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चंद्रकांता शर्मा का लेख : मौजूदा दौर में बाल साहित्य

कहानी, उपन्यास, लेख और आलोचना साहित्य लिखने वाले लोग ही बाल साहित्य भी लिखते हैं, लेकिन वे इस बात से बेपरवाह हो जाते हैं कि बच्चों का साहित्य दर्जा कुछ ज्यादा नरमी की मांग करता है।

किताबें मिलीं : पीर नवाज

अब वह सामने खड़ा है और एक निरीह नग्नता से अपना नाम-पता बता रहा है। जैसे ही तुमने उसे पहचाना, एक स्मरण ने तुम्हें बांध लिया: एक तस्वीर, अधखुले दरवाजों का एक फ्रेम, जिसके पीछे यही शख्स तुम्हारी प्रेमिका को बाहों में बांधे चूम रहा था।

देवदासी प्रथा अब भी जारी होने का दावा : किताब

एक नई किताब में दावा किया गया है कि महिलाओं को स्थानीय मंदिरों में पहले भगवान की सेवा के लिए समर्पित करने और फिर देह व्यापार के लिए बाध्य करने वाली प्रतिबंधित ‘देवदासी’ प्रथा आज भी भारत के कई हिस्सों में चल रही है।

चीन ने सातवीं कक्षा तक की किताबों में किया भारी बदलाव

माध्यमिक स्कूल पाठ्यपुस्तकों की वरिष्ठ संपादक झू ने कहा कि अब भी अनेक लोग प्राचीन चीनी पुस्तकों की भाषा को नहीं समझ पाते और इसीलिए माता-पिता अपने बच्चों को पारंपरिक शिक्षा पढ़ाने वाले व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों में भेजते हैं।

पुस्तकायन : हेराए को हेरते हुए

रवींद्र भारती की कविता के साथ इस तरह का खिलवाड़ उचित नहीं। वे जो भी कहना चाहते हैं, अचूक और खास अंदाज में अपने विशिष्ठ तेवर के साथ कहते हैं, कभी-कभी वह ‘अस्पष्ट’ या ‘अबूझ’ भले प्रतीत हो।

किताब की जगह

किसी भी क्षेत्र के विकास को सिर्फ भौतिक विकास तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि वहां के लोगों के बौद्धिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक विकास की चिंता भी करनी चाहिए।

किताबों का दायरा

स्तक, पुस्तक मेला, शिक्षा के संदर्भ में ज्यादातर शिक्षकों और अभिभावकों का यही गड्डमड्ड चेहरा है।

साहित्य इस बरस

इस वक्त हिंदी में कई पीढ़ियों के रचनाकार सक्रिय हैं। सुखद है कि सभी की संवेदना अलग-अलग तरह से सरोकार के वितान रचती है। इस वर्ष भी वरिष्ठतम पीढ़ी से लेकर बिल्कुल नई पीढ़ी तक के रचनाकारों ने अपनी रचनात्मक ऊर्जा से साहित्य को बहुरंगी आयाम दिए..