Debt Crisis

राजनीति: कर्ज का बढ़ता मर्ज

भारत में आर्थिक समस्या से पार पाने के लिए वर्तमान परिस्थितियों से हट कर पिछले दो वर्ष से चली आ रही आर्थिक सुस्ती को आधार बनाया जाना चाहिए। इस बात पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि देश में वर्तमान समय के आर्थिक संकट से पहले ही एक बड़ी मांग-आधारित आर्थिक सुस्ती आ चुकी थी और देश अब आपूर्ति-आधारित आर्थिक सुस्ती का भी सामना कर रहा है।

भारत पर कर्ज बढ़कर हुआ 88.18 लाख करोड़ रुपये, पिछले साल की पहली तिमाही से 4% का उछाल

आर्थिक मामलों के पब्लिक डेब्ट मैनेजमेंट सेल के मुताबिक जून 2019 के अंत तक सरकार की कुल बकाया देनदारी में लोक ऋण की हिस्सेदारी 89.4 प्रतिशत रही है।

बैंकों की गिरती सेहत

आज देश के बैंकों का एनपीए अरबों-खरबों में है और वे अपने बड़े बकाएदारों का कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे हैं

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