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Editorial. Jansatta Editorial

राजनीतिः भाषागत भेदभाव का संकट

प्रश्न यह है कि जब आधे से अधिक लोग हिंदी को अपनी प्राथमिक भाषा के रूप में प्रयोग में लाते हैं, विभिन्न परीक्षाओं में भी इसी माध्यम से सम्मिलित होते हैं, सिविल सेवा परीक्षा भी इसी माध्यम का चयन करके देते हैं तो उनकी सफलता दर आनुपातिक रूप से इतनी कम क्यों है?

संपादकीयः अभाव की चिकित्सा

किसी भी देश में विकास की कसौटी यह होगी कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मामले में कहां खड़ा है। जहां तक हमारे देश का सवाल है, हम इन तीनों ही क्षेत्रों में अभी बहुत अच्छी स्थिति में होने का दावा नहीं कर सकते।

संपादकीयः शिक्षक का काम

देश भर में शिक्षा की सूरत पर होने वाली बहसों में यह सवाल सबसे प्रमुख रूप से उठता है कि चूंकि शिक्षकों को कई बार शिक्षकेतर कार्यों में उलझा दिया जाता है, इसलिए कक्षाओं की पढ़ाई-लिखाई प्रभावित होती है।

दुनिया में दक्षिणपंथ का उभार

आधुनिक प्रगतिशील युग में कई देशों में धुर दक्षिणपंथी राजनेता अपनी विभाजनकारी नीतियों के बल पर बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं और उनके दल सत्ता पर काबिज भी हो रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा संकट अल्पसंख्यक धार्मिक, नस्लीय और जातीय समूहों के सामने उठ खड़ा हुआ है।

चौपाल: विधिक साक्षरता

विधिक ज्ञान से वंचित व्यक्ति कानून से डर कर उससे दूर भागता है। विधिक सेवा कार्यक्रमों और विधिक सेवा प्राधिकरण के जरिए आम जन को जागरूक बना कर उनका सशक्तीकरण किया जा सकता है। कानूनी प्रक्रियाओं के प्रति उनके भय को मिटा कर उन्हें विश्वास दिलाया जा सकता है कि तमाम तरह के कानून आम जनता के जीवन को सुगम बनाने के लिए बनाए गए हैं न कि उसे परेशान करने के लिए।

दुनिया मेरे आगे: सुविधा का सफर

वे दिन बहुत पीछे चले गए हैं, जब शहरों कस्बों में इक्के-तांगे दौड़ते थे और साइकिलों पर बड़े-बड़े डॉक्टर इंजीनियर भी शान से बैठे हुए मिल जाते थे। वाहनों की इस भीड़ में साइकिल अभी है, लेकिन अब उसे वह प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं है, जो एक जमाने में प्राप्त थी। इसका एक कारण तो यह है कि तब साइकिल भी ‘दुर्लभ’ हुआ करती थी। उसे एक स्टेटस सहज ही प्राप्त था, जो आज की कई महंगी गाड़ियों की तरह था।

राजनीति: बेसहारा वृद्धों की सुध

पहले वृद्धाश्रमों को हमारे समाज में बहुत नकारात्मक भाव से देखा जाता था और कुछ रूढ़िवादी लोगों का मानना था कि इनके खुलने से पुत्र-पुत्रियां अपनी जिम्मेदारियों से और ज्यादा भागेंगे। तब वृद्धों के साथ संवेदनहीनता की ऐसी स्थितियां नहीं थीं। शहरी मध्यवर्ग की लालसाओं का विकराल रूप भूमंडलीकरण के बाद अधिक मुखरित हुआ है। जब समस्याएं बढ़ीं तो धीरे-धीरे उनकी स्वीकार्यता भी बढ़ी और आज की स्थितियों को देखते हुए वृद्धाश्रम वृद्धों को जरूरी भी लगने लगे।

संपादकीय: लापरवाही और हादसे

आजकल महंगी गाड़ियों को सड़कों पर तेज रफ्तार में चलाना एक फैशन की तरह देखा जाता है। सड़क पर तेज गति से चलते वाहन एक तरह से हत्या के हथियार होते हैं। सुप्रीम कोर्ट भी इस पर तल्ख टिप्पणी कर चुका है कि ड्राइविंग लाइसेंस किसी को मार डालने के लिए नहीं दिए जाते। बेलगाम वाहन चलाने के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि हादसों से संबंधित कानूनी प्रावधान अभी इस कदर कमजोर हैं कि किसी की लापरवाही की वजह से दो-चार या ज्यादा लोगों की जान चली जाती है और आरोपी को कई बार थाने से ही छोड़ दिया जाता है।

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संपादकीय: महंगाई की मार

थोक और खुदरा वस्तुओं की कीमतों में अंतर के पीछे एक बड़ी वजह यह है कि आयात और निर्यात नीति पर संतुलित तरीके से ध्यान नहीं दिया गया। मसलन, इस साल दालों का उत्पादन जरूरत से कहीं अधिक हुआ, पर उनका निर्यात बढ़ाने के बजाय दूसरे देशों से करार के मुताबिक दालों का आयात किया गया।

