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चौपाल: व्यूह के विरुद्ध

पूर्वी लद्दाख में जिस तरह चीन ने हिमाकत की और अपनी गलती मानने के बजाय भारत पर सीनाजोरी का आरोप लगाया, वह आपत्तिजनक है।

संपादकीय: चीन को दो टूक

चीन जिस तरह से भारत व अपने अन्य पड़ोसी देशों की सीमाओं में घुसपैठ, अतिक्रमण कर उन्हें विवादित बनाने और उनकी संप्रभुता को चुनौती देने की रणनीति पर चलता रहा है, वही टकराव का बड़ा कारण है। अगर सभी देश एक दूसरे की संप्रभुता की रक्षा करें तो ऐसे विवाद होने का प्रश्न ही नहीं उठता।

Express Investigation: चीनी कंपनी ने 370 अधिकारियों की ट्रैकिंग की, पीएमओ और सुरक्षा से जुड़े अफसर भी शामिल

चीनी कंपनी के डाटाबेस में गुजरात के पूर्व डीजीपी पीपी पांडेय भी शामिल रहे हैं, जिन्हें इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ केस में बरी किया गया था। केरल के पूर्व डीजीपी सिबी मैथ्यूज भी इसका हिस्सा हैं, जिन्होंने 1994 के इसरो जासूसी कांड की जांच की थी।

संपादकीय: चीन की बौखलाहट

जून में गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों पर हमले की घटना के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा सहित पूरे क्षेत्र में भारत ने जिस तेजी से सैन्य तैयारियां की हैं, उससे भी चीन बौखलाया हुआ तो है। इसके अलावा दक्षिण चीन सागर में भारतीय नौसेना के युद्धपोत की तैनाती से उसकी नींद उड़ी हुई है।

संपादकीय: चीन को संदेश

रक्षा सेवाओं के प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने सोमवार को साफ कर दिया कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति बहाल करने के लिए चल रही सैन्य और कूटनीतिक बातचीत का अगर कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला तो भारतीय सशस्त्र सेनाएं सैन्य विकल्पों के लिए भी तैयार हैं। उनके इस बयान से स्पष्ट है कि भारत अब किसी भी सूरत में चीन के सामने झुकने वाला नहीं है।

चौपाल: चीन के मंसूबे

अमेरिका के दबाव में भारत पहले ही देर कर चुका है। चीन की आर्थिक महत्त्वाकांक्षा सबके सामने स्पष्ट हो चुकी है। ईरान की कमजोर स्थिति का फायदा उठाने के लिए सवा चार सौ अरब डालर का निवेश करना उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं है।

दूसरी नजर: मकड़जाल में उलझता भारत

चीन मकड़ी का ठेठ उदाहरण है। उसमें मकड़ी की सारी विशेषताएं मौजूद हैं। इससे भी ज्यादा यह कि वह बड़ा सोचता और शिकार को आकर्षित करता है। छह साल में चीनी नेता के साथ अठारह बार मुलाकातें, जिनमें सरकारी दौरा और तीन शिखर वार्ताएं भी शामिल हैं, किसी भी तपस्वी को चापलूस बना सकती हैं। नरेंद्र मोदी तपस्वी नहीं हैं, उनमें भारी अहंकार है (सारे प्रधानमंत्रियों में होता है) और वे अपनी पार्टी के लिए कहीं ज्यादा बड़ा सोचते हैं।

दूसरी नजर: वार्ता की कूटनीति की असफलता

1975 से भारत-चीन सीमा पर कोई गोलीबारी नहीं हुई थी और कोई जान नहीं गई थी। चार हजार पांच सौ छह किलोमीटर लंबी सीमा पर पैंतालीस साल तक शांति बनाए रखना कोई मामूली उपलब्धि नहीं थी। चीन ने उस शांति को भंग कर दिया और नरेंद्र मोदी की निगरानी में बीस भारतीय सैनिक शहीद हो गए।

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