January 19, 2017

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रविवारीः शाकाहार बनाम मांसाहार

जबसे नए शोधों ने यह साबित किया है कि शाकाहार इंसान के लिए मांसाहार की तुलना में कहीं ज्यादा मुफीद और निरापद है, तबसे पूरी दुनिया में शाकाहार को अपनाने पर बल दिया जा रहा है। लोगों को यह भी समझ में बखूबी आने लगा है कि मांसाहार महज बीमारियों की ही वजह नहीं है, बल्कि पर्यावरण, कृषि, नैतिकता और अहिंसा के मूल्यों के भी विपरीत है। यह अर्थव्यवस्था के लिए भी घातक है। 

महात्मा बुद्ध ने कहा था-जीवों पर दया करो। बुद्ध केवल मानवबलि ही नहीं, पशुबलि के भी विरोध में थे। शाकाहार का संबंध केवल भोजन से नहीं है, बल्कि यह हमारी सभ्यता, सुरुचि, संवेदना, दया और करुणा आदि से भी जुड़ा है। आज पश्चिमी मुल्कों में शाकाहारी होना आधुनिक फैशन बन गया है। आए दिन लोग खुद को शाकाहारी घोषित कर इस नए चलन के अलमबरदार बनने में गर्व अनुभव करते देखे जा सकते हैं। पश्चिमी दर्शनों की विचारधारा, जो कभी मांसाहार को सबसे मुफीद मानती थी, वही अब शाकाहार की ओर रुख करने लगी है। यह कई नजरिए से शाकाहार के हक में एक अच्छा संकेत कहा जाना चाहिए। लेकिन भारत सहित दुनिया के तमाम विकासशील देशों की स्थिति इससे ठीक उलट है। विकासशील देशों में बूचड़खाने बढ़ रहे हैं और मांसाहार को बढ़ावा देने के लिए वहां की सरकारें भी लगी हुई हैं। यह जानते हुए भी कि मांसाहार कई समस्याओं का कारण है और इससे कृषि-संस्कृति को जबरदस्त नुकसान पहुंच रहा है। पोल्ट्री-फार्मिंग, फिश-फार्मिंग, वैटरी-फार्मिंग,रैबिट-फार्मिंग, क्वेल-फार्मिंग जैसे भ्रामक शब्दों के जरिए लोगों को गुमराह करने का सिलसिला जारी है। पिछली सरकारों ने केंद्र से जितनी भी योजनाएं इस तरह की गांवों, कस्बों और शहरों के लिए बनार्इं, वे सभी हिंसा को बढ़ावा देने वाली और अहिंसक कृषि-संस्कृति का नाश करने वाली रही हैं। वर्तमान सरकार को देशभर में की जा रही इस तरह की हिंसा की खेती को बंद कराने की पहल करनी चाहिए। शाकाहार के दर्शन और अर्थशास्त्र को मानने वाले महज भारतीय दार्शनिक और वैज्ञानिक ही रहे हों, ऐसा नहीं है, बल्कि पश्चिमी दुनिया की विख्यात हस्तियों ने भी इसका खुलकर समर्थन किया और लोगों को शाकाहार की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया। अरस्तू, चार्ल्स डार्विन, अल्बर्ट आइंस्टीन, लियो टालस्टाय, हर्बर्ट जॉर्ज वेल्स, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, बेंजामिन फ्रेंकलिन, वाल्टेयर, न्यूटन, विलियम शेक्सपीयर, पर्सी बिसे शैली जैसे अनेक नाम लिए जा सकते हैं। भारत में तो कभी सारा का सारा युग शाकाहारी हुआ करता था। वे लोग ही मांस खाते थे जो समाज के सबसे निम्न तबके के होते थे। यही कारण है अनेक धर्म ग्रंथों में शाकाहार करने पर ही जोर दिया गया है। आयुर्वेद में मांसाहार को विपत्तियों का घर कहा गया है। कृषि-संस्कृति का ध्वजवाहक देश अहिंसा और प्रेम जैसे अनेक मूल्यों का हमेशा से संवाहक रहा है।

