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समस्याः शिक्षा पर कुपोषण की छाया

कुपोषण आज अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चिंता का विषय बन गया है। विश्व बैंक ने इसकी तुलना ‘ब्लैक डेथ’ नामक महामारी से की है, जिसने अठारहवीं सदी में यूरोप की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को निगल लिया था। सामान्य रूप में कुपोषण को चिकित्सीय मामला माना जाता है। दरअसल, कुपोषण बहुत सारे सामाजिक-राजनीतिक कारणों का परिणाम है।
Author October 16, 2016 00:43 am

विजन कुमार पांडेय

कुपोषण आज देश की एक बड़ी समस्या बनकर उभर रहा है। हाल में विश्व भूख सूचकांक में भारत 79वें नंबर पर है। कुपोषित बच्चों का दिमाग कभी भी विकसित नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में कुपोषण से छह सौ बच्चों की मौत पर संज्ञान लेते हुए पिछले हफ्ते फटकार लगाई थी। यह एक ऐसा चक्र है, जिसके चंगुल में बच्चे अपनी मां के गर्भ में ही फंस जाते हैं। उनके जीवन की रूपरेखा दुनिया में जन्म लेने के पहले ही तय हो जाती है। गरीबी और भुखमरी की स्याही से उनकी यह जीवन लीला
लिखी जाती है। इसका रंग स्याह उदास होता है। इसमें जीवन की सभी आशा खत्म हो जाती है। यह शरीर का पर्याप्त विकास रोक देता है। एक स्तर के बाद यह मानसिक विकास की प्रक्रिया को भी अवरूद्ध करने लगता है। बहुत छोटे बच्चों, खासतौर पर जन्म से लेकर पांच साल तक की आयु तक के बच्चों को भोजन के जरिए पर्याप्त पोषण आहार न मिलने के कारण उनमें कुपोषण की समस्या जन्म ले लेती है। इसके परिणाम स्वरूप बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता का ह्रास होता है और छोटी-छोटी बीमारियां उनकी मृत्यु का कारण बन जाती हैं। स्कूल में कदम रखते ही उन्हे बीमारियां घेरने लगती हैं। फिर वे पढ़ाई से भागने लगते हैं। आंखों में चश्मा बचपन में ही लग जाता जो जिंदगी भर नहीं उतरता।

कुपोषण आज अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चिंता का विषय बन गया है। विश्व बैंक ने इसकी तुलना ‘ब्लैक डेथ’ नामक महामारी से की है, जिसने अठारहवीं सदी में यूरोप की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को निगल लिया था। सामान्य रूप में कुपोषण को चिकित्सीय मामला माना जाता है। दरअसल, कुपोषण बहुत सारे सामाजिक-राजनीतिक कारणों का परिणाम है। जब राजनीतिक एजेंडे में भूख और गरीबी नहीं होती तो बड़ी तादाद में कुपोषण पसरता है। हमारे देश में कुपोषण बांग्लादेश और नेपाल से भी अधिक है। बांग्लादेश में शिशु मृत्यु दर अड़तालीस प्रति हजार है, जबकि इसकी तुलना में भारत में यह 67 प्रति हजार है। यहां तक की यह उपसहारा अफ्रीकी देशों से भी अधिक है। भारत में कुपोषण की दर लगभग पचपन फीसद है, जबकि उपसहारीय अफ्रीका में यह सत्ताईस फीसद के आसपास है।

