March 23, 2017

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विलोम धर्मी

भोर की अलसाई अंगड़ाई लेते हुए राजकिशोर ने फोन उठा लिया और विभा के इशारे पर मोबाइल का स्पीकर ऑन कर दिया।

Author March 19, 2017 06:22 am
प्रतीकात्मक फोटो

अशोक गुप्ता

विभा का अनुमान ठीक निकला, फोन निरंजन का ही था।
भोर की अलसाई अंगड़ाई लेते हुए राजकिशोर ने फोन उठा लिया और विभा के इशारे पर मोबाइल का स्पीकर आॅन कर दिया।
निरंजन कुछ उत्तेजित था। उसकी आवाज उसके जोश की गवाही दे रही थी।
‘हिंदुस्तान पहुंच गया हूं किशोर। खुशखबरी यह है कि मिसेज नागभूषण ने प्रस्ताव मान लिया है। मेरी इनसे अभी मोबाइल पर बात हुई है… सुन रहे हो?’
‘हां… बिल्कुल।’
‘… और मजे की बात यह है कि अब उनसे मिलने चेन्नई भी नहीं जाना पड़ेगा। वह यहीं मुंबई में हैं। उनका बड़ा भाई नागेश यहीं अंबरनाथ में किसी कंपनी में किसी तोप पोजीशन पर काम कर रहा है। मिसेज नागभूषण उसी के पास आई हैं। उनका प्रस्ताव है मैं कल सुबह नौ बजे उनसे मिलने पहुंच सकता हूं। हामी तो वह भर ही चुकी हैं।’
‘वेरी गुड। तो, मिल लो जाकर… और फिर, दिल्ली कब तक आओगे?’
‘आऊंगा यार, पहले यह मोर्चा तो फतह हो। आसान नहीं है।’
‘क्या? तुमने तो कहा कि…’
‘एक कांटा है न किशोर।’
‘क्या कांटा?’
‘वो नागेश… वह बहुत बोलता है, उल्टे-सीधे सवाल करता है, और उसके सामने वह वीणा नागभूषण जरूर चुप्पी साधे रहेगी…’
राजकिशोर को बात बहुत साफ समझ में नहीं आई। नागेश के सवाल, उसका बोलना और मिसेज नागभूषण की चुप्पी… सब कुछ एक पहेली जैसा था उसके लिए। वैसे भी राजकिशोर के लिए निरंजन की बहुत-सी बातें अबूझ रह जाती हैं। उसका बेबात ओंठ टेढ़ा कर के मुस्काना या कभी इतना चुप, इतना गंभीर हो जाना कि उसे कही-पूछी गई बात का जवाब देना भी गवारा न हो… इसके बावजूद राजकिशोर निरंजन के एक बड़े सपने के आगे समर्पित हो गया है।
इस बार भी वह चुप रहा और धैर्य से निरंजन के आगे बोलने की प्रतीक्षा करने लगा। यह प्रतीक्षा विभा के चेहरे पर भी सघन थी, लेकिन शायद दोनों के प्रतीक्षारत चेहरों का व्याकरण एक नहीं था।
‘… ऐसा है किशोर, तुम निकलो और दोपहर की फ्लाइट से मुंबई आ जाओ…’
‘इतनी फटाफट, कैसे?’
‘रिलैक्स किशोर। बताता हूं। मेहरोत्रा को भी मैंने आज बुलाया था। मैं उससे कहता हूं कि वह अपना टिकट तुम्हें फॉरवर्ड कर दे, और वह अभी रुक जाए। यू नो, वह दिल्ली में ही रहता है। तुम उसके टिकट से उड़ लो, बात खत्म।’
‘उसका टिकट? और पहचान?’
‘ बुद्धू हो यार। उसका टिकट आरके मेहरोत्रा ने नाम से बना है। तुम राजकिशोर का आइडी तो दिखाओगे न। इतना तो संभालो न…’
‘… और मैं आकर करूंगा क्या?’
‘गुड क्वेश्चन… तुम बस नागेश की बोलती पर ब्रेक लगाते रहना। उसके सवालों को कैसे भी भटका देने का काम तुम्हारा। तुम उसकी कंपनी, उसके पद वगैरह के बारे में पूछना शुरू कर देना, बड़बोला इंसान है, वह उधर शुरू रहेगा और मैं इस बीच मिसेज नागभूषण को घेरे में ले लूंगा।… यह बहुत जरूरी है पार्टनर, करो… आखिर तुम मिशन के ट्रस्टी हो, मेरे विश्वासपात्र।…’
