January 20, 2017

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कहानीः वेलेंटाइन मम्मी

आईने के सामने खड़ी अपने आपको निहार रही थी शैलेंद्री। बाहर जॉन खड़ा था। बार-बार गाड़ी का हार्न दे रहा था। लेकिन शैलेंद्री का मन नहीं था बाहर जाने का।

Author October 16, 2016 00:23 am

हेमंत कुमार पारीक

आईने के सामने खड़ी अपने आपको निहार रही थी शैलेंद्री। बाहर जॉन खड़ा था। बार-बार गाड़ी का हार्न दे रहा था। लेकिन शैलेंद्री का मन नहीं था बाहर जाने का। कई बार मना कर चुकी थी, पर वह अड़ा था। वह बड़बड़ाई, आज जॉन को न जाने क्या हो गया है… फिर मोबाइल उठाया और बोली- ‘जॉन, रहने भी दो न! पता नहीं क्यों आज बाहर जाने का मन नहीं है। तुम अकेले ही चले जाओ। कल चलूंगी… प्रामिस!’ मोबाइल पर मौन छा गया। कुछ देर बाद गाड़ी के चलने की आवाज हुई और फिर सन्नाटा पसर गया।
आईने के सामने खड़ी वह सोचने लगी कि पता नहीं आज उसे क्या हो गया है। जॉन की बात उसने कभी नहीं टाली, फिर अचानक…! आईने में पीछे दीवार पर लटके कैलेंडर का प्रतिबिंब नजर आया उसे। चैदह फरवरी पर लाल स्याही का गोला दिखा। वह भूल गई थी। उसी ने लगाया था। आज पापा का जन्मदिन है।… वह बुदबुदाई। तेजी से बालों में कंघी चलाने लगी कि पापा का आभासी चेहरा नजर आने लगा। कुछ कह रहे से लगे, पर मूक! सिर्फ होंठ हिल रहे थे, मूक फिल्म के नायक की तरह। बाहर शोर था। शोर में कहीं पापा की आवाज का आभास हुआ उसे। बालों में सरकती कंघी रुक गई। पुराने दृश्य सजीव होने लगे, फिल्म की तरह आईने में उतरने लगे। उसे अपने पुराने घर की याद हो आई और वह सब…।
बारह-तेरह साल की वह, बिल्डिंग के नीचे खड़ी है। बिल्डिंग की चौथी मंजिल पर उसका फ्लैट है। स्कूल से थकी-हारी लौटी और सीढ़ियों पर बैग रख सुस्ताने लगती है। तभी ऊपर से आवाज आती है, शैलेंद्री…!
‘हां पापा, अभी आई।’ कहते हुए वह उठ खड़ी होती है। तभी पापा कहते हैं, वहीं ठहर बेटा, मैं नीचे आ रहा हूं।… हमेशा यही होता था। पापा खिड़की पर खड़े उसका इंतजार करते रहते थे।
नीचे उतरते ही पापा बैग उठा लेते। बैग कंधे पर लटका सीढ़ियां चढ़ने लगते। सामने खड़ा जॉन धीरे से मुस्कुराता। काला-कुट्ट जॉन जब भी हंसता तो विचित्र लगता था। ब्लैक ऐंड वाइट, अजीब-सा! पर वह हमेशा उसके साथ रहता था। जब पापा नहीं होते तब बैग वह उठा लेता। अपने कंधे पर लाद कर उसे ऊपरी मंजिल पर छोड़ आता। हालांकि वह उसे अपने घर आने को मना करती थी। इसके पीछे कारण था। पापा कहते थे कि कोंकणस्थ ब्राह्मण हैं हम और जॉन क्रिस्ती! पापा को चिढ़ होती जब उसे जॉन के साथ देख लेते। कहते, कई बार मना किया, इस लड़के के साथ मत रह…। इसलिए वह स्कूल में ही उससे मेल-मिलाप रखती थी। लेकिन पापा के सामने ऐसे व्यवहार करती मानो वह अजनबी हो। गेट के बाहर खड़ा जॉन भी समझता था। धीरे से मुस्कुरा देता और आगे बढ़ जाता।