यह बहुत कम लोग जानते हैं कि मांसाहार और देश-समाज की आर्थिक स्थिति में गहरा रिश्ता है। जो लोग मांसाहार और अर्थव्यवस्था का रिश्ता नहीं मानते उन्हें उन तथ्यों पर जरूर गौर करना चाहिए, जिसमें मांसाहार को आर्थिक संवृद्धि के लिए बहुत बड़ा अवरोध बताया गया है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में हर साल वैध-अवैध तरीके से बीस करोड़ जानवरों का वध किया जाता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के मुताबिक अगर मात्र भेड़ों को ही कत्लखाने में न ले जाया जाए तो उनसे चार सौ पचास करोड़ रुपए से अधिक की आय हो सकती है। जबकि देश को उनके मांस से एक करोड़ से भी कम की आय होती है। अगर केवल अलकबीर बूचड़खाने में भैसों का वध न किया जाए तो देश को पांच साल में ही केवल र्इंधन से देश को 610.25 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है। एक सामान्य उदाहरण से इसे तरह से भी समझ सकते हैं। एक भंैस प्रतिदिन औसतन बारह किलोग्राम गोबर पैदा करती है, जिसमें छह किलोग्राम सूखा गोबर होता है। पांच सदस्यसीय परिवार के लिए रोजाना औसतन बारह किलोग्राम उपलों की जरूरत होती है। अलकबीर में 8,200 भैंसें रोजाना कत्ल की जाती हैं। ये भैंसें 91,200 परिवारों के र्इंधन की जरूरत पूरी कर सकती हैं। बड़ी मात्रा में कंपोस्ट यानी देशी खाद बनती है, जो आगेर्निक खेती के काम आती है। गांवों में आज भी भोजन बनाने के लिए र्इंधन के रूप में उपलों का इस्तेमाल किया जाता है। बूचड़खानों में लाखों की संख्या में पशु वध के कारण गांव के गांव पशुओं से रहित होते जा रहे हैं। और गांव में गरीबी बढ़ती चली गई है। गांव की स्थानीय अर्थव्यवस्था गहरे तौर पर पशुओं के गोबर और दूध आदि से जुड़ी है।

तथाकथित विकास ने गांवों को भोजन बनाने के ईंधन की निर्भरता भी बढ़ा दी है। इसी तरह कृषि उत्पादन को भी मांसाहार से परहेज करके बहुत बड़ी तादाद में बढ़ा सकते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के मुताबिक हर साल 9.12 लाख भैंसें बूचड़खानों में कत्ल कर दी जाती हैं। ये भैंसें 2.95 करोड़ टन गोबर खाद उत्पन्न कर सकती हैं। इससे 39.40 हेक्टेअर कृषि भूमि को खाद मुहैया कराई जा सकती है। औसतन हर साल पशुओं द्वारा 10.89 लाख टन खाद्यान्न का उत्पादन हो सकता है। इस तरह देखा जाए तो पशुओं के कत्ल से हर साल अरबों रुपए की हानि होती है। लेकिन सरकारे इस पर कभी ध्यान नहीं देती हैं और न ही देशवासियों द्वारा ध्यान दिलाने पर उस पर कोई विचार ही करती है।

पश्चिमी देशों में जन्म के समय एक बछड़े का भार सौ पौंड होता है और चौदह महीने बाद जब वह कसाईखाने में भेजा जाता है तो उसका भार ग्यारह सौ पौंड हो जाता है। उसको इस अवधि तक पालने में 1400 पौंड दाना, 2500 पौंड घास, 2500 पौंड साइलेज और 6000 पौंड पास्चर खर्च हो जाता है। इसमें बछड़े के 1100 पौंड भार में से 460 पौंड मांस उपलब्ध हो पाता है। जाहिर है कि बछडेÞ का तीस प्रतिशत शरीर तो भक्षण के काबिल नहीं होता। जीव हत्या अलग से होती है। मतलब अधिक व्यय में बहुत कम उत्पादन। वहीं दूसरी तरफ जमीन के उसी हिस्से से मांस की जगह पांच गुना अधिक अन्न पैदा किया जा सकता है। अगर दूसरे प्रकार से हिसाब लगाया जाए तो सोलह पौंड अन्न से केवल एक पौंड मांस मिलता है। मांस प्राप्त करना अन्न प्राप्त करने की अपेक्षा हर तरह से घाटे का सौदा है। कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि अगर सारा विश्व शाकाहार अपना ले तो खाद्य समस्या ही नहीं आर्थिक, पर्यावरण, जल, स्वास्थ्य, अन्न, फल और सब्जी से जुड़ी तमाम समस्याएं खत्म हो सकती हैं। इसके अलावा, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, नैतिकता और धर्म सम्मत अनेक कठिनाइयों कुछ ही दिनों में हल हो जाएंगी।