कुछ पल फिर सन्नाटा रहा। विभा के चेहरे पर तमाम आड़ी तिरछी रेखाएं उभर कर ड़ूब-उतरा रहीं थीं। राजकिशोर का असमंजस एकदम निश्चल था। न असहमति और न तत्परता…
‘किस सोच में पड़ गए राजकिशोरजी। आने की तैयारी करो। मेहरोत्रा से टिकट तुम्हें आधे घंटे में ही इ-मेल पर मिल जाएगा। अगले दिन ही वापसी होगी। बात बन गई, तो मैं तुम्हारे साथ ही दिल्ली चल पडूंगा।… आखिर अपना कर्मक्षेत्र तो हरिद्वार ही है।’
निरंजन ने फोन काट दिया।
विभा के मन में राजकिशोर के लिए एक बेहद आतुर प्रश्न था, ‘तुम जाओगे मुंबई?’
‘हां, क्यों पूछ रही हो?’
‘कुछ नहीं, लेकिन तुम बदल रहे हो राज… ’
‘क्या?’
‘हां। कोई ताप है, जो तुम्हें पिघला कर किसी फर्क सांचे में ढाल रहा है। ठीक है, लौट कर आओ तब बात करेंगे।’
राजकिशोर ठीक वक्त पर मुंबई पहुंच गया। निरंजन उसकी बेताबी से इंतजार कर रहा था। अंबरनाथ के लिए निकलते समय उसने गहरे नीले रंग का सूट पहना हुआ था। उसके हाथ में वह फोल्डर था, जिस पर उसके नाम के साथ उसकी कनाडा यूनिवर्सिटी का नाम लिखा हुआ था, जिसमें वह प्रोफेसर है। खटका तो राजकिशोर की आंख में यह कि यह पहनावा न तो मुंबई के इस मौसम के अनुकूल है और न उसके उस मिशन के, जो उसका सपना है और मिसेज नागभूषण भी राजकिशोर की तरह उसका हिस्सा बनने जा रही हैं। अंबरनाथ के लिए निकलते समय भी राजकिशोर अपनी सहज दैनिक वेश भूषा में था।
निरंजन राजकिशोर को देख कर मुस्काया। उसके होंठ जरा टेढ़े हुए, जो शायद भीतर से निकलने वाले शब्दों को रोक रहे थे। अनावश्यक शब्दों को रोक पाना और कारगर आक्रामक शब्दों को निर्बाध उगल सकना, इसका निरंजन को बचपन से अभ्यास था। जैसी कि आशंका विभा के मन में आकर ले रही थी, निरंजन का राजकिशोर से मिलना एक प्रायोजित कार्यक्रम था, पर विभा का मन खुद ही कहां इस संदर्भ में स्थिर हो पा रहा था।
दोनों लोग अंबरनाथ में नागेश के बंगले पर एकदम ठीक समय पर पहुंचे। मिसेज नागभूषण बाहर लॉन में नागेश की फुलवारी का आनंद ले रहीं थीं। नागेश सामने बरामदे में बैठे अखबार पढ़ रहे थे। उनके सामने तीन खाली कुर्सियां पड़ी थीं। निरंजन और राजकिशोर के आते ही मिसेज नागभूषण उन दोनों को बरामदे में ले आर्इं, जहां नागेश बैठा हुआ था। तीनो के बैठते ही मिनट भर में आया नाश्ते से भरी हुई ट्रॉली ले आई और नागेश ने मुस्काते हुए कहा, ‘पहले थकान उतारिए, फिर कोई बात शुरू होगी।…’
नाश्ते के दौरान राजकिशोर के सामने इतना तो स्पष्ट हुआ कि नागेश की प्रकृति उसकी उस खडूस छवि से बिल्कुल फर्क है, जो निरंजन उसे बताता आया है। राजकिशोर को वह एक साफदिल और खुशमिजाज इंसान लगा।
