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पहलः सुधार का दायरा

स्वास्थ्य मंत्रालय की ‘डॉक्टर आॅन कॉल’ योजना के तहत टोल फ्री नंबर 1075 पर देश के किसी भी हिस्से से फोन कर लोग अपनी सामान्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का समाधान पा सकेंगे। कॉल सेंटर पर डॉक्टर जैसे ही दवा की सलाह देगा उस दवा का नाम और खुराक का ब्योरा तुरंत मरीज के उस मोबाइल नंबर पर भी पहुंच जाएगा जो कॉल रिसीव करते समय दर्ज होगा।
Author December 4, 2016 01:07 am

विवेक कुमार बडोला

किसी देश में समाज और सरकार का समुचित अस्तित्व तब ही सत्यनिष्ठा पर परखा जा सकता है जब वहां के निवासियों को जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं उनके परिश्रम के बाद सुगमता से मिलें। लोकतांत्रिक राष्ट्र की मौलिक अवधारणा भी इसी ध्येय के संचालन के लिए बनाई गई थी। लेकिन आज भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की मूलभूत जीवन जरूरतें उनके खून-पसीने से युक्त परिश्रम के बावजूद असाध्य बनी हुई हैं। स्वस्थ भोजन, शुद्ध जल, स्वास्थ्य सुरक्षा सहित जिंदगी की तमाम अन्य जरूरतें जैसे अधिकांश जनता के लिए विलासी-स्वप्न के पूरे होने के समान बन चुकी हैं। पिछले लगभग सत्तर वर्षों के गणतांत्रिक भारतीय इतिहास का सार्वजनिक जीवन और जनदर्शन तो हमें इसी वातावरण की झलक दिखाता है। दाना-पानी और आवास की जरूरतों से तो देश का आम नागरिक किसी तरह समझौता कर लेता है, लेकिन जहां स्वास्थ्य संकट की बात उठती है तो उसके हाथ-पांव फूलने लगते हैं। यह सब इसलिए होता है क्योंकि देश में सरकारी और निजी स्वास्थ्य सेवाएं अपनी-अपनी तरह की दुर्व्यवस्थाओं के सहारे चल रही हैं। रोजगार के कारण गांवों से हुए पिछले चार दशकों के पलायन से देश के नगरों और महानगरों पर अप्रत्याशित जनसंख्या बोझ बढ़ा। शासकीय-प्रशासकीय व्यवस्था ने इस समस्या के निराकरण के लिए सरकारों को सचेत करना तो दूर इस ओर ध्यान भी नहीं दिया। समय के साथ यह समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। जनसंख्या भार से शहरी जीवन कराह रहा है। इसके समाधान के लिए अगर वे समय-समय पर राजनीतिक दलों के नेताओं को चेताते भी हैं लेकिन राजनेता अब इसी जनसंख्या भार को अपने वोटबैंक में तब्दील कर उसका अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए हरसंभव फायदा उठाना चाहते हैं। इस कारण नगरों और महानगरों की सरकारी नागरिक सेवाएं बदहाल हैं। रोजी-रोटी, पेयजल और आवासीय व्यवस्था तो बिगड़ी ही हुई है लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं का सरकारी स्तर भी आबादी के भार से बुरी तरह चरमराया हुआ है। इसकी प्रतिक्रिया में अगर निजी स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ, बड़े-बड़े और सुविधाजनक चिकित्सालयों की स्थापना हुई भी लेकिन वह देश की पचहत्तर प्रतिशत गरीब जनता की पहुंच से बहुत दूर है।

दो वर्ष पूर्व तक देश में निजी स्वास्थ्य सेवाएं गरीब लोगों के लिए एक स्वप्न समान अवश्य थीं, लेकिन अब केंद्र सरकार ने इस दिशा में एक अच्छा कदम उठाया है। केंद्र सरकार ने देशभर के लोगों को अपनी सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं के लिए प्रामाणिक डॉक्टरी सलाह घर बैठे देने के विचार को कार्यरूप देने का निर्णय कर लिया है। इसके लिए उसने निविदा प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस व्यवस्था के तहत सरकार टोल फ्री नंबर के माध्यम से लोगों को निशुल्क चिकित्सकीय सलाह प्रदान करेगी। यह सेवा हिंदी और अंग्रेजी सहित कुल तेईस भाषाओं में होगी और लोग घर बैठे साल के बारह महीने चौबीसों घंटे चिकित्सा संबंधी सलाह प्राप्त कर सकेंगे। इसके पहले चरण में ही पांच सौ परामर्शदाता काम करेंगे जो लोगों से उनके विभिन्न रोगों के निदान के लिए जुड़ेंगे। सरकार को उम्मीद है कि इस सेवा के शुरू होने के बाद सरकारी अस्पतालों का चिकित्सकीय बोझ कम हो जाएगा।
स्वास्थ्य मंत्रालय की ‘डॉक्टर आॅन कॉल’ योजना के तहत टोल फ्री नंबर 1075 पर देश के किसी भी हिस्से से फोन कर लोग अपनी सामान्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का समाधान पा सकेंगे। कॉल सेंटर पर डॉक्टर जैसे ही दवा की सलाह देगा उस दवा का नाम और खुराक का ब्योरा तुरंत मरीज के उस मोबाइल नंबर पर भी पहुंच जाएगा जो कॉल रिसीव करते समय दर्ज होगा। इस योजना के प्रथम चरण में डॉक्टर केवल ऐसी दवा की ही सलाह देंगे जो बिना डॉक्टरी पर्चे के बाजार में खरीदी जा सके। द्वितीय चरण में रोगोपचार के लिए मोबाइल परचे को भी मंजूरी देने का विचार किया जा रहा है। और अगर रोगी चाहे तो उसके रोग से संबंधित समस्त विवरण उसके क्षेत्र की स्वास्थ्य कार्यकर्ता और सरकारी परिचारिका (नर्स या एएनएम) को भी भेज दिए जाएंगे ताकि वह आगे की सहायता के लिए उनसे संपर्क कर सके।

