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Editorial

दुनिया मेरे आगे: मन हुनरमंद है

मन की सेहत एक जरूरी आदत होनी चाहिए, वैसे ही जैसे भूख लगने पर पेट की आग शांत करना। मन को रसमय रखना बहुत बड़ी बात है। संसार की चकाचौंध और भागमभाग के बीच मन की हर धड़कन को बोझिल होने से बचाए रखना है।

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राजनीति: लपटों से निकलते सवाल

दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में पिछले एक-दो साल में जितने बड़े अग्निकांड हुए हैं उनसे यही साबित हुआ है कि चंद लापरवाहियों के चलते हम आग के आगे बेहद लाचार बन गए हैं। मर्ज आग की ताकत बढ़ जाना नहीं, बल्कि यह है कि आग से सुरक्षा के जितने उपाय जरूरी हैं, शहरीकरण की आंधी और अनियोजित विकास-नियोजन की नीतियों ने उन उपायों को हाशिये पर धकेल दिया है।

संपादकीय: अवरुद्ध सूचनाएं

यह अकारण नहीं है कि पिछले साढ़े चार-पांच सालों में सूचनाधिकार के तहत मांगी और प्राप्त की जाने वाली सूचनाओं की दर काफी कम हो गई है। अब तो कई बार स्थिति यह भी देखी जाती है कि इस कानून के तहत मांगी गई जानकारी को संबंधित विभाग यह कह कर ठुकरा देते हैं कि गोपनीयता के चलते वह जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती।

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संपादकीय: चीन का दोहरापन

हैरान करने वाली बात यह है कि एक तरफ तो चीन भारत के साथ दोस्ती का दम भरता है और दूसरी ओर भारत के कट्टर दुश्मन मसूद अजहर को वह आतंकवादी मानने को तैयार नहीं है। हालांकि पुलवामा हमले की चीन ने निंदा की है, लेकिन यह उसका ढोंग भर है।

दुनिया मेरे आगे: घर की तलाश

नोटबंदी के बाद मकानों के दाम नीचे आने की खबर से अपने हौसले बुलंद हुए। कुछ प्रॉपर्टी एजेंट हमारा बजट सुनते ही कहते, इस बजट में इस इलाके में नहीं मिलेगा! एक प्रॉपर्टी एजेंट से फोन पर बात हुई। हम पति-पत्नी उसके ‘दफ्तर’ पहुंचे। छोटी-सी जगह में छह लोग बैठे थे। हमारा छोटा-सा इंटरव्यू लिया उन्होंने।

राजनीति: खाली हाथ किसान

केंद्र सरकार से उम्मीद थी कि राज्यों के मुकाबले बेहतर आर्थिक स्थिति के कारण किसानों के लिए ठोस सहायता राशि का इंतजाम करेगी। जितनी जमीन पर केंद्र सरकार ने छह हजार रुपए की सालाना सहायता राशि देने की घोषणा की है, उतनी ही जमीन पर तेलंगाना सरकार चालीस हजार रुपए दे रही है। तेलंगाना सरकार रयथू बंधु योजना के तहत राज्य के किसानों को प्रति एकड़ आठ हजार रुपए सलाना दे रही है और इससे तेलंगाना के अट्ठावन लाख किसानों को लाभ मिल रहा है।

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संपादकीय: विवाद और समाधान

दिल्ली सरकार शुरू से ही यह दलील देती रही है कि एसीबी उसके अधिकार क्षेत्र में होना चाहिए, ताकि वह भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई कर सके। लेकिन अदालत ने साफ कर दिया है कि एसीबी दिल्ली सरकार का हिस्सा तो है लेकिन उस पर नियंत्रण उपराज्यपाल का ही होगा।

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संपादकीय: दहशतगर्दी का दायरा

उनके ठिकानों की पहचान हो चुकी है और सब जगह सुरक्षा के कड़े इंतजाम हैं। नागरिक ठिकानों में उन्हें पनाह पाने की जगहें कम रह गई हैं। सुरक्षाबलों के तलाशी अभियान के दौरान अब स्थानीय लोग पहले की तरह उनकी ढाल बन कर नहीं खड़े होते।

दुनिया मेरे आगे: उद्देश्य की ताकत

हमारे जीवन की कथा यही है कि हम जाना कहीं और चाहते हैं, लेकिन रेलगाड़ी कोई दूसरी दिशा पकड़ लेती है। आमतौर पर हम अपनी गलती के लिए दोषी किसी और परिस्थिति को ठहरा देते हैं। अगर हमारा उद्देश्य स्पष्ट होता तो कोई वजह नहीं कि हम सफल नहीं होते।

