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अपमिश्रण : मिलावटी दूध का दंश

देश में हर साल दूध का उत्पादन तकरीबन 1463.10 लाख टन होता है। देश में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता तकरीबन 302 ग्राम होती है।
Author नई दिल्ली | April 3, 2016 01:02 am
खाद्य संरक्षा और मानक कानून मजाक बनकर रह गया है।

कुछ दिनों पहले विज्ञान और तकनीकी मंत्री हर्षवर्धन ने खुलासा किया कि देश में 68 फीसद से ज्यादा दूध मिलावटी है और वह खाद्य नियामक की ओर से तय मानकों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। गौर करें तो दूध की गुणवत्ता पर पहली बार प्रश्नचिह्न नहीं लगा है। पिछले साल उत्तर प्रदेष सरकार ने सर्वोच्च अदालत को बताया था कि 2012-13 में 1237 और 2013-14 में 185 मामलों में दूध और उसके उत्पादों में मिलावट पाई गई। इनमें से चार दर्जन से अधिक नमूनों में डिटर्जेंट, स्टार्च, वनस्पति तेल, ह्वाइटर आदि खतरनाक पदार्थों का मिश्रण पाया गया। पंजाब सरकार ने भी 785 मामलों में से 28 मामलों में मिलावट की बात स्वीकारी थी। इसी तरह हरियाणा सरकार समेत देश के दूसरे कई राज्यों द्वारा भी दूध और उसके उत्पादों में डिटर्जेंट और पानी की मिलावट की बात कबूली जा चुकी है।

आश्चर्य कि इस जानकारी के बाद भी राज्य सरकारें जानलेवा दूध की बिक्री रोक पाने में पूरी तरह विफल हैं। जबकि सर्वोच्च अदालत राज्य सरकारों को अनगिनत बार ताकीद कर चुका है कि वह भारतीय दंड संहिता की धारा 272 में आवश्यक संशोधन कर मिलावटखोरों को उम्रकैद तक की सजा देने का प्रावधान सुनिश्चित करें। पिछले दिनों सर्वोच्च अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि कानून के दांत तो मिलावटी दूध से गिर गए हैं और राज्य सरकारें इसे रोकने के बजाय पैसा एकत्र करने में ही खुश है। राज्य सरकारों द्वारा यह कहे जाने पर कि वे धारा 272 में संशोधन पर विचार कर रही हैं, न्यायालय ने नाखुशी जाहिर करते हुए कहा कि क्या जब लोग मरने लगेंगे तब कार्रवाई होगी? बेहतर होगा कि केंद्र और राज्य सरकारें न्यायालय से आंखमिचौली के बजाय सख्त कानून बनाकर मिलावटखोरों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करें। ध्यान रखना होगा कि दूध में मिलावट की समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है।

देश का हर परिवार इसे जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल में लाता है। स्वाभाविक है कि जब वह खतरनाक रसायनों द्वारा तैयार मिलावटी दूध का सेवन करेगा तो उसका स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित होगा ही। एक अरसे से मिलावटी दूध की बिक्री का सच अखबारों की सुर्खियां बन रहा है। पिछले साल केंद्र सरकार ने न्यायालय में दाखिल अपने हलफनामे में स्वीकारा था कि देश में 68 फीसद से अधिक दूध खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरणों के मानक के अनुरूप नहीं है। उसने न्यायालय को यह जानकारी उत्तराखंड के स्वामी अच्युतानंद तीर्थ के नेतृत्व में प्रबुद्ध नागरिकों की एक जनहित याचिका के जवाब में दी थी। याचिका में सिंथेटिक दूध और विभिन्न डेयरी उत्पादों की बिक्री पर अंकुश लगाने का अनुरोध किया गया। याचिका में यह आरोप लगाया गया कि सिंथेटिक और मिलावटी दूध और उसके उत्पाद यूरिया, डिटरजेंट, रिफाइंड आयल, कास्टिक सोडा और सफेद पेंट आदि से तैयार हो रहे हैं।

खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने भी माना कि दूध में घातक रसायन मिलाए जा रहे हैं। पिछले दिनों उसने खुले दूध और पैकेट वाले दूध में आमतौर पर होने वाली मिलावट का पता लगाने के इरादे से सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से दूध के 1791 नमूने एकत्र किए। ये नमूने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों से लिए गए। सार्वजनिक क्षेत्र की पांच प्रयोगशालाओं में इन नमूनों के विश्लेषण से जानकारी मिली कि इनमें से 68.4 फीसद नमूने मिलावटी हैं और वे निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं हैं। दिलचस्प बात यह है कि न्यायालय के आदेश के बाद भी राज्य सरकारें मिलावटी दूध को रोकने और मिलावटखोरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के लिए संजीदा नजर नहीं आ रही हंै। नतीजा यह है कि मिलावटखोरों का हौसला बुलंद है और वे अपने जानलेवा धंधे का लगातार विस्तार कर रहे हैं। यह सच्चाई है कि देश के सभी राज्यों में मिलावटी दूध का गोरखधंधा चरम पर है और यह राज्य सरकारों के संज्ञान में भी है। जब कभी जागरूक नागरिकों द्वारा इसके खिलाफ आवाज उठाया जाती है तो राज्य सरकारें मिलावटखोरों के खिलाफ हल्की-फुल्की कार्रवाई कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेती हैं। दूध के काले कारोबारियों पर लगाम नहीं लग पाता और लोग जहर पीने को मजबूर होते हैं।

