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राजनीतिः इलाज को तरसते गांव

देश के अस्पतालों में चौदह लाख से ज्यादा डॉक्टरों की कमी है जबकि हर साल करीब साढ़े पांच हजार डॉक्टर ही मेडिकल कॉलेजों से तैयार हो पाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक डॉक्टर-मरीज का अनुपात मानक एक हजार तय है यानी हजार लोगों पर एक डॉक्टर। लेकिन हमारे यहां यह अनुपात बेमानी है। ग्रामीण क्षेत्र में तो यह आंकड़ा और भी कम हो जाता है।

दुनिया मेरे आगेः कौशल के साथ कला

किसी भी व्यक्ति के भीतर मौजूद यही कलाकार एक तरह से उसकी एक ऐसी पूरक ऊर्जा है जो उसे हर तरह की परिस्थिति में संघर्षों से मुकाबला करने की शक्ति देने का काम करती है। काम को खूबसूरत तरीके से करने का हुनर और परिणाम को बेहतर बनाने में सहयोग करती है।

दुनिया मेरे आगेः मां कह एक कहानी

श्रीप्रकाश शर्मा कोई शिशु जब पहली बार अपनी तोतली आवाज में ‘मां’ बोलता है तो उसकी अनुभूति अनायास ही दिल की गहराई को छू जाती है और इसके एहसास में स्त्री की सार्थकता और मातृत्व का सुख साकार हो उठता है। कालांतर में जब वह शिशु बड़ा हो जाता है और वह चाहे कितनी ही […]

राजनीतिः भाषागत भेदभाव का संकट

प्रश्न यह है कि जब आधे से अधिक लोग हिंदी को अपनी प्राथमिक भाषा के रूप में प्रयोग में लाते हैं, विभिन्न परीक्षाओं में भी इसी माध्यम से सम्मिलित होते हैं, सिविल सेवा परीक्षा भी इसी माध्यम का चयन करके देते हैं तो उनकी सफलता दर आनुपातिक रूप से इतनी कम क्यों है?

राजनीतिः अस्तित्व का संकट और चुनौतियां

बीसवीं शताब्दी की एक खास विशेषता यह है कि इस शताब्दी के अंत तक पंहुचते-पहुंचते अनेक मानव निर्मित कारणों से ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो चुकी हैं जिनसे पृथ्वी पर मानव जीवन व अनेक अन्य तरह के जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। मनुष्य ने अपने कार्यों से अपने अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया और साथ ही बेकसूर जीवों के अस्तित्व को भी।

दुनिया मेरे आगेः आदृश्य तस्वीरें

मेरा यह मानना कि सभी समझदार और जिम्मेदार अभिभावकों और शिक्षकों ने बच्चों को अच्छे और बुरे के खेल में फंसा कर अपनी तमाम जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया है, ताकि उन्हें बच्चों की समस्या को सुलझाने में खुद दिमागी मशक्कत नहीं करनी पड़े।

दुनिया मेरे आगेः परिधि में स्त्री

राजकुमारी लिखती हैं- यों तो समूची दुनिया में अलग-अलग शक्ल में स्थिति बहुत अलग नहीं है, लेकिन खासतौर पर भारत की महिलाएं एक तरह से मूक नेत्री रही हैं। पितृसत्तात्मक व्यवस्था और मानसिकता ने जो संस्कारों की घुट्टी पिला कर उन्हें पोषित किया, उसी में रच-बस कर उसी तरह जीना।

राजनीतिः धरती बचाने की चुनौती

पृथ्वी के तापमान को स्थिर रखने और कार्बन उत्सर्जन के प्रभाव को कम करने के लिए कंक्रीट के जंगलों के विस्तार और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर नियंत्रण की जरूरत है। जंगल और वृक्षों का दायरा बढ़ाना होगा। पेड़ और हरियाली ही धरती पर जीवन के मूलाधार हैं। वनों को धरती का फेफड़ा कहा जाता है। धरती पर प्राणवायु ऑक्सीजन से लेकर जरूरी भोजन इसी से मिलता है।