भारत जैसे कृषि प्रधान और अहिंसावादी देश में भी सरकारें इस बात पर विचार नहीं करतीं कि इंसान और जानवर एक दूसरे के पूरक हैं। सहअस्तित्व से ही जैविक विविधता को कायम रखा जा सकता है। मनुष्य अगर एक जानवर पालता है तो वह जानवर उसके पूरे परिवार को पालता है। इतना ही नहीं बंदर, रीछ, घोड़े, बैल, सांड़, भैंस और गाय इंसान की जिंदगी के अहम हिस्से हैं। आज भी लाखों लोगों की जीविका इन जानवरों पर आधारित है। राजस्थान में एक कहावत है- कहने को तो भेंड़ें पालते हैं, दरअसल भेड़ें ही इनको पालती हैं। इनके दूध घी और ऊन आदि से हजारों परिवारों की जीविका चलती है। भेड़ों के दूध को वैज्ञानिकों ने फेफड़े के रोगियों के लिए बहुत ही फायदेमंद बताया है। भारत में सबसे अधिक गाय की पूजा लाखों बरसों से की जाती रही है, लेकिन मांस खाने वालों के लिए वे एक आहार बन कर रह गई हंै। एक गाय हमारे लिए कितनी उपयोगी हैं इसका अनुमान लगाना बहुत कठिन नहीं है। एक गाय हमारे जीवन को अपने जीवन काल में कितना क्या कुछ देती है, इसे समझने के लिए इस आंकड़े को समझना जरूरी है। गाय से प्राप्त गोबर, मूत्र और दूसरी चीजों की बात अलग है। गाय से पैदा बछड़ा बैल के रूप में कृषि के कार्य में कितना उपयोगी और हमारे आय का साधन बनता है, इसे भी समझ लेना चाहिए। एक बैल अपने जीवन काल में कम से कम चालीस हजार किलोग्राम अन्न उत्पादन कर करीब आठ हजार व्यक्तियों का पेट भरता है। गाड़ी, सवारी और भार ढोना आदि की सेवा अलग। ऐसे पशुओं का वध करके उतना ही लाभ मिलता है, जितना कोई कोयला पाने के लिए चंदन की लकड़़ी जलाए।

‘बांबे हुमेनेटेरियन लीग’ के मुताबिक जानवरों से हर साल दूध, खाद, ऊर्जा और भार ढोने वाली सेवा द्वारा देश को करोड़ों रुपए की आय होती है। इसके अलावा मरने के बाद इनकी हड्डियों और चमड़े से जो आय होती है, वह भी करोड़ों में होती है। कृषि के द्वारा भुखमरी से छुटकारा पाया जा सकता है। साथ में करोड़ों लोगों की जीविका भी चलती है। दस एकड़ में धान की खेती करके एक साल में 40 लोगों का पेट पाला जा सकता है। इसी तरह इतनी ही जमीन में सोयाबीन की खेती करके एक साल तक 60 लोगों का पेट पल सकता है। और अगर इतनी ही जमीन पर मक्का की खेती की जाए तो पंद्रह लोगों की जीविका का इंतजाम हो सकता है। लेकिन अगर इतने ही क्षेत्रफल में मांस प्राप्ति के लिए पशु पाले जाएं तो एक साल में केवल और मुश्किल से तीन लोगों को रोजगार मिल सकता है। यह भी विचारणीय बात है कि पशु के शरीर का तीस प्रतिशत भाग भोज्य नहीं होता। जितना खर्च करके मांस प्राप्त करने के लिए उसे मोटा किया जाता है, उसे उसकी हत्या करके कदापि नहीं मिल सकता है। आर्थिक दृष्टि से से देखें तो आहार के रूप में मांसाहार, शाकाहार की अपेक्षा बहुत मंहगा पड़ता है। एक मांसाहारी, बीस शाकाहारियों की खुराक अपने पेट में डालता है।

