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चिंताः जीवनशैली बना रही बीमार

दिनोंदिन बढ़ती आरामतलबी हमारी जान की मुसीबत बन रही है। दोषपूर्ण जीवन शैली की वजह से पूरी दुनिया समेत भारत में भी दिल और फेफड़े की बीमारियों, मधुमेह और अवसाद का खतरा बढ़ रहा है। इनकी वजह से बड़े पैमाने पर लोग मौत के मुंह में जा रहे हैं।
Author April 16, 2017 03:25 am

मनीषा सिंह

हम जिस आधुनिक जीवनशैली पर इतना इतरा रहे हैं, उसके बारे में एक सच यह है कि उसने पूरे समाज को आरामतलब बना दिया है। संक्रमण से होने वाली बीमारियों से कहीं ज्यादा लोग जीवनशैली की वजह से पैदा हुई बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। देह को श्रम से दूर करने की हर कोशिश दिल, फेफड़े, मधुमेह, अवसाद और मोटापे जैसी बीमारियों के रूप में सामने आ रही है। दुर्भाग्य यह है कि लोग बिना यह जाने अपनी आधुनिक जीवनशैली का जश्न मना रहे हैं कि वह कितनी घातक है। कुल मिलाकर दुनिया में होने वाली पचास लाख मौतों को इस किस्म की निष्क्रिय जीवनशैली से जोड़ा जा सकता है। ब्रिटेन की एक संस्था ‘ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन’ ने अपने एक अध्ययन में पाया कि वहां दो करोड़ से ज्यादा लोग शारीरिक श्रम नहीं करते, जिसके फलस्वरूप दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। नए किस्म की जीवनशैली इसके लिए जिम्मेदार है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं में शारीरिक श्रम न करने पर बीमारियां बढ़ने की आशंका ज्यादा रहती है।

भारत का किस्सा इससे अलग नहीं है। दिनोंदिन बढ़ती आरामतलबी हमारी जान की मुसीबत बन रही है। दोषपूर्ण जीवन शैली की वजह से पूरी दुनिया समेत भारत में भी दिल और फेफड़े की बीमारियों, मधुमेह और अवसाद का खतरा बढ़ रहा है। इनकी वजह से बड़े पैमाने पर लोग मौत के मुंह में जा रहे हैं। वैसे तो बीमारियों के लिए स्वच्छ हवा की कमी, प्रदूषण, असंतुलित और दोषपूर्ण भोजन भी जिम्मेदार है, लेकिन निष्क्रिय दिनचर्या का भी इसमें बड़ा हाथ है। वैश्वीकरण और निजीकरण की प्रक्रिया ने कंप्यूटर के सामने वातानुकूलित कमरों में बैठ कर किए जाने वाले रोजगारों की संख्या बढ़ाई है। इससे शरीर से पसीना नहीं निकल पाता। देर रात तक जगना और फास्ट फूड के विकल्पों को भोजन के रूप में अपनाना हमारी जीवनशैली को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है जो मोटापा जैसी बीमारी पैदा कर रहा है। महिलाएं खास तौर पर मोटापे की शिकार हो रही हैं।

पिछले दिनों एक रिपोर्ट में बताया गया कि भारतीय महिलाओं के लिए मोटापा एक लाइलाज समस्या बनता जा रहा है। गांवों में खेतिहर और शहरों में मजदूर महिलाओं के लिए खानपान संबंधी हालात अब भी ज्यादा नहीं बदले हैं, इसलिए उन्हें मोटापे की चिंता से नहीं निपटना है, बल्कि वे कमजोर और दुबली हैं। मोटापे की समस्या मध्यवर्गीय परिवारों में तेजी से बढ़ रही है। पहले किशोरियां अपने घर के आसपास बैडमिंटन जैसे शहरी और शारीरिक व्यायाम को अनिवार्य बनाने वाले कुछ देहाती खेल खेला करती थीं और उनका खानपान भी ऐसा सुपाच्य था, जो शरीर की चर्बी को संतुलित रखता था। लेकिन अब शारीरिक परिश्रम को लगभग खत्म करने वाली उनकी दिनचर्या ने मोटापे को उनके लिए भी समस्या बना दिया है। शहरी लड़कियों की तरह ग्रामीण-कस्बाई स्त्रियों के जीवन में भी टीवी ने घुसपैठ कर ली है, जिसने घर के बाहर की उनकी गतिविधियों पर विराम लगा दिया है। लेकिन उनकी शारीरिक श्रम वाली गतिविधियां कम करने वाला यह चलन उनके आलस्य या टीवी देखने के शौक के कारण ही कायम नहीं हुआ है, इसकी एक बड़ी वजह असुरक्षा का माहौल भी है।
बदलती जीवनशैली का एक प्रभाव हमारे खानपान पर भी हुआ है। शहरों में ही नहीं, छोटे-छोटे कस्बों तक में पिज्जा-चिप्स-बर्गर जैसे खानपान तेजी से प्रचलन में आए हैं । खानपान में हुई तब्दीली से महिलाओं में जो मोटापा बढ़ रहा है, उसकी कुछ प्राकृतिक वजहें भी है। महिला और पुरुष शरीर की बनावट में कुछ बुनियादी फर्क होते हैं और हार्मोंस भी इसके लिए जिम्मेदार होते हैं। पुरुषों के शरीर में ज्यादा बड़ी मांसपेशियां होती हैं और उनके दिल और फेफड़ों की क्षमता भी ज्यादा होती है। इसके अलावा पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के शरीर के जिन हिस्सों, जैसे कि कमर पर ज्यादा चर्बी जमा होती है, वहां से चर्बी मुश्किल से हटती है। प्रकृति ने महिलाओं के शरीर पर चर्बी जमा करने की जो व्यवस्था बनाई, तो इसके स्वाभाविक कारण रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह रही है कि मानव समाज हमेशा से पुरुष प्रधान रहा है।