पिछले वर्षों में देश में दूध उत्पादन तकरीबन 6.3 फीसद बढ़ा है। लेकिन गौर करें तो मौजूदा समय में दूध की खपत उसके उत्पादन से कहीं ज्यादा है। फिर समझना कठिन है कि दूध की आपूर्ति कहां से पूरी हो रही है? इसका सीधा मतलब है कि नकली दूध का कारोबार चरम पर है और सरकारें अपनी आंखें बंद किए हुए हैं। मिलावटी दूध से न केवल लोगों का स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है बल्कि इससे उत्पन्न रोगों के इलाज में भी लोगों को गाढ़ी कमाई लुटानी पड़ रही है।

एक आंकड़े के मुताबिक देश में सामान्य संक्रामक बीमारियों से निपटने में प्रतिवर्ष अस्सी हजार करोड़ रुपए खर्च होते हैं। इन बीमारियों के लिए काफी हद तक मिलावटी दूध भी जिम्मेदार है। ऐसा नहीं है कि राज्य सरकारों के पास मिलावटी दूध को रोकने के लिए कानून नहीं है। लेकिन सच्चाई यह है कि कानून का ईमानदारी से पालन नहीं हो रहा। खाद्य पदार्थों में मिलावटखोरी को रोकने और उनकी गुणवत्ता को स्तरीय बनाए रखने के लिए देश में खाद्य संरक्षा और मानक कानून 2011 से लागू है। इस कानून के मुताबिक घटिया, मिलावटी, नकली माल की बिक्री और भ्रामक विज्ञापन के मामले में संबंधित प्राधिकारी जुर्माना कर सकता है। इस कानून के तहत अप्राकृतिक और खराब गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री पर दो लाख रुपए, घटिया खाद्य पदार्थ की बिक्री पर पांच लाख रुपए, गलत ब्रांड खाद्य पदार्थ की बिक्री पर तीन लाख रुपए और भ्रामक विज्ञापन पर दस लाख रुपए तक का जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन सच्चाई है कि तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण गुनहगारों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पाती है और उनका हौसला बुलंद होता चला जाता है। आज जरूरत इस बात की है कि कानून का सख्ती से पालन हो और अन्य देशों की तरह खाद्य संरक्षा के मानक तय करने के साथ निगरानी के लिए एजेंसियों का गठन किया जाए। अमेरिका की खाद्य संरक्षा व्यवस्था दुनिया के बेहतरीन तंत्रों में शामिल है। इसे स्थानीय, राज्य और केंद्रीय स्तर पर लागू किया गया है।

वहां का खाद्य और औषधि विभाग फूड कोड प्रकाशित करता है, जिसमें मानक तय किए जाते हैं। उनका उल्लंघन गैरकानूनी है। इसी तरह आस्ट्रेलिया की खाद्य प्राधिकरण उपभोक्ताओं तक शुद्ध खाद्य पदार्थ पहुंचाने के लिए खाद्य कारोबार पर खाद्य संरक्षा मानकों को प्रभावी तरीके से लागू करता है। जर्मनी में उपभोक्ता अधिकार और खाद्य संरक्षा विभाग इस मामले को देखता है। पूरे जर्मनी में भोज्य पदार्थ बेचने के लिए किसी तरह का प्रतिबंध नहीं है लेकिन वह कानून के मुताबिक तय मानकों के अनुरूप होना चाहिए। लेकिन भारत में स्थिति उलट है।

खाद्य संरक्षा और मानक कानून मजाक बनकर रह गया है। उचित होगा कि केंद्र और राज्य सरकारें दूध समेत अन्य खाद्य पदार्थों में हो रही खतरनाक मिलावट पर रोकथाम लगाए और मिलावटखोरों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करे। साथ ही उपभोक्ताओं को भी जागरूक किया जाना जरूरी है। अच्छी बात है कि देश में ऐसा स्कैनर तैयार हो चुका है जो महज 40 सेकेंड में दूध में मिलावट का पता लगा लेगा और इस पर खर्च भी महज दस पैसे आएगा। बेहतर होगा कि सरकार प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए उपभोक्ताओं को मिलावटी दूध जांचने वाले यंत्र के प्रयोग के लिए प्रेरित करे।

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