जॉन का रूप रंग किसी को पसंद नहीं था, पर उसे था। उसकी मीठी-मीठी बातें, ठहाके और हेल्पिंग नेचर के कारण वह उसके दिल में उतर चुका था। उसके कोमल बाल मन पर जॉन ने गहरी छाप छोड़ी थी?… उसने आइने में अपने आपको देखा और मुस्कुरा दी। पीछे महरी ने आवाज दी। उसकी तंद्रा टूटी। ध्यान भंग हुआ। चिल्ला पड़ी, क्या है सीमा!’ ‘कुछ नहीं दीदी। मैं पूछ रही थी कि अब मैं जाऊं? सारा काम निबट गया है।’ वह कुछ बोली नहीं। यह सोच कर आईने पर नजरें टिकाए रखी कि छूटी हुई यादों की डोर का छोर कहीं छूट न जाए। लेकिन महरी ने बीच में खलल डाल दिया। जैसे शांत पानी में किसी ने कंकड़ फेंक दिया हो। उसने बालों में फिर कंघी चलानी शुरू कर दी। पिताजी का आभासी चेहरा फिर दिखने लगा। लेकिन अबकी चेहरे पर पीड़ा के भाव थे। जानलेवा पीड़ा दिखी…।
अचानक बड़ी हो गई। वयस्क कहें। जॉन छह फुट का लंबा-तगड़ा राक्षस-सा दिखने लगा था। काले चेहरे पर झउआ मूंछें, पर उसके वे सफेद दांत और काला कुट्ट बदन वैसा ही था। उन्हें छिपाने के लिए अक्सर वह पीली शर्ट पहन लेता था।
वह अपने घर के सामने खड़ी उससे बतिया रही है। चौथी मंजिल की खिड़की से पापा उन्हें देख रहे हैं। उसने भी पापा को देख लिया। लेकिन वे कुछ नहीं कह पा रहे हैं, क्योंकि अंदर बीमार पत्नी है। ऊपर से ही पापा ने आवाज दी, शैलेंदी, मां की दवा ले आई?’ ‘भूल गई, अभी लाती हूं।’ बीच में ही जॉन बोल पड़ा, शैल तुम ऊपर जाओ मम्मी के पास। दवा मैं ला देता हूं।’ पापा ने सुना, पर कुछ बोले नहीं। एक समझौता मजबूरी का…। उसने दवाई का पर्चा जॉन के हाथों में थमा दिया। पापा ने देखा, पर कुछ कहा नहीं। देखते रहे टुकुर-टुकुर।
एक दिन उसने दरवाजे की ओट से सुना था। मां कह रही थी, ‘शैलेंद्री का जॉन से इस तरह घुलना-मिलना ठीक नहीं है।’ पापा की आवाज बोझिल और थकी-सी लगी। बोले, सुमन, लड़की जवान हो गई है। अगर ज्यादा टोकाटाकी की तो हाथ से फिसलने में देर नहीं लगेगी। कहां हम ब्राह्मण और कहां वो क्रिस्ती! समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएंगे।’ मां चुप हो गई थी। वह गुमसुम-सी घर के अंदर आ गई। पापा ने देखा और बोले, बेटा कब आई तू?’ ‘अभी-अभी पापा।’ तभी जॉन ने दरवाजे पर दस्तक दी। पापा-मम्मी के पैर छुए और सामने अखबार रखते हुए बोला, शैल का जॉब लग गया है। देखिए अखबार में पोस्टिंग भी दी हुई है।’ वह आश्चर्य चकित थी। सोचा भी नहीं था कि कभी उसे नौकरी मिलेगी। आवेग में वह जॉन से लिपट गई। और फिर अपने आप को संभाला। उस वक्त पापा-मम्मी और जॉन की आंखों में अलग-अलग सवाल थे। पर कोई कुछ नहीं कह पा रहा था। जॉन भी किंकर्तव्य विमूढ़-सा खड़ा देख रहा था उसे और मम्मी-पापा को।