चौपाल: मुसीबत की थैली

सच यह है कि सरकारें जितना कर रही हैं, उससे ज्यादा आम जनता को भी जागरूक होने की जरूरत है। इसके लिए सरकार को भी जन जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। प्लास्टिक थैलियों का निपटान अगर सही ढंग से नहीं किया जाता है तो वह नालियों में जाकर जमा हो जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि ये नालियों में रुकावट पैदा कर पर्यावरण को हानिकारक बना देती हैं।

दुनिया मेरे आगे: संस्कृति और सरोकार

जहां बिहार की एक अन्य ध्रुपद शैली बेतिया घराने की परंपरा सिमट रही है, वहीं दरभंगा घराने के युवा कलाकार देश-विदेश में एक बार फिर से अपनी छाप छोड़ रहे हैं। गौरतलब है कि दरभंगा ध्रुपद घराने के संगीतकार खुद को तानसेन की परंपरा से जोड़ते हैं।

राजनीति: इंसानी लालच की भेंट चढ़ती कुदरत

संसाधनों पर बोझ बढ़ने और जीव-जंतुओं के खात्मे की आशंका के तीन प्रमुख कारण हैं। एक, बढ़ती आबादी के उपभोग के मद्देनजर उनका तेज दोहन। दो, इंसान द्वारा संसाधनों की कमी की पूर्ति का कोई उपाय न करना, जैसे काटे गए जंगलों के स्थान पर नए वृक्ष नहीं लगाना और तीन, प्रकृति को भी संसाधनों की भरपाई का समय नहीं देना।

संपादकीय: शाहखर्ची के नुमाइंदे

मध्यप्रदेश में आरटीआइ यानी सूचना के अधिकार कानून के तहत हासिल एक जानकारी के तहत विधायकों के वेतन-भत्तों के बारे में जिस तरह के ब्योरे सामने आए हैं, वे यह बताने के लिए काफी हैं कि इन नेताओं पर खर्च करने के मामले में सरकार ने किस तरह उदारता दिखाई। विडंबना है कि इसी तरह की उदारता राज्य के विकास के अनिवार्य पहलुओं को लेकर नहीं दिखाई देती।

संपादकीय: सहयोग का सिलसिला

आसियान देशों का आर्थिक रूप से मजबूत होना चीन के लिए बड़ी चुनौती है। अभी तक विश्व बाजार के बड़े हिस्से पर चीन का कब्जा है। आसियान देशों का परस्पर कारोबारी संबंध प्रगाढ़ होने और तकनीक के जरिए एक-दूसरे देश की कंपनियों और वित्तीय संस्थाओं के जुड़ने से बहुत सारे मामलों में चीन पर से निर्भरता खत्म होगी। फिर हिंद-प्रशांत क्षेत्र को मुक्त रखने से चीन का सैन्य दबदबा समाप्त होगा।

चौपाल: संकल्प की जरूरत

कैंसर का जिक्र आते ही उन लोगों की रग-रग थर्राने लगती है जो स्वास्थ्य को लेकर जागरूक हैं या उसके मामले में थोड़े-बहुत भी सयाने हैं। हममें से हरेक ने कभी न कभी किसी जानकार को इस खौफनाक समझी जाने वाली बीमारी से जूझते देखा होगा। लेकिन क्या कैंसर सचमुच उतना खतरनाक है जितना उसे समझ जाता है या कैंसर के दुखद अनुभव के लिए हम ही जिम्मेदार हैं कि हमने इस बीमारी को बड़ा हौवा बना लिया है!

दुनिया मेरे आगे: हंसी और मजाक

दरअसल, हमने अब खुद से किसी बात पर कम और दूसरों पर हंसना ज्यादा शुरू कर दिया है। पहले कहा जाता था कि आदमी वह है जो अपने ऊपर भी हंस ले, दूसरों का मजाक उड़ाए तो अपने को भी न बख्शे। हंसने की स्वाभाविक क्रिया तब तक रहती है, जब तक बच्चे ने स्कूल जाना शुरू नहीं किया।

राजनीति: बचपन के अंधेरे तहखाने

बहुत अफसोसनाक है कि पिछले कुछ दिनों से देश में बच्चों के शोषण के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। उनका मानसिक-शारीरिक ही नहीं बल्कि यौन शोषण भी हो रहा है। इस शोषण के शिकार लड़कियां-लड़के दोनों हैं। कई मामलों में यह शोषण उनकी हत्या तक पहुंच जाता है। बच्चों का शिकार करने वाले और कोई नहीं, अधिकांश मामलों में उनके परिवार के सदस्य, पड़ोसी और नाते-रिश्तेदार होते हैं। आखिर बच्चे किन पर विश्वास करें और कहां जाएं?

संपादकीय: अनदेखी का रोग

यह आंकड़ा किसी भी देश और वहां की सरकारों के लिए व्यापक चिंता का विषय होना चाहिए। लेकिन हमारे देश में इस तरह के सवालों की अनदेखी करना या उनके प्रति अगंभीर बने रहना एक रिवायत-सी हो गई है। विडंबना यह भी है कि अगर किसी बीमारी की चपेट में आकर जान गंवाने वालों की संख्या तेजी से नहीं बढ़ती है तो वह मुख्य चिंता की वजह भी नहीं बन पाती।