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आधी आबादी : सम्मान का सवाल

कहने को सरकार, समाज, संस्थाएं और संगठन सभी चिंतित दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि महिलाओं की स्थिति पहले से अधिक खराब हो चुकी है।
ईस्टराईन इरालू का पहला कविता संग्रह तेईस वर्ष की उम्र में प्रकाशित हुआ था। वे अतीत और वर्तमान के यथार्थ को मिश्रित करके लिखती हैं। अपनी विरासत पर उन्हें गर्व है।

हमारे देश में कमजोर वर्ग की महिलाओं की स्थिति बदतर है। वे चाहे शहर में रहें या गांव में। बस उनके शोषण का तौर-तरीका भिन्न होता है। एक ओर हम समानता, स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर लंबी-लंबी चर्चाएं कर लेते हैं और समझते हैं कि हो गया विकास और मिल गई महिलाओं को समानता। हद तो तब हो जाती है जब इन परिचर्चाओं में बड़ी-बड़ी बात करने वाले ही महिलाओं के साथ किसी न किसी स्तर पर अत्याचार करने में अग्रसर होते हैं। यहां तक कि ऐसे लोग सार्वजनिक कार्यक्रमों में विशेष सम्मान तक पाते हैं। इनके अत्याचार के शिकार महिलाएं घर में या घर के बाहर साथ काम करने वाली हो सकती हैं। आज हमारे सामने कई ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जिसमें ऊंचे पदों पर बैठे लोग महिलाओं का मानसिक और शारीरिक शोषण कर रहे हैं। न्यायालयों में इस प्रकार के तमाम मामले विचारधीन हैं और कुछ में तो दोषसिद्धि भी हो चुकी है। ये मामले बलात्कार, अपहरण, छेड़छाड़, शोषण, अत्याचार, अपमान, दहेज, प्रताड़ना आदि से संबंधित हैं।

दुनिया का आधा हिस्सा इन सबका शिकार है। फिर भी हम महिला सशक्तीकरण की बात करने में नहीं थकते। कहने को सरकार, समाज, संस्थाएं और संगठन सभी चिंतित दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि स्थिति पहले से अधिक खराब हो चुकी है। जो महिलाएं अशिक्षित हैं, चाहे वे शहरी हों या ग्रामीण-उनकी स्थति भयावह है।

महिलाएं परिवार में दोहरी भूमिका निभाती हैं। परिवार को संभालने के साथ ही पति के काम धंधे, खेती-बाड़ी और कुटीर उद्योग में बराबरी से काम करती हैं। अक्सर देखने में यह आता है कि वही महिलाएं अधिक कमजोर और निसहाय होती हंै जिनके पति या तो बेरोजगार होते हैं या किसी न किसी बिमारी के शिकार। हाल के दिनों शराबखोरी का चलन भी बढ़ा है। इस वजह से भी महिलाओं की समस्या कई गुना बढ़ गई हैं। शराब पीकर महिलाओं के साथ मारपीट की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। कई बार तो पति पत्नी की कमाई तक को शराब में डकार जाते हैं। मना करने पर मारपीट और हिंसा पर उतारू होते हैं।

इन पीड़ित महिलाओं की मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक क्षति का अनुमान लगाना बहुत कठिन है महिलाएं ऐसे जुल्मों की कहीं गुहार तक नहीं लगा पातीं। नतीजतन, पीड़ित महिला शारीरिक, मानसिक और भावानात्मक रूप से काफी कमजोर हो जाती है। कई बार तो ऐसी महिलाएं मनोविकार से ग्रस्त होकर आत्महत्या जैसे कदम उठाने में ही बेहतरी समझती हैं। हम केवल महिलाओं के सशक्तीकरण की बातें करते हैं, लेकिन ऐसे पुरुषों से निपटने कि लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाते। आज जरूरत इस बात की है कि महिलाओं को यथासंभव आत्मनिर्भर बनाया जाए।

महिला चाहे परित्यक्ता, विधवा, तलाकशुदा, विवाहिता, गृहिणी, कामकाजी या एकल हो, सबकी अपनी-अपनी समस्याएं हैं। वे किसी न किसी दर्द से पीड़ित हैं। सारी नैतिकता की जिम्मेदारी समाज के द्वारा केवल महिलाओं के कंधों पर डाल दी जाती है। संस्कारों का संरक्षक, त्याग और संवेदनाओं की मूर्ति, मानवीयता का पुतला, मान-सम्मान का जिम्मेदार केवल महिलाओं को ही माना जाता है।

नख से शिख तक केवल महिला ही संस्कारों में जकड़ी होती है। नैतिकता का पाठ केवल महिलाओं को पढ़ाया जाता है। इस दोयम दर्जे की मानसिकता के साथ कैसे एक स्वस्थ्य समाज का निर्माण हो सकता है?

आखिर कब तक महिलाएं समस्याओं के गर्त में भटकती रहेंगी और समाधान की बाट जोहती रहेंगी ? इस लिए सरकार के साथ ही सामाजिक संगठनों और संस्थाओं को अपनी अहम जिम्मेवारी का निर्वहन करना होगा। महिलाओं को साक्षर करना होगा, उनके अधिकारों के प्रति उन्हें जागृत करना होगा, स्व-रोजगार के माध्यम से उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर करना होगा, जहां कानूनन सहयोग की आवश्यक्ता हो उसे सुलभ करना होगा, समाज की नजर में उनकी प्रतिष्ठा को बढ़ाना होगा, पति से शोषित महिलाओं को परिवार न्यायालय के माध्यम से सुरक्षित करना होगा, सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का सीधे सीधे उन्हें लाभ दिलाना होगा।

अगर हम वैचारिक सुप्तावस्था से बाहर नहीं आएंगे कितनी ही बड़ी-बड़ी बातें कर लें, महिलाओं की समस्याओं का समाधान नहीं हो पाएगा। आधी आबादी गुलामी की जंजीरों में जकड़ी रहेगी। इस आधी आबादी तक सूरज की किरणों को पहुंचाना होगा । जरूरत है इस आधी आबादी को पूरी आर्थिक संपन्नता, सामाजिक समानता, सुरक्षा और सम्मान की।

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