कुछ देर की खामोशी के बाद पापा सहज हुए। बोले, ‘बेटा, डॉक्टर कह रहे हैं कि मम्मी को इलाज के लिए टाटा मेमोरियल ले जाना पड़ेगा। अब इतना सब कहां से आएगा? पेंशन भी मुट्ठी भर मिलती है।’ बीच में ही जॉन बोल पड़ा, ‘पापा जी, आप फिक्र न करें। सब बंदोबस्त हो जाएगा। टाटा मेमोरियल में मेरा कजिन डॉक्टर है।’ पापा क्या कहते? न तो हां कह सकते थे और न ना। उन्होंने कृतज्ञ नजरों से जॉन को देखा। मां की जिंदगी का सवाल था। उसने पापा की तरफ देखा, ‘कब जाना है पापा?’ ‘जितनी जल्दी हो सके। डॉक्टर स्टेज की बात कह रहे हैं। फर्स्ट स्टेज है। अगर सही समय पर इलाज हो गया तो…। अब तुझे भी तो ज्वाइन करना है? ऐसा करते हैं कि तेरी ज्वाइनिंग के बाद चलेंगे।’ बीच में ही जान बोल पड़ा, ‘ऐसी अवस्था में देर करना ठीक नहीं। इसे सर्विस ज्वाइन करने दीजिए पापा। मैं भी तो हूं आपके बेटे जैसा, सब संभाल लूंगा। सारा इंतजाम मुझ पर छोड़िए और चलने की तैयारी कीजिए।’
चार महीने का समय देखते-देखते निकल गया और उसे पता ही नहीं चला। मां लौट आई थी। धीरे-धीरे स्वस्थ हो रही थी। उसकी देखभाल के लिए अधिकांश समय जॉन उसके घर पर ही बना रहता था। इस दौरान उसके तबादले के लिए भागदौड़ करता रहा। लेकिन यह बात न तो उसके पापा को पता लगी और न मां को और एक दिन उछलता-कूदता हुआ जॉन घर में दाखिल हुआ, जिस तरह पोस्टिंग के समय अखबार लेकर आया था। चहकते हुए बोला, ‘शैल तुम्हारा तबादला हो गया है।’ वह क्या करती। कहने को शब्द नहीं थे। गला भर आया। पापा ने देखा, लेकिन उनके पास भी कोई शब्द नहीं थे। फिर भी बोले, ‘बेटा, जो तुम कर रहे हो वह अपना सगा भी नहीं करता।’ जॉन बोला, ‘पापा, यह तो मेरी ड्यूटी है। अपना सगा बेटा ही समझिए। मेरे पापा बचपन में ही चल बसे। अब आपको ही अपना पापा मानने लगा हूं।’ पापा ने सिर झुका लिया था। मानो एक बोझ अनचाहे ही उनके सिर पर आन पड़ा हो।
बसंत का आगमन हो रहा था। मंद-मंद ठंडी-गरम हवाएं बहने लगी थीं। बाजारों में वेलेंटाइन की चहल-पहल दिखने लगी थी। नई उमर के लड़के और लड़कियां वेलेंटाइन की तैयारी में जुटे थे। वह आॅफिस से लौट रही थी। जिस चौराहे से वह अपने घर की तरफ मुड़ती थी वहां जॉन अकेला खड़ा था। जॉन को देख वह एक पल को रुकी, ‘तुम यहां जॉन?’ ‘हां मैं, तुम्हारे इंतजार में खड़ा हूं।’ ‘पर क्यों?’ ‘कुछ बात करनी है, जो घर पर नहीं कर सकते।’ उसके चेहरे पर सवालों का तूफान आ गया। किसी अज्ञात भय से डर गई थी वह, ‘कौन-सी बात है, जो तुम घर पर नहीं कर सकते?’ ‘यही कि कल वेलेंटाइन डे है।’ ‘तो?’ उसने सवाल किया। ‘इस पवित्र दिन पर तुमसे शादी करना चाहता हूं।’ सुनते ही जैसे उसके ऊपर घड़ों पानी पड़ गया। पांवों के तले की जमीन खिसकने लगी। इसी बात का डर उसे हमेशा लगा रहता था। पुरुष अपने किए को कभी नहीं भूलता। अगर कुछ देता है, तो लेने के लिए दूसरा हाथ हमेशा तैयार रखता है। वह बुत बनी खड़ी थी। मुंह सिल गया हो मानो। फिर भी धीरे से बोली, ‘जॉन में चलती हूं।’ जॉन ने कलाई पकड़ ली, ‘मगर मेरे सवाल का जवाब?’ ‘कल दस बजे एकांत पार्क में मिल जाएगा।’
