूल फर्क यही है कि तृप्त रहने की प्रवृत्ति ने जानवर को जानवर बनाए रखा और नए और बेहतर की तलाश में भटकने वाली प्रवृत्ति ने दो पैरों वाले जानवर को इनसान बनाया।

रम्य रचनाः रेल में ओम शांति

एक समय था कि हवाई जहाज की आवाज आ जाए तो उसे आकाश में उड़ता देखने के लिए खाना छोड़ देते थे। वही समय था जब रेल के प्रथम श्रेणी के डिब्बों को उसी हसरत भरी निगाह से देखते थे, जैसे प्रेमिका को देखा करते थे।

बाखबरः भारत माता का पता

‘दुनिया का सबसे बड़ा डाटा बेस’ यानी ‘आधार कार्ड’ को अंतत: आधार मिल गया, फाइनेंस बिल की तरह आखिरकार पास हो गया। दो पाटन के बीच में मात्र आधार कार्ड रहा, जो साबुत बच गया, वरना जब आया तो भाजपा ने पीटा अब भाजपा लाई तो कांगे्रस खुद पीटने लगी।

नीतियों में खामी

अ तिथि के प्रति आदर का भाव भारतीय संस्कृति की मुख्य बातों में से एक है। आज के इस बाजारवादी युग में जब हर चीज हानि-लाभ के तराजू में तोली जाने लगी है, अतिथि सम्मान भी इससे अछूता नहीं रहा है।

पुस्तकायनः प्रहसन जैसे यथार्थ

पहले यथार्थ पर व्यंग्य करने के लिए प्रहसन लिखे जाते थे, फिर जब यथार्थ खुद प्रहसन जैसा हो गया तो नुक्कड़ नाटक लिखे जाने लगे। नुक्कड़ नाटक के व्यंग्य में प्रहसन की तरह वक्रता नहीं होती, वह बिल्कुल सीधा और दो टूक होता है।

स्त्री विमर्शः स्त्री और सामाजिकता

स्त्री के सामाजिक सरोकार महत्त्वपूर्ण न माने जाने के कारण, उसका श्रम भी महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाता। इस तरह उसे अपने कार्यों की स्वीकृति के साथ उनकी पहचान और महत्त्व की एक अतिरिक्त लड़ाई लड़नी पड़ती है। यह समाज के छोटे कामों से लेकर बड़े से बड़े काम तक फैला हुआ है।

बाखबरः देशभक्त बनाम देशद्रोही

जेएनयू क्रांतिकथा में ‘देशद्रोहियों’ के चार-चार वीडियो थे, आग में घी डालने का काम किया। वे हर चैनल पर बजते थे और नई उत्तेजना पैदा करते थे। न्यूज एक्स ने दिखाए, एबीपी ने दिखाए, टाइम्स नाउ ने दिखाए, सीएनएन आइबीएन ने दिखाए, सबने दिखाए।

तवलीन सिंह का कॉलम वक्त की नब्जः इस विरोध के पीछे

पटियाला हाउस में जो हुआ शर्मनाक जरूर है, लेकिन उन हादसों से इस देश को मेरी नजर में कोई खतरा नहीं है। खतरा है, उन नारों से जो जेएनयू में गूंजे थे और फिर जादवपुर विश्वविद्यालय में भी।

रम्य रचनाः बीमारी और दुनियादारी

आदमी तीमारदारी से तब तौबा करता है जब तीमारदारी खुद एक बीमारी बन जाती है। आदमी दुनियादार है तो आनंद और ज्यादा। तीन चीजें आपके सुकून को जुनून में बदल सकती हैं, बीमारी तीमारदारी दुनियादारी। दुनिया वालों का प्यार सबसे ज्यादा तब उमड़ता है जब आप बिस्तर की चौहद्दी में सीमित हों।

पी चिदंबरम का कॉलम दूसरी नजरः शायद हम सब राष्ट्र-विरोधी हैं

बाल गंगाधर तिलक ने कहा था ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’। उन पर देशद्रोह का मुकदमा चला। वह उस समय के शासकों के मुताबिक राष्ट्र-विरोधी थे।

बेबाक बोलः आह ताज!

सत्रहवीं शताब्दी में निर्मित वास्तुशिल्प के इस हैरतअंगेज शाहकार को लेकर कवियों-शायरों की कलम ने खुल कर अपना इजहारे-खयाल किया।

प्रगतिशीलता पर भारी परंपरा

26 जनवरी को जब सारा देश गणतंत्र दिवस की परेड देखने में मशगूल था तो देश की राजधानी से दूर महाराष्ट्र के अहमदनगर में लैंगिक समानता के लिए जंग छेड़ी गई।

रम्य रचनाः मोची भया उदास

मेरी चप्पल टूट गई थी। ‘पुरानी’ थी इसलिए टूट गई। नई चप्पल नहीं टूटती है। आजकल नया ब्रांड या मॉडल आने से नई चीज पुरानी हो जाती है, बदल ली जाती है।

दूसरी नजरः मेरा जन्म ही मेरी त्रासदी है

यह हमारे युग का एक चमत्कार है कि एक दलित, जो कि एक सुरक्षा गार्ड और एक सिलाई करने तथा सिखाने वाली का बेटा था, शिक्षा की सीढ़ियां चढ़ सका और एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधार्थी के रूप में दाखिल हुआ।

तवलीन सिंह का कॉलम वक्त की नब्ज़ः नौकरशाही पर नकेल की जरूरत

प्रधानमंत्री को भूलना नहीं चाहिए एक क्षण के लिए भी कि उनको जनादेश पूरी बहुमत के साथ मिला था परिवर्तन लाने के नाम पर। परिवर्तन हर तरह का, लेकिन विशेष तौर पर परिवर्तन की उम्मीद करते हैं इस देश के वासी प्रशासनिक तौर-तरीकों में, जो अभी तक दिख नहीं रहा है दूर तक।

बाखबरः चैनलों का शनि- जाप

जिन्हें समाज सुधार का आंदोलन चलाना हो वे अर्णवजी की शरण आएं। जिनको ऊंची बौद्धिक गप मारनी हो, वे एनडीटीवी की निधिजी को देखें और जिनको फ्रांसीसी राजदूत से फ्रांस की नीति पर चर्चा करनी हो वे करण थापर के इंडिया टीवी को देखें।

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