राजनीति: स्मार्ट सिटी और अतिक्रमण

बढ़ती जनसंख्या, आबादी का महानगरों व बड़े शहरों में बढ़ता केंद्रीकरण और वर्षों से चली आ रही विकास संबंधी नियोजनहीनता के कारण शहरों और गांवों, सभी स्थानों पर अतिक्रमण बढ़ रहा है। अनियोजित शहरों में आबादी के भार से अतिक्रमण, अराजकता, अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, अवैध सामाजिक-आर्थिक व्यवहार बढ़ रहा है। अनुचित योजना से बसाए गए शहरों में अवैध रूप से रह रहे अप्रवासी जनसंख्या को पहचानना भी कठिन जान पड़ रहा है।

संपादकीय: हिंसा की सियासत

अगर अखिलेश यादव को विश्वविद्यालय के किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेना था, तो इस तरह उनके पार्टी कार्यकर्ताओं का हुजूम वहां क्यों जमा हुआ था। वे अकेले जाते, अपनी बात कहते और लौट आते।

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संपादकीय: सजा और संदेश

शर्मा के तबादले जैसा कदम उठा कर राव ने न सिर्फ विवेकहीनता का परिचय दिया, बल्कि उससे एक पुलिस अधिकारी के उस दंभ को भी प्रकट किया, जिसमें अपने को अदालत से ऊपर मान कर चलने की दुष्प्रवृत्ति झलकती है।

दुनिया मेरे आगे: अनुभवों की राजनीति

जीवन में परिश्रम करने के दौरान कष्ट सहने के बाद ही अनुभव हासिल होते हैं। अनुभव जीवन की सर्वोच्च पूंजी है, यदि उन्हें हम समयानुरूप खर्च करें तो वह और भी बढ़ती जाती है। कबीर दास जी ने कहा भी है कि- ‘आतम अनुभव ज्ञान की, जो कोई पूछै बात। सो गूंगा गुड़ खाई कै, कहे कौन मुख स्वाद।।’

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राजनीति: कृषि के लिए निर्यात जरूरी

उत्पादन में कई देशों से बहुत आगे होते हुए भी निर्यात में हम पीछे हैं। इसका मुख्य कारण है हमारी निर्यात होने वाली वस्तुओं में विविधता की कमी और ज्यादा कीमत वाले उत्पादों का निर्यात कम होना। मसलन, वैश्विक बाजार में इस समय कृषि उत्पादों में सबसे ज्यादा मांग सब्जियों और फूलों की है। हमारे कुल कृषि निर्यात में ऊंची कीमत वाले उत्पादों का हिस्सा सिर्फ पंद्रह फीसद है, जबकि निर्यात का बावन फीसद हिस्सा गेहंू, चावल और समुद्री उत्पादों का है जिनकी वैश्विक बाजार में आपूर्ति हद से ज्यादा है और कीमत बहुत ही कम।

संपादकीय: आग के ठिकाने

कायदे से व्यावसायिक और सार्वजनिक भवनों में अग्निशमन, भूकम्प आदि स्थितियों से निपटने संबंधी इंतजामों की नियमित जांच होनी चाहिए। उसी के अनुसार उनका लाइसेंस नवीकृत किया जाता है। अगर करोलबाग वाले होटल की संजीदगी से जांच की गई होती, तो शायद इतना बड़ा हादसा नहीं हो पाया होता।

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संपादकीय: संदेश और चुनौतियां

लखनऊ में कांग्रेस के पहले रोड शो से निश्चित तौर पर दूसरे दल सकते में होंगे। किसी भी दल को कांग्रेस के ऐसे आगाज की उम्मीद नहीं रही होगी। प्रियंका के काफिले ने पंद्रह किलोमीटर लंबा रास्ता तय किया और उनकी झलक पाने के लिए लोग सड़क के दोनों ओर खड़े रहे।

दुनिया मेरे आगे: साहित्य का जीवन

पुस्तकालयों की स्थिति छोटे शहरों में दयनीय है। स्कूलों में तो अब पुस्तकालय अध्यक्ष के पद ही समाप्त किए जा रहे हैं। युवा पीढ़ी को लक्षित करके ‘पल्प साहित्य’ में जो परोसा जा रहा है, वह मात्र युवाओं की मानसिकता को भांप कर लिखी गई कहानियां हैं, जिनमें कुछ उनके संघर्ष तो कुछ रोमांस का तड़का…

राजनीति: बोडो आतंक की चुनौती

बोडोलैंड की मांग उभरने का प्रमुख कारण असम के आदिवासी क्षेत्रों में अन्य इलाकों से आकर बसने वालों और घुसपैठ को माना जाता है। दरअसल, असम में 1947 से ही घुसपैठियों की आवाजाही रही जो 1971 में बड़े पैमाने पर बढ़ गई। भारत की विभिन्न सरकारें इसे लगातार नजरअंदाज करती रहीं और इस कारण समूचा उत्तर-पूर्व अलगाव और आतंकवाद का केंद्र बन गया।