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सिस्टम का सर्कसः भूखे की मौत पर अनाज की बोरियां और गीतकार के निधन पर ‘रुकी पेंशन’

93 साल के वयोवृद्ध गीतकार, जिनके हाथ-पैर सही से काम न कर रहे हों, जो दिल में इच्छा मृत्यु की चाहत रखते हों, जिन्हें घर के एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाने में भी असहनीय वेदना होती हो, वह गोपाल दास नीरज अगर अलीगढ़ से 350 किलोमीटर दूर लखनऊ, वो भी तेज गर्मी के मौसम में अगर जाने को मजबूर हुए तो समझा जा सकता है कि यश भारती की रुकी पेंशन की उन्हें कितनी दरकार थी।

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कवि नीरज ने डीएम को लिखा था खत, मांगी थी मरने की इजाजत

डीएम ने कहा, “11 जुलाई को भेजे गये इस पत्र को रजिस्टर्ज डाक से भेजा गया था, यह पत्र हमलोगों को 16 जुलाई को मिला था, उसी दिन नीरज जी आगरा चले गये थे। फिर भी सीएमओ क को निर्देश दिये गये थे, और उन्हें उनका तुरंत इलाज करने को कहा गया था।”

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गोपाल दास नीरज: छह साल में ही हुए अनाथ, यमुना में गोते लगा बीनते थे सिक्के, देव आनंद लेकर आए थे बंबई

काफी पहले उन्होंने एक गीत लिखा था- ‘अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए, जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए…’कह सकते हैं कि ये गीत वो आज के वक्त के लिए लिख रहे थे। नफरत के इस दौर में उनकी ये गीत काफी दुरुस्त बैठती है। इटावा के पुरवाली गांव में जन्में गोपाल दास सक्सेना ‘नीरज’ के जिंदगी की कहानी दमदार मोड़ और रोमांचक पड़ाव लिये हुए हैं।

साहित्यकारों का सियासत करना दुखद : नीरज

कवि और गीतकार गोपालदास ‘नीरज’ ने देश में ‘बढ़ती असहिष्णुता’ के विरोध में साहित्यकारों द्वारा अपने सम्मान लौटाए जाने पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदीबों का यों सियासत करना बेहद दुखद है..