वह अनमनी-सी घर में घुसी। चेहरा देखते ही मां भांप गई। ‘क्या बात है बेटा… आॅफिस में कुछ हुआ क्या?’ ‘कुछ नहीं मम्मी, हल्का-सा सिरदर्द है।’ ‘मालिश कर दंू?’ ‘नहीं, जरूरत नहीं है। सिरदर्द की गोली ले लूंगी।’ वह स्टडी रूम में आ गई। पलंग पर जा पड़ी। जॉन का सवाल तेजी से उसके दिमाग में घूम रहा था। कहने को तो कह दिया उसने कि एकांत पार्क में मिलेगी, पर जवाब क्या देगी? जो सवाल जॉन ने किया है उसके बीच स्पेस नहीं होता। हां या ना दो ही उत्तर हो सकते थे। सवाल जटिल था और उसके पास वक्त नहीं था। अगर मम्मी-पापा को बताती, तो उन्हें सदमा लग सकता था। कोंकणीं ब्राह्मण कैसे बर्दाश्त कर लेता एक क्रिस्ती को?… वह सोच रही थी। एक तरफ जॉन खड़ा था, जिसने पग-पग पर उसका साथ दिया था। उसके अहसान तले दबी थी वह। अगर वह न होता तो मम्मी की क्या हालत होती?… सोचते-सोचते करवटें बदलने लगी थी। कभी जॉन का पलड़ा भारी नजर आता, तो कभी मम्मी-पापा का…। तभी मम्मी ने आवाज दी, ‘शैल! हाथ मुंह धो लो, नाश्ता तैयार है।’ वह उठ खड़ी हुई और गुसलखाने की तरफ मुड़ गई।
अगली सुबह वह हमेशा की तरह तैयार होकर बाहर निकली। चौराहे से एकांत पार्क की तरफ जाने के लिए रिक्शे में जा बैठी। दिमाग बेकाबू था। जॉन के सवाल में उलझी हुई थी। जिसका उत्तर एकदम सरल था, मगर टनों भारी भी। कितनी ही जिंदगियों के वजन के बराबर। रिक्शा रुका और वह विचारों में खोई उतर पड़ी। सामने खड़ा जॉन बेसब्री से उसका इंतजार कर रहा था। उसे देखते ही खिल उठा। गुलदस्ता आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘हैपी वेलेंटाइन!’ उसने भी जवाब दिया, ‘सेम टू यू!’ वे दोनों बोझिल कदमों से चलते हुए जमीन पर घास में बैठ गए। मंद-मंद बहती वसंती हवा में एक नशा था। वही जो जॉन के चेहरे पर दिख रहा था। वह काला जरूर था, पर लाल गुलाब की माफिक मुस्कुराता-सा दिखा उसे। सवालिया नजरों से देखते हुए वह बोली, ‘बोलो, क्या सुनना चाहते हो?’ ‘वही, मेरे सवाल का जवाब?’ वह मुंह से कुछ न बोली, मगर सिर हिला दिया। ‘मौन स्वीकृति है तुम्हारी?… लड़कियां मुंह से कभी नहीं कहतीं।’ जमीन कुरेदते हुए वह धीरे से मुस्कुरा दी। उसकी मुस्कुराहट में प्यार कम, मजबूरी ज्यादा थी। जॉन के चेहरे को देखते हुए वह बोली, ‘मगर मम्मी-पापा को नहीं बता सकती। अगर बता दूंगी तो सात जन्मों तक हम नहीं मिल पाएंगे। तुम समझते हो न जॉन।…पापा दिल के मरीज हैं। इसलिए एक ही रास्ता है कि चुपचाप कोर्ट मैरिज कर ली जाए। किसी को भी पता न चले।’ ‘ठीक है। मैं तैयार हूं।’ इतना कह जॉन उठ खड़ा हुआ। वह भी बोझिल कदमों से चल दी आॅफिस की तरफ। हाथ उठा कर जॉन बोला, ‘हैपी वेलेंटाइन-डे!’