मांसाहारियों का यह तर्क होता है कि अगर विश्व के अधिकांश लोग शाकाहारी हो जाएंगे तो शाकाहार कम पड़ जाएगा और पशु-पक्षियों की आबादी समस्या बन जाएगी। लेकिन यह महज मांसाहार को उचित ठहराने के एक कुतर्क के अलावा और कुछ नहीं है। विश्व के जाने-माने अर्थशास्त्री माल्थस के मुताबिक खाने-पीने की वस्तुओं और जन-संस्था के बीच संतुलन प्रकृति स्वयं बनाए रखती है। अगर मनुश्य अपनी आबादी को बेरोक-टोक बढ़ने देता है तो प्रकृति महामारियों और विपदाओं से उसे संतुलित करती है। इसलिए यह कहना कि मांसाहार को शाकाहार के लिए जीवित रखा जा रहा है, तथ्यों का धूर्त्त संयोजन है। जो आंकड़े पिछले पचास सालों से देश-विदेश के आहार-शास्त्रियों और अर्थ-विषेशज्ञों ने जुटाए हैं, उनसे यह सिद्ध होता है कि शाकाहार, मांसाहार की तुलना में अधिक सस्ता, गुणकारी, निरापद, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने वाला और इंसान की प्रकृति के अनुकूल है। मांसाहार करने वालों का एक तर्क यह भी होता है कि मांसाहार, शाकाहार की तुलना में अधिक सस्ता है। लेकिन इस तर्क में भी कोई दम नहीं है।

ज ब हम पशु-वध रोकने के फायदे के बारे में विचार करते हैं तो पता चलता है कि इससे ऐसे अनेक लाभ है जिसे अगर विश्व समाज समझ ले तो पशु-वध सबसे हानिकारक और विध्वंसकारी कार्य नजर आएगा। कुछ विशेष बातों पर ध्यान देकर हम मांसाहार से होने वाली हानियों को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। भारत के सिर्फ यांत्रिक बूचड़खानों को बंद कर दिया जाए तो लाखों जानवरों का वध ही नहीं रुकेगा बल्कि उसमें इस्तेमाल होने वाला पचपन करोड़ लीटर से अधिक पानी की बचत होगी जो धुलाई में इस्तेमाल होता है। भारत में आजादी के बाद से दूध देने वाले पशुओं की संख्या कत्लखानों में कटने के कारण बेतहासा ढंग से कम हुई है। इससे जहां दुधारू पशुओं की संख्या बढ़ेगी वहीं पर दूध की समस्या से भारत को निजात मिलेगी। महज भेड़ों के वध को रोक देने से छह सौ करोड़ रुपए का दूध मिलेगा, 450 करोड़ रुपए की खाद, 50 करोड़ रुपए का ऊन प्राप्त होगा। इसी तरह गौवंश के वध को रोक देने से साल भर में जो लाभ होगा वह हैरानी में डालने वाला है। एक गाय के गोबर से साल भर में लगभग 17,000 रुपयों की खाद प्राप्त होगी। रोजाना यांत्रिक कत्लखानों में साठ हजार गौवंशीय पशु कटते हैं, जिनके गोबर मात्र से साल भर में करोड़ों रुपए की आमदनी हो सकती है। दूध, घी, मक्खन और मूत्र से होने वाले फायदे को जोड़ दिया जाए तो अरबों रुपए की आय केवल गौवंश के वध रोक देने से देश को हो सकती है।

बूचड़खानों और मांसाहार की प्रवृत्ति को कम करके पर्यावरण प्रदूषण और अन्य कारणों से होने वाले अनगिनत रोगों को कम किया जा सकता है। शाकाहार के हिमायती विचारक पीटर फ्रीमेन के मुताबिक पशुओं द्वारा चरी हुई एक एकड़ भूमि, पांच हजार पौंड अन्न और बीस हजार पौंड सब्जी आदि प्रदान कर सकती है, जबकि उस भूमि को चरने वाले जानवरों के मांस से केवल एक हजार पौंड मांस प्राप्त होता है। मांसाहार दूसरों को भूखा रखने का जिम्मेदार है, क्योकि लाखों जानवर उन लोगों का अन्न खा जाते हैं जो लोग भूखे सोने के लिए मजबूर हो रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि केंद्र और राज्य सरकारें बूचड़खानों को बंद करके देश की जहां खाद्यान्न समस्या का हल निकाल सकती हैं, वहीं पर पानी, पर्यावरण, घटते पशुधन, दूध, घी और उर्वरक की समस्या का हल भी निकाल सकते हैं। रोजगार जो करोड़ों लोगों को मिलेगा वह अलग। १

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First Published on October 16, 2016 12:13 am

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