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बच्चों का आक्रोश और शिक्षण की चुनौती

बच्चों द्वारा अपने अध्यापकों के लिए नए नाम/उपनाम रखना या अपशब्दों का प्रयोग अनेक बार हास्य या मनोरंजन से हट कर उनके मन में पनप रहे आक्रोश को प्रगट करता है। यह
इक्कीसवीं शताब्दी की सबसे बड़ी चुनौती हर व्यक्ति को वह शिक्षा देना है जो उसे सम्मानपूर्ण जीवन जीने के लिए तैयार करे। (Express Photo)

अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में गांधीजी ने पोरबंदर के स्कूल में बिताए गए अपने प्रारंभिक वर्षों की चर्चा करते हुए लिखा है: ‘मुझे सिर्फ इतना याद है कि इस समय दूसरे लड़कों के साथ अपने शिक्षक को गाली देना सीखा था।’ बच्चों द्वारा अपने अध्यापकों के लिए नए नाम/उपनाम रखना या अपशब्दों का प्रयोग अनेक बार हास्य या मनोरंजन से हट कर उनके मन में पनप रहे आक्रोश को प्रगट करता है। यह स्कूलों में हमेशा होता रहा है। आज यह बच्चों के आपस में एक-दूसरे को प्रताड़ित करने और स्कूलों में लगातार बढ़ती हिंसा के रूप में चिंताजनक स्थिति तक पहुंच गया है। विकसित देशों में यह समस्या भयानक रूप ले चुकी है, वहां स्कूलों में गोलीबारी की घटनाएं होती रहती हैं। इसके पीछे की वजहों के तौर पर भारत जैसे देश में बच्चों और अध्यापक के बीच में बढ़ती दूरी, स्कूल के वातावरण का रुचिकर न होना, बस्ते का बोझ तथा प्रतिस्पर्धा और भविष्य के प्रति आशंकाएं भी गिनाई जा सकती हैं। स्कूलों में इस समस्या पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है। प्रत्येक स्कूल में एक या एक से अधिक गाइडेंस काउंसलर की नियुक्ति का प्रावधान होता है। मगर काउंसलरों के पद अक्सर नहीं भरे जाते हैं।

बच्चों के आक्रोश को समझने के लिए उनकी मूल प्रवृत्तियों को जानना आवश्यक है। वे अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं। ऐसे में वे बहुत-कुछ ऐसा भी करते हैं जिसे बड़े शैतानी या अनुशासनहीनता की श्रेणी में डाल देते हैं। बच्चों की ‘शैतानियों’ को उनकी जिज्ञासा और सर्जनात्मकता के रूप में मनोवैज्ञानिक स्तर पर समझने की क्षमता अध्यापक में विकसित करना शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम का एक महत्त्वपूर्ण भाग होना चाहिए। यदि अध्यापक में यह प्रवृत्ति विकसित हो जाए तो बच्चों के बहुत-से आक्रोश प्रारंभिक वर्षों में अपने आप समाप्त हो जाएंगे।इस प्रक्रिया को भी गांधीजी के जीवन की एक बहुश्रुत घटना के उनके विश्लेषण से समझा जा सकता है जिसमें मोहनदास करमचंद गांधी नाम के बालक ने अपने अध्यापक के कहने पर भी विद्यालय-निरीक्षण के समय केटल शब्द की वर्तनी अपने पास वाले बच्चे से नकल नहीं की थी। बाकी सभी बच्चों ने सही वर्तनी लिखी थी। उनके अध्यापक ने बाद में उन्हें उनकी ‘मूर्खता’ के बारे में बताया। वे लिखते हैं: ‘लेकिन मेरे मन पर उनके समझाने का कोई असर नहीं हुआ। मैं दूसरे लड़कों की पट्टी देख कर चोरी करना कभी सीख नहीं पाया। इतने पर भी शिक्षक के प्रति मेरा विनय कभी कम नहीं हुआ। बड़ों के दोष न देखने का गुण मुझमें स्वभाव से ही था। बाद में शिक्षक के दूसरे दोष भी मुझे मालूम हुए: फिर भी उनके प्रति मेरा आदर तो बना ही रहा।’ इसमें पारिवारिक संस्कृति तथा उस आयु में भी व्यावहारिक विश्लेषण की क्षमता स्पष्ट देखी जा सकती है।

आज जब शिक्षणसंस्थाओं के कर्ता-धर्ता विद्यार्थियों के समक्ष किंकर्तव्यविमूढ़ दिखाई देते हैं तब वे भूल जाते हैं कि विद्यार्थियों की सामान्य प्रवृत्ति तो अध्यापकों के दोष न देखने की ही होती है। स्थिति तब बिगड़ती है जब दोनों के बीच संस्कारिक और संवेदनात्मक तारतम्य टूट जाता है। अध्यापक अपने आचरण से जितना प्रभावित कर सकता है उसका कोई सानी हो ही नहीं सकता। पर ऐसा वह अध्यापक कभी नहीं कर पाएगा जिसका ध्यान बच्चों की ओर न होकर ट्यूशन, कोचिंग तथा अन्य संस्थाओं के निरीक्षण की ओर ही लगा रहेगा। जो अध्यापक स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक, समय के पाबंद नहीं होते हैं, वे चरित्र-निर्माण में सहायक कैसे हो सकते हैं? वे आदर के पात्र भी नहीं रह जाते हैं। यदि शिक्षकों का आपसी व्यवहार तथा बच्चों के प्रति संवेदनशीलता संस्था के वातावरण में हर जगह दिखाई दे तो आक्रोश को अपने आप सही दिशा मिल जाती है, विद्यार्थियों की सर्जनात्मकता नारे लगाने या दीवारों पर अपशब्द लिखने से हट कर सर्जनात्मकता की ओर मुड़ जाती है। इसी से, और इसी समय, चरित्र निर्माण की स्थायी आधारशिला रखी जाती है।