कोर्ट में शादी की खानापूर्ति के बाद रजिस्टर पर दस्तखत कर सीधे चर्च की तरफ चल पड़े। रास्ते में जॉन बोला, ‘शादी की पार्टी का इंतजाम हो गया है। पर अब तो पापा-मम्मी को बताना ही होगा।’ ‘कैसे बताऊंगी?’ फिर कुछ सोचते हुए बोली, ‘यह कितना बड़ा धोखा है जॉन! तुममें धीरज नाम की चीज नहीं है। अब सोचो, सारा कुछ हो जाने के बाद अगर सीधे-सीधे उन्हें बताऊंगी तो कितना बड़ा झटका लगेगा। लेकिन अब कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा। मैं अपनी एक पक्की सहेली के भाई को जानती हूं। उन्हें भी कुछ नहीं पता है। पास ही मोहल्ले में रहते हैं। कोशिश करती हूं। अगर वे तैयार हो गए तो हमारा काम आसान हो जाएगा।’
चर्च से लौट पड़े थे वे दोनों। चौराहे पर आते ही वह बोली, ‘अच्छा अब मैं चलती हूं।’ वह सीधे अपनी सहेली की भाभी के घर पहुंच गई। सहेली की भाभी महिमा ने उसका गर्मजोशी से स्वागत किया, ‘शैलेंद्री, बहुत दिनों बाद हमारी याद आई? कैसी चल रही है तुम्हारी नौकरी?’ ‘ठीक है भाभी। मगर इस समय मैं एक जरूरी काम से आपके पास आई हूं।’ ‘बोलो!’ ‘पर कैसे कहूं? सब कुछ अचानक हो गया कि पापा तक को नहीं बता सकी। अब अगर मैं बोली तो अनर्थ हो जाएगा। पापा दिल के मरीज हैं।’ ‘बोलो तो सही, ऐसी क्या बात है?’ वह भाभी की सरलता से वाकिफ थी। सो, बोली, ‘मैंने कोर्ट मैरिज कर ली है। परसों रिसेप्सन रखा है।’ ‘मजाक कर रही है शैलेंद्री?’ ‘नहीं भाभी, सच है। अगर भैया यह बात पापा से कह दें तो?’ ‘लेकिन शैलेंद्री…?’ ‘लेकिन-वेकिन कुछ नहीं भाभी। आपको मेरी कसम!’ महिमा उठ खड़ी हुई, ‘पूछती हूं।’ ‘पूछने की जरूरत नहीं है। कल सुबह पापा को लेकर आ रही हूं। बस! भैया से कहिएगा कि बातों-बातों में बता दें। सीधे कहने से उन्हें धक्का लग सकता है।’ इतना कह वह उठ खड़ी हुई और तेजी से बाहर निकल गई।
सुबह-सुबह पापा को टहलाने के बहाने उन्हें महिमा के घर लेकर पहुंची। चाय-नाश्ते के बाद भाई उन्हें नीचे ले गए। और वह महिमा के साथ ऊपरी मंजिल पर बालकनी में जा बैठी। उसकी नजर पापा पर थी। बाकी महिमा की बातों के जवाब में वह सिर्फ हूं हां कर रही थी। पापा ने भाई से सवाल किया, ‘इतनी सुबह-सुबह कोई किसी के घर जाता है क्या? मुझे तुम्हारे घर क्यों लाई है?’ भाई बोला, ‘मुझे भी आश्चर्य हुआ। कल शाम वह आई थी। दोनों में किसी बात को लेकर गुफ्तगूं हो रही थी। पर मामला इतना सीरियस होगा मुझे नहीं लगा।’ ‘कौन-सा मामला?’ ‘यही कि शैलेंद्री ने जॉन से कोर्ट मैरिज कर ली है।’ पापा वहीं रुक गए। ‘क्या कह रहे हो? बूढ़े आदमी से इतना बड़ा मजाक! यह कैसे हो सकता है? कहां हम कोंकणी ब्राह्मण और कहां वह काला कुट्ट क्रिस्ती! मेरी बेटी चांद का टुकड़ा है।’ ‘पापाजी मान लीजिए, मुझे भी महिमा ने बताया तो विश्वास नहीं हुआ। एक कुलीन लड़की से यह उम्मीद न थी।’ ‘यह नहीं हो सकता। अगर यह षड्यंत्र हुआ है तो उसमें तुम भी शामिल हो।’ इतना कह वे जमीन पर बैठ गए। और वह भागती हुई आई। तुरंत रिक्शे से अस्पताल ले गई। जॉन भी आ गया था। पर हफ्ते भर बाद पापा चल बसे…।
उसने आईने में अपने आप को गौर से देखा। मुड्ढे पर बैठ गई। पीछे से आवाज आई। उसका प्यारा बेटा फ्रांसिस आवाज लगा रहा था, ‘देखो मम्मी, पापा आपके लिए क्या लाए हैं। भूल गई क्या, आज वेलेंटाइन डे है।’

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First Published on October 16, 2016 12:22 am

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