ऐसे में जब भी कठिनाई आई तो सबसे ज्यादा समस्या महिलाओं के लिए पैदा हुई। इन हालात में जब भोजन मुश्किल से मिलता था, जो हासिल किए गए भोजन का सबसे कम हिस्सा महिलाओं को दिया जाता था। आज भी हमारे समाज में यह मान्यता बड़े तबके में प्रचलित है कि घर के सभी सदस्यों के भोजन कर लेने के बाद बचा-खुचा खाना ही महिलाओं को उपलब्ध होता है। कभी वह भोजन आवश्यकता से काफी कम होता है तो कभी बहुत ज्यादा। दोनों ही स्थितियों से महिलाओं को निपटना पड़ता है। कम भोजन लेने की स्थिति में स्त्री का शरीर ऊर्जा बनाए रखने के मकसद से चर्बी को पिघलाने लगता है। अधिक भोजन लेने पर वह शरीर पर तुरंत चर्बी जमाने लगता है। असल में प्रकृति ने महिलाओं के शरीर में ऐसा इंतजाम किया कि जब भोजन उपलब्ध हो तो महिलाओं का शरीर ज्यादा चर्बी जमा कर ले, ताकि वह बुरे वक्त में काम आए। गर्भाशय की सुरक्षा के लिए भी अतिरिक्त चर्बी की परत जरूरी होती है। गर्भाशय और शिशु के स्तनपान के लिए अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत होती है, शरीर उसका भी इंतजाम करके रखता है, ताकि जरूरी पोषण न मिलने पर भी काम चल सके। महिलाओं के खानपान का एक पेच यह भी है कि उन्हें जो भोजन नसीब होता है- अक्सर वह वसा बढ़ाने वाला होता है। इसकी वजह यह है कि वसा वाले भोजन अपेक्षाकृत सस्ते होते हैं और उनमें स्वाद भी ज्यादा मिलता है।

स्त्रियों को खुद को स्वस्थ-छरहरा बनाए रखने के लिए पुरुषों के मुकाबले ज्यादा परिश्रम या व्यायाम करने की जरूरत पड़ती है। अमेरिका की मिसुरी यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक शोध में पाया कि समान रूप से वजन घटाने और फिटनेस पाने के लिए पुरुषों को जितना व्यायाम करना पड़ता है, महिलाओं को उससे लगभग एक तिहाई ज्यादा व्यायाम करने की जरूरत होती है। यही नहीं, पुरुषों का सिर्फ व्यायाम करने से काम चल जाता है, जबकि महिलाओं को इसके अलावा अपने भोजन पर भी कठोर नियंत्रण करना पड़ता है।
निष्क्रिय जीवनशैली से पैदा होने वाले मोटापे से जुड़ी मुश्किल यह है कि यह जहां अपने आप में एक बीमारी है, वहीं मधुमेह, हृदयरोगों, तनाव और मस्तिष्काघात तथा कैंसर को पैदा करने में भी इसका बड़ा भारी योगदान है। चिकित्सकों की राय में रेशों से भरपूर भोजन कम वसीय पदार्थ, कम मीठी और कम कैलोरी वाली चीजें खाने पर तोंद नहीं निकलती। रोजाना तीस मिनट का व्यायाम अतिरिक्त चर्बी को छांट देता है। अगर महिलाएं इन बातों पर ध्यान देंगी और विशेषज्ञ के सलाहों पर अमल करेंगी तो वे खुद का ही नहीं, बल्कि अपने परिवार-समाज का भला करेंगी।

आज अपनाई जा रही जीवनशैली वक्त की मांग कही जा सकती है क्योंकि न तो शहरों में अब एसी बसों-कारों-मेट्रो जैसे यातायात साधनों से पीछे हटा जा सकता है और न ही टीवी-मोबाइल-कंप्यूटर जैसी जरूरतों की अनदेखी की जा सकती है। इसकी बजाय कोशिश करनी होगी कि देह को ही दवा बना लिया जाए। घर की साफ-सफाई से लेकर कई घरेलू काम ऐसे हैं जो मशीनों और सहायकों के जिम्मे न छोड़कर अगर खुद किए जाएं तो वे शारीरिक श्रम की जरूरत की भरपाई करते हैं। खराबी शहरी सुख-सुविधाओं को अपनाने में नहीं, बल्कि अपनी दिनचर्या को उनके हवाले छोड़कर निष्क्रियता की जीवनशैली अपनाने में है। यह विचार करना होगा कि अपनी जीवनशैली में थोड़ी-बहुत तब्दीलियां करके हम कैसे सुखी और स्वस्थ रह सकते हैं। लंबी और सेहतमंद जिंदगी के लिए अगर कुछ सहूलियतों में कटौती करनी पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए। जहां पैदल जा सकते हैं, वहां कार क्यों ले जाएं, जहां सीढ़ियों से पहुंच सकते हैं, वहां लिफ्ट का बटन क्यों दबाएं। ऐसे बदलाव रोगों और दवाओं पर काटने वाली जिंदगी से हमें बचा सकते हैं। १

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