यह निशुल्क सेवा चलाने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय निजी एजेंसियों की पहचान कर रहा है। मंत्रालय के अधीन काम करनेवाले सेंटर फॉर हेल्थ इन्फार्मेटिक्स (सीएचआइ) ने इसके लिए विगत 21 अक्टूबर को प्रस्ताव के लिए अनुरोध (आरएफपी) जारी कर निजी एजेंसियों से निविदा मंगा ली है जिन पर अब विचार किया जा रहा है। इसी टोल फ्री नंबर पर बच्चों के टीकाकरण और टीबी या एड्स नियंत्रण जैसे सरकारी कार्यक्रमों के बारे में जानकारी भी मिलेगी। साथ ही निकटवर्ती सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों, चिकित्सालयों के अलावा स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और एनएनएम के बारे में भी लोगों को सूचना मिलेगी। इसका प्रांरभ पांच सौ सीटों वाले कॉल सेंटर से होगा जिसे अगले तीन साल में छह सौ सीटों तक बढ़ा दिया जाएगा।

रोग के कारण आपात स्थिति में फंसे लोगों के फोन सीधे एलोपैथिक डॉक्टर के पास किए जा सकेंगे, जबकि सामान्य रोगियों को आयुर्वेद और होम्योपैथ का विकल्प भी दिया जाएगा। इस आॅनलाइन सेवा नंबर पर परामर्श सेवा भी उपलब्ध होगी जिसका विशेष लाभ तंबाकू, नशा छोड़ने के इच्छुक लोगों या अवसाद रोगियों को मिल सकेगा। इस संपूर्ण प्रक्रिया में पहले स्तर पर पंजीकरण अभिकर्ता होंगे जो रोगी का नाम, मोबाइल नंबर जैसे विवरण लिखकर उनका पंजीकरण करेंगे। दूसरे स्तर पर नर्सिंग और चिकित्सकीय कर्मचारी होंगे जो रोग या समस्या को सुनेंगे और समझेंगे। इसके बाद वे रोगी को उसके रोग के संबंध में सामान्य परामर्श देंगे कि उन्हें ऐसे रोग की स्थिति में क्या करना चाहिए और क्या नहीं। तीसरे स्तर पर चिकित्सक और चिकित्सा प्रशिक्षु होंगे जो रोगोपचार के लिए जरूरत के हिसाब से दवा देंगे या जरूरी चिकित्सा करेंगे।

सरकार ने आकलन किया कि प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों में आने वाले 85 प्रतिशत लोगों का इलाज केवल उनकी बीमारी के लक्षण देखकर किया जाता है। जब ऐसी स्थिति है तो इनमें से अधिकांश लोगों का इलाज कॉल सेंटर पर चिकित्सकीय परामर्श से सुविधाजनक तरीके से हो सकेगा। इस व्यवस्था के बाद लोगों को अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र जाने में धन और कीमती समय बर्बाद करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। चिकित्सालयों में आपातकालीन स्थिति में कई बार चिकित्सक और नर्स उपलबध नहीं होते। जबकि यह सेवा चौबीसों घंटे उपलब्ध रहेगी। इस सेवा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें रोगी और चिकित्सा कर्मियों को आवागमन की समस्याओं से मुक्ति मिलेगी जो कहीं न कहीं दोनों पक्षों को स्वास्थ्य जैसी अहम जिम्मेदारी के निर्वहन से दूर किए रहती है। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सरकार इस सेवा के क्रियान्वयन के लिए समग्र सरकारी, शासकीय-प्रशासकीय और अन्य स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के मध्य सुगम समन्वय बनाए रखे। तभी ऐसी योजनाओं को दीर्घजीवी बनाकर जनसेवा के अनुकूल बनाए रखा जा सकता है। ०

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