संपादकीयः जानलेवा धागे

इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि किसी का मनोरंजन या खेल दूसरों की जान लेने वाला साबित होने लगे। पिछले कुछ सालों के दौरान पतंग के मांझे वाले धागे की वजह से लोगों की जान जाने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

संपादकीयः फर्जी पर पाबंदी

आज सूचना माध्यमों के विस्तार के दौर में निश्चित रूप से सोशल मीडिया का अपना महत्त्व है और इसका सकारात्मक इस्तेमाल लोगों को ज्ञान के स्तर पर समृद्ध कर सकता है।

आधी आवादी का सवाल

हमारे देश में सबसे ज्यादा बदलाव की दरकार समाज में मौजूद परंपराओं, रूढ़ियों और भेदभाव भरी मानसिकता की जकड़न को लेकर है। बेटे और बेटी में किए जाने वाले भेद की मानसिकता के चलते आज भी दूर-दराज के गांवों में बेटियों की शिक्षा और स्वास्थ्य को महत्त्व नहीं दिया जाता। आज भी हमारे परिवारों में महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा को व्यवस्थागत समर्थन मिलता है।

द लास्‍ट कोच: अति सुधो सनेह को मारग है

मैं प्लेटफार्म नंबर तीन के अंतिम छोर पर पहुंच गया हूं। यहां एक युगल ने बरबस ध्यान खींच लिया है। वे इस तरह सट कर खड़े हैं जैसे कोई दो फूल एक दूसरे से गुंथे हों। युवक के सीने में दुबकी घुंघराले बालों वाली इस लड़की का चेहरा नहीं दिख रहा। नाक तक झुक आए युवक के चश्मे को सरकाते हुए उसने जैसे कुछ कहा है उससे। तभी उसके ललाट को मित्र ने चूम लिया है।

दुनिया मेरे आगेः समझ की उम्र

बचपन से लेकर अब तक हम यही सुनते आए हैं कि बच्चे मन के सच्चे होते हैं, दिल से भोले होते हैं, थोड़े नासमझ होते हैं वगैरह। विद्यालय से भी अक्सर ऐसी शिकायतें आती रहती हैं कि बच्चे अपना काम जिम्मेदारी से नहीं कर रहे हैं, खेलने में ज्यादा मन लगाते हैं आदि।

पर्यावरण की कसौटी पर

अमेरिका, दुनिया का नबंर एक प्रदूषक है, तो चीन नंबर दो। फिर भी भारत, उपभोगवादी चीन और अमेरिका जैसा बनना चाहता है। क्यों?

राजनीतिः संध्या वेला की दुश्वारियां

बेटे-बेटियों-दामादों-बहुओं को यह समझना होगा कि वे भी कभी बुजुर्ग होंगे और जो व्यवहार आपके बच्चे आपके माता-पिता के साथ होते देख रहे हैंं वे भी आपके साथ वैसा ही करेंगे। यह विचार भी फैलाने की आवश्यकता है कि जिन्होंने अपने घर के बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार किया उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

दुनिया मेरे आगेः किसके सपने

अरसा पहले एक गीत में एक बच्चा अपनी मां से कहता था कि वह गोली चलाना सीखेगा, क्योंकि उसे लीडर नहीं, फौजी अफसर बनना है! कई बार इस गीत को युवा पीढ़ी के अराजनीतिकरण की ‘गर्हित’ कोशिशों से भी जोड़ा जाता था।

संपादकीयः रोजगार का आधार

पूंजीगत सामान की खपत को अमूमन नए निवेश का सूचक माना जाता है। राजग सरकार के दो साल में कई बार औद्योगिक उत्पादन में ठहराव के आंकड़े आए, वही हाल पूंजीगत सामान की खपत का भी रहा।

दुनिया मेरे आगेः असल जीवन का अक्स

अपने स्कूली जीवन के दौरान देखी हुई एक फिल्म याद आती है जिसमें अभिनेत्री रेखा पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं और अपराधियों से लोहा लेती हैं।

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