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में हर साल कुपोषण के कारण मरने वाले पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों की संख्या दस लाख से भी ज्यादा है। दक्षिण एशिया में भारत कुपोषण के मामले में सबसे बुरी हालत में है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में किए गए सर्वेक्षणों में देखा गया कि देश के सबसे गरीब इलाकों में आज भी बच्चे भुखमरी के कारण अपनी जान गवां रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो स्थिति और भयावह होगी। संयुक्त राष्ट्र ने भारत में जो आंकड़े पाए हैं, वे अंतरराष्ट्रीय स्तर से कई गुना ज्यादा हैं। इसके बावजूद राजनीतिक दल इसमें केवल अपना राजनीतिक लाभ देख रहे हैं। वे शायद यह भूल जाते हैं कि यही बच्चे उनके भविष्य के वोट बैंक हैं।’कुपोषण बच्चों को सबसे अधिक प्रभावित करता है। यह जन्म या उससे भी पहले शुरू होता है और छह महीने से तीन साल की अवधि में तीव्रता से बढ़ता है। इसके परिणाम स्वरूप वृध्दिबाधिता, मृत्यु, कम दक्षता और बौद्धिक लब्धता का नुकसान होता है। सबसे भयंकर परिणाम इसके द्वारा जनित आर्थिक नुकसान होता है। कुपोषण के कारण मानव उत्पादकता 10.15 प्रतिशत तक कम हो जाती है जो सकल घरेलू उत्पाद को 5.10 प्रतिशत तक कम कर सकता है।

कुपोषण के कारण बड़ी तादाद में बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। कुपोषित बच्चों की सीखने की क्षमता कम हो जाती है। ऐसे बच्चे स्कूल नहीं जाना चाहते। उनकी याददाश्त कम हो जाती है, जिससे वे हीनभावना से ग्रस्त हो जाते हैं। वे खुद को स्कूल में रोक नहीं पाते क्योंकि शिक्षक उनकी परेशानियों को नहीं सुनते। स्कूल से बाहर वे सामाजिक उपेक्षा के शिकार होते हैं। गरीबी के कारण वे जीवनपर्यंत शोषण के शिकार होते रहते है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में बच्चे बाल श्रमिक या बाल वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर हो जाते हैं। बड़े होने पर वे अकुशल मजदूरों की लंबी कतार में जुड़ जाते हैं, जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ बनता है। जहां तक मध्यप्रदेश का संदर्भ है यहां कुपोषण की स्थिति काफी चिंताजनक है। वहां 55 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं और इतने ही बच्चों की मौतें कुपोषण के कारण होती हैं। इस समय मध्यप्रदेश में देश में सर्वाधिक कम वजन के बच्चे हैं और यह स्थिति 1990 से यथावत है। कुपोषण की दर 64 प्रतिशत से बढ़कर 76 प्रतिशत हो गई है। तीन वर्ष की आयु के बच्चों में चार में से तीन बच्चे रक्ताल्पता से ग्रसित हैं। पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में एक हजार में से चार बच्चे रतौंधी से ग्रसित हैं। आज मध्य प्रदेश में कुपोषण एक गंभीर जन समस्या बन गई है। सारे राज्यों में से सर्वाधिक कम वजन के बच्चे यहां पर हैं। सर्वाधिक कम वजन के बच्चों की संख्या 1990 से बदली नहीं है।

कुपोषण विकास और सीखने की क्षमता के लिए एक गंभीर खतरा है। बच्चों में कुपोषण की स्थिति राज्य की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ है, जिस पर राज्य सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। कुपोषण इस प्रकार देश की एक जटिल समस्या है। इसके लिए घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है और यह तभी संभव है जब गरीब समर्थक नीतियां बनाई जाए जो कुपोषण और भूख को समाप्त करने के प्रति लक्षित हों। हमें ब्राजील से सीखना चाहिए जहां भूख और कुपोषण को राष्ट्रीय लज्जा माना जाता है। कुपोषण कार्यक्रमों और गतिविधियों से नहीं रुक सकता है। इसके लिए एक मजबूत जन समर्पण और पहल जरूरी है। जब तक खाद्य सुरक्षा के लिए दूरगामी नीतियां निर्धारित नहीं होंगी और बच्चों को नीति निर्धारण और बजट आवंटन में प्राथमिकता नहीं दी जाएगी तब तक कुपोषण के निवारण में अधिक प्रगति संभव नहीं है।१

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