1934 में एक लड़की ने महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन को एक लंबा आलेख अपने पत्र के साथ भेजा। आइंस्टीन ने जो उत्तर दिया उसमें समस्या को समझने और उसके समाधान समझाने की सीख स्पष्ट होती है, जिसका उपयोग स्थिति के अनुसार आवश्यक बदलाव कर किया जा सकता है। उत्तर का आशय कुछ इस प्रकार है: मैंने तुम्हारी पांडुलिपि के करीब सोलह पृष्ठ पढ़े हैं और उससे मुझे मिली है- मुस्कान! वे चतुर, सूक्ष्म अवलोकन-युक्त, और सच्चाई व्यक्त करते हैं और एक सीमा तक अपने पैरों पर खड़े होते हैं। वे व्यक्तिगत आक्रोश से भरे हुए हैं। मैं भी अपने अध्यापकों से इसी प्रकार के व्यवहार का भुक्तभोगी रहा हूं। लेकिन मैं अपने स्कूली जीवन के बारे में लिखना नहीं चाहूंगा, और यह कतई नहीं चाहूंगा कि वह छपे और कोई उसे पढ़े! मेरी राय है कि तुम अपने स्वभाव (और आक्रोश) को भुला कर अपनी पांडुलिपि अपने बेटे-बेटियों के लिए सुरक्षित रखो, जिसे पढ़ कर उन्हें संतोष हो और वे भी ‘इसकी कतई परवाह न करें कि उनके अध्यापक उन्हें क्या बताते हैं या उनके बारे में क्या सोचते हैं।’ आइंस्टीन ने इस पत्र में यह भी कहा था कि ‘शिक्षा देने का एक ही तरीका है उदाहरण बनना!’ यदि अध्यापक और पालक इस सूत्र को आत्मसात कर सकें तो घर और स्कूल बच्चों के लिए उल्लास-केंद्र बन जाएंगे जहां उनकी जिज्ञासा और सर्जनात्मकता में पंख लग जाएंगे।

गुरु-शिष्य परंपरा पर गर्व करने का अधिकार हर भारतवासी को होना ही चाहिए मगर जब कभी एक भी ऐसी घटना सामने आती है कि पंद्रह साल के एक बच्चे ने स्कूल में अपने सहपाठी की हत्या कर दी, तो इस गौरव की महत्ता चूर-चूर हो जाती है। आक्रोश को बढ़ाने में व्यवस्था की जो कमियां हैं, समाज उनसे जानबूझ कर आंख मूंद लेता है। जैसे-जैसे निजी स्कूलों का वर्चस्व बढ़ा है, इन स्कूलों का सुबह सात बजे प्रारंभ होना लगभग सर्व-स्वीकार्य हो गया है। अधिकतर वरिष्ठों को यही याद है कि उनका स्कूल नौ-दस बजे से चार बजे तक चलता था। छह-सात साल के उस बच्चे पर डाले जा रहे दबाव तथा तत्जनित तनाव की कल्पना करिए जो प्रात: पांच बजे उठाया जाता है, छह बजे बस में बैठता है, शाम के तीन बजे घर वापस पहुंचता है। उसके बाद ट्यूशन, या कोचिंग! जी नहीं, यहीं पर उसकी छुट्टी नहीं होती है, उसे इसके बाद टेनिस या स्विमिंग, या म्यूजिक ‘क्लास’ में भी जाना होता है!ऐसा कोई दिन नहीं होता, जब लगभग हर विषय में उसे ‘होमवर्क’ न मिला हो! छुट्टी के दिन सुबह से ही सोमवार के नियमित टेस्ट की तैयारी होती है! पारिवारिक स्तर पर संबंधियों के यहां जाना, चिंता-रहित हो पाना अब उन बच्चों से छीन लिया गया है जो विशिष्ट श्रेणी के परिवारों के हैं और नामी-गिरामी स्कूलों में प्रवेश पाने में सफल रहे हैं! समाज को भी तय करना चाहिए कि जो व्यवस्था माता-पिता की दफ्तर जाने की सुविधा और मास्टर साहब के ट्यूशन तथा कोचिंग जाने के लिए अधिक समय उपलब्ध कराने के लिए, पर छोटे-छोटे बच्चों के ऊपर पीड़ादायक समय-सारिणी लागू कर देती है वह कैसे कह सकती है कि देश में बाल-केंद्रित शिक्षा-व्यवस्था लागू है? यहां बच्चा तो केंद्र में है ही नहीं? उसे पुन: केंद्र्र में लाने के लिए समय प्रबंधन एक महत्त्वपूर्ण पहलू है, इससे प्रारंभ किया जा सकता है, अलबत्ता यह एक ही बहुत साहस-भरा कदम होगा!

 

 

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