नाश्ते के बाद मिसेज नागभूषण सबको नागेश की स्टडी में ले आर्इं। बड़ा-सा कमरा, एकदम कॉरपोरेट ढंग से सज्जित था। नागेश की कुर्सी के सामने उसका लैपटॉप रखा था। निरंजन ने भी अपना लैपटॉप अपने बैग से निकल लिया था। वह मिसेज नागभूषण की ठीक बगल वाली कुर्सी पर बैठा था, ताकि वह अपने लैपटॉप के स्क्रीन की ओट में उनसे धीमे स्वर में बात कर सके। राजकिशोर की सीट नागेश के ठीक सामने थी। नागेश की खुशमिजाजी ने राजकिशोर को भी सहज प्रफुल्लित कर दिया था। वह नागेश से ही ज्यादा जुड़ रहा था। लेकिन, निरंजन से जुड़ते हुए बात नागेश ने ही शुरू की, ‘ओके, मिस्टर निरंजन… थोड़े में अपने आज के प्रोजेक्ट के बारे में बताइए।’
निरंजन खुश हो गया। उसने फुर्ती से अपना बैग खोला और बहुत से कागज बाहर खींच कर नागेश की ओर बढ़ा दिए।
‘नो नो, ये सब नहीं। इन्हें मैं आपकी वेबसाइट पर बारीकी से देख चुका हूं। हम आज के और अभी के प्लान पर बात करें। वही बताइए। मुझे मालूम है कि आप हरिद्वार के पास कहीं अनाथ बच्चों का आश्रम शुरू करना चाहते हैं।’
‘शुरू करना क्या, शुरू हो चुका है सर… अपनी जेब से एक बिल्डिंग किराए पर ले ली है। मैं जब तक कनाडा में हूं, तब तक के लिए ये मिस्टर राजकिशोर उसकी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। मिसेज नागभूषण भी इसमें…’
‘क्या कहती हैं वीणा इस बारे में?’
नागेश ने यह सवाल वीणा नागभूषण से न करके निरंजन से ही किया और वीणा नागभूषण आदतन चुप रहीं।
इस सवाल का जवाब राजकिशोर ने देना शुरू किया, ‘सर, इन्होंने प्रोजेक्ट का ट्रस्टी बनना स्वीकार कर लिया है।’
‘उसमें इनका योगदान क्या होगा। इस बारे में आप क्या उम्मीद करते हैं?’
निरंजन ने जवाब देने में देर की, तो राजकिशोर को लगा कि संवाद की डोर उसके हाथ में है। वह बोला, ‘सर, इनकी कुछ जमीन है चेन्नई के पास कहीं। ये उसे बेचना चाहती हैं।…’
आगे की बात निरंजन ने लपक ली, ‘हमारी ओर से कोई भी शर्त जैसी उम्मीद नहीं है मैडम के साथ… बस…’
‘आप खरीद रहे हैं वह जमीन?’ नागेश का सीधा सवाल निरंजन से हुआ, ‘मतलब कि क्या आपका ट्रस्ट खरीद रहा है?’
निरंजन हकबका गया और राजकिशोर के पास भी ऐसा कोई करिश्मा नहीं था, जो वह इस सवाल को भटका सके।
नागेश मुस्काया। उसने अब मिसेज नागभूषण की ओर रुख किया, ‘सिस्टर, क्या तुम वो प्लाट निकालने का मन बना रही हो।’
‘नहीं भाई।…’
इस स्थिति से निरंजन एकदम हकबका गया, लेकिन उसने अपनी मन:स्थिति को भीतर ही भीतर रोक भी लिया। वह तो आया ही था यह मंसूबा लेकर कि वह मिसेज नागभूषण को उनकी जमीन बेचने के लिए पटा लेगा। राजकिशोर के साथ मिल कर चक्कर चलाएगा कि नागेश उस जमीन को खरीदने में रुचि न दिखाए, ताकि बाहर के खरीददार से ढंग की कीमत वसूली जा सके, वह भी मिसेज नागभूषण की सहमति से। लेकिन यहां तो बात का ढर्रा ही फर्क हो गया।
नागेश ने स्थिति को समझ लिया और बात को नया सिरा थमाया, ‘हां तो मिस्टर निरंजन, अभी कितने बच्चे हैं आपके उस आश्रम में… कितना स्टॉफ है?’
निरंजन ने गर्दन घुमा कर राजकिशोर की ओर देखा और राजकिशोर ने असमंजस समेटते हुए बताना शुरू किया, ‘अभी पांच बच्चे हैं सर… पास के गांव से ही लाए गए हैं। बेहद बदहाली की हालत में थे।’
‘कब से हैं?’
