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बाखबरः दिल्ली दर्प दलन

एक देसी टीका ‘एक्सपर्ट’ लगभग रो रहा था और हमारे कुछ एंकर टीका विज्ञानी बन कर तरह-तरह के सवाल तरह-तरह के विशेषज्ञों से उठवा रहे थे और खेद की बात कि सरकार का एक भी बंदा देसी के पक्ष में न दहाड़ा! न कोई एंकर दहाड़ा!

बाखबरः ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

किसान सम्मान निधि की भूरि भूरि प्रशंसा करते एक प्रवक्ता ने फरमाया : आज हम अठारह हजार करोड़ रुपए नौ करोड़ किसानों को दे रहे हैं! एक युवा किसान नेता ने तुरंत इस पर ‘कट’ लगाया : इतने में तो हमारा डीजल तक नहीं आता। एक अन्य किसान ने इस पर कटाक्ष किया : इसमें ऐसा क्या कमाल है? हम एक लाख करोड़ रुपए की तो जीएसटी देते हैं।

बाखबर: आमार सोनार बांग्ला

फिर एक दिन ‘आधे दिन’ का भारत बंद! चैनलों के लिए ‘आधा अधूरा’! कहीं बंद, कहीं खुला! बंद के दिन ही सरकार किसानों के विचार के लिए दस बिंदुओं वाला प्रस्ताव भेजती है। कई एंकर संशोधनों पर चर्चा कराते हंै, लेकिन किसान प्रस्ताव को सीधे खारिज कर देते हैं। एंकर चिंतित कि ऐसे कब तक चलेगा?

बाखबर: वह अपराधी तो नहीं!

उस सुबह की गिरफ्तारी के दृश्य देख कर एक मन कहता कि ‘अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे’ तो दूसरा कहता कि जी नहीं! यह एक दुर्दमनीय एंकर पर एक दुर्दमनीय सत्ता की ‘अति’ है। एंकर दुर्दमनीय जरूर सही, अपराधी नहीं है!

बाखबर: संभल जाओ चमन वालों

कुछ बड़बोले चैनलों को फिर रक्षात्मक होना पड़ा! फिल्म प्रोड्यूसर गिल्ड ने कोर्ट से प्रार्थना की कि बॉलीवुड को गंजेड़ी, नशेड़ी, चरसी आदि कह कर ‘बदनाम’ करने वाले चार चैनलों पर ऐसी खबर देने पर पाबंदी लगाई जाए! इसके बाद चैनलों में सन्नाटा छा गया!

बाखबर: काजर की कोठरी में

चैनल वही बताते हैं, उतना ही बताते हैं और उसी तरह से बताते हैं जिस तरह से उनके ऊपर वाले चाहते हैं, इसीलिए आजकल हर कहानी तार-तार बिखेरी जाती है, ताकि आप बटोरते रहें चिंदियां!

बाखबर: जो मांगोगे वही मिलेगा

आजकल सिर्फ खबर देना काफी नहीं। अपनी ह्यराजनीतिक लाइनह्ण को सही करने के लिए आप जन-आंदोलन का आह्वान कर सकते हैं। कैमरे को देख जनता आएगी ही। उसे दिखा-दिखा कर आप कमजोर संस्थानों पर दबाव बना सकते हैं, यानी कि ‘जो चाहोगे वही मिलेगा!’

बाखबर: बलम पिचकारी

अधिकांश चैनलों के लिए अब न कोरोना का बढ़ता आंकड़ा कोई खबर है, न कृषि विधेयक के पास किए जाने के बाद का सांसदों का विरोध या किसानों का असंतोष और आंदोलन बड़ी खबर है। किसान मरें या जिएं, उनको एमएसपी मिले न मिले और चाहे कॉरपोरेट कृषि क्षेत्र को चर जाएं, लेकिन बॉलीवुड का खून बहाना चैनलों के लिए सबसे बड़ा काम है!

बाखबर: कंगना का थाली विमर्श

सुशांत की मौत और कंगना के शापों के बीच फंसी रसीली खबरों के बीच आप हमारे चैनलों से यह उम्मीद एकदम न करें कि वे हर रोज सत्तानबे हजार के हिसाब से बढ़ते कोरोना संक्रमण, बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई या लद्दाख में चीनी भारतीय सैनिकों के बीच की तनातनी पर चर्चा करेंगे!

बाखबर: हिंदी की खाते हैं…

पहले शशि थरूर जी ठोके, फिर कर्नाटक के पूर्व सीएम जी भी ठोक दिए। जिस भाषा को तैंतालीस फीसद लोग बोलते हों उसकी ठुकाई सिर्फ पांच फीसद तमिल बोलने वाले करें और कुछ अंग्रेजी एंकर ठुकाई करवाएं! यह अपने देश में ही हो सकता है!

‘बाखबर’ कॉलम में सुधीश पचौरी का लेख : अपना रेट अपना पेट

इन दिनों कई कहानियां पलटी मारती दिखती हंै। दो दिन दादरी की कहानी को पलटने की कवायद दिखती रही, अब मथुरा कांड को पलटने की कवायद चल रही है! बने रहें कहानियों को लिखने-पलटने वाले! हर कहानी पलटती दिखेगी।

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