‘दो तो करीब महीना भर से हैं। दो इनके आने के हफ्ते भर बाद ही आ गए थे। बाद में एक विकलांग लड़की अभी पांच दिन पहले पहुंची है।’
‘क्या उम्र है उसकी?’
‘करीब आठ बरस।’
राजकिशोर के चेहरे से लगातार बोला जा रहा झूठ रिस कर बाहर आने लगा था। केवल एक बच्चा है आश्रम में, बारह बरस का, जो बतौर स्टॉफ आश्रम का झाडू-पोंछा भी करता है। जिस विकलांग लड़की का जिक्र राजकिशोर ने अभी किया, वह सत्रह बरस की है। उसका एक पैर लकवाग्रस्त है और वह शुरू से है, करीब सात-आठ महीने से, जब यह बिल्डिंग किराए पर ली गई थी। वह तेज-तर्रार है, अपना खाना खुद बनाती है और उसमें से एकाध रोटी उस लड़के को मिल जाती है। आश्रम में एक सेट अलग बना है, जिसमें निरंजन आकर ठहरता है और वह प्राय: भारत में ही रहता है, उसकी कोशिश एक गैर-सरकारी संगठन बनाने की है और वह लगातार पैसा इकठ्ठा करने के दौरे पर रहता है और शनिवार-इतवार यहां आकर आराम करता है। राजकिशोर अभी तक यहां कभी एक दो-दिन से ज्यादा नहीं रहा, वह भी तब जब निरंजन भी साथ था।
नागेश की नजर निरंजन के चेहरे से ज्यादा राजकिशोर का चेहरा पढ़ रही थी, लेकिन मिसेज नागभूषण की टेढ़ी नजर निरंजन के चेहरे पर गड़ी हुई थी। उनके भीतर एक आक्रोश पनप रहा था, जिसे वह भरसक दबाने की कोशिश में थीं।
नागेश ने स्थिति को पढ़ा और अपना अगला पैंतरा निरंजन के आगे रख दिया। ‘ओके मिस्टर निरंजन, मिसेज नागभूषण कब आपके साथ हरिद्वार जाकर वह आश्रम देख सकती हैं, बताइए? उनके पास अगले दस दिन खाली हैं। उनके प्लाट का निर्णय भी हम जल्दी ही ले लेंगे। क्यों न परसों ही यह आपके साथ निकल जाएं।’
इस सवाल ने निरंजन को हिला दिया, लेकिन वह विलोम धर्मी इंसान जैसे इस तरह की स्थितियों को झेलने का आदी था। उसने अपने चेहरे को और कस कर बांधा और जवाब दिया, ‘ठीक है, कल मेरा मुंबई यूनिवर्सिटी में एक प्रेजेंटेशन है। उसे निपटा कर आपको कल शाम तक बताता हूं। मिसेज नागभूषण का चलना सचमुच वहां शुभ कदम पड़ने जैसा होगा।’
बात खत्म करके निरंजन और राजकिशोर फुर्ती से चल पड़े। निरंजन का दिमाग तेजी से घूम रहा था। वह शुक्र मना रहा था कि मिसेज नागभूषण की ओर से यह खुलासा नहीं हुआ कि वह आश्रम के नाम पर एक लाख रुपया पहले ही दे चुकी हैं, और उस चेक की रकम खाते में आ भी चुकी है। निरंजन को इस बात की भी तसल्ली थी कि इस उगाही की खबर राजकिशोर को नहीं है।
अपने होटल पहुंचने तक निरंजन ने राजकिशोर की तत्काल दिल्ली रवाना होने की व्यवस्था कर थी कि वह आश्रम पहुंच कर ऐसे औंचक निरीक्षण का अनुकूल इंतजाम कर सके, लेकिन यहां निरंजन चूक गया। वह जान नहीं पाया कि राजकिशोर के कान में वहीं बैठी विभा ने अपना मंतर फूंक दिया है और अब राजकिशोर उस आश्रम की ओर कभी रुख नहीं करेगा। जो कुछ वह दे चुका है वह उसके अबोध होने का न्यूनतम दंड है।

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First Published on March 19, 2017 6:22 am

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