December 06, 2016

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मुद्दा: प्रतिभा पलायन के दुष्परिणाम

मानव संसाधन विकास मंत्रालय और एसोचैम जैसे संस्थानों को इस बात पर ध्यान देने कि जरूरत है कि इसे कैसे रोका जाए।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

ए क ओर भारत में उच्च शिक्षा के स्तर को लेकर सवाल उठते रहे हैं तो दूसरी ओर पढ़ने के लिए छात्र बड़ी संख्या में विदेशों का रुख कर रहे हैं। भारतीय छात्रों के माध्यम से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर मिल रहे हैं, जिसका दुष्प्रभाव हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। प्रतिभा किसी एक ही देश की परिरक्षित निधि नहीं है। प्रत्येक देश के अपने-अपने क्षेत्र के प्रवीण व्यक्ति होते हैं, जैसे वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ, साहित्य या कलाओं के विद्वान, चित्रकार, कलाकार आदि। असाधारण प्रतिभा संपन्न ऐसे पुरुष और स्त्रियां अपने देश की प्रगति और समृद्धि में योगदान तो देते ही हैं साथ ही अपनी विशिष्टता वाले क्षेत्र में भी उत्कर्षता लाते हैं। यह कोई असामान्य बात नहीं है कि इन योग्य व्यक्तियों में से कुछ लोगों को अपने ही देश में कोई संतोषजनक काम नहीं मिल पाता या किसी न किसी कारण से वे अपने वातावरण से तालमेल नहीं बिठा पाते। ऐसी परिस्थितियों में ये लोग बेहतर काम की खोज के लिए या अधिक भौतिक सुविधाओं के लिए दूसरे देशों में चले जाते हैं। इस निर्गमन को प्रतिभा पलायन की संज्ञा दी गई है।

आज अपने कुशल और प्रतिभा-संपन्न व्यक्तियों की हानि से विकासशील देश सब से अधिक प्रभावित हुए हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि विकासशील देशों में वेतन और अन्य सुविधाओं के रूप में प्राप्त होने वाले लाभ कम हैं। जिसमें भारत भी एक है। भारत में उच्च शिक्षा के स्तर को लेकर हमेशा ही सवाल उठते रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग में भारतीय विश्वविद्यालय पहले सौ संस्थानों में अपनी जगह क्यों नहीं बना पाते हैं? शीर्ष भारतीय संस्थानों में कोई मौलिक शोधकार्य क्यों नहीं होता है? दाखिले में आरक्षण का मुद्दा ऊंचे अंक हासिल करने के बावजूद दाखिले से वंचित रह जाना, शिक्षक और छात्रों का बिगड़ा हुआ अनुपात, प्रोफेसरों और कुलपतियों की राजनीतिक नियुक्तियां आदि ने पूरी व्यवस्था बिगाड़ रखी है। किस तरह से उच्च शिक्षा संस्थान अकादमिक भ्रष्टाचार और औसत दर्जे के डिग्रीधारकों के उत्पादन की फैक्ट्रियां बन गए हैं। इन सवालों में एक बड़ा सवाल अब यह भी जुड़ गया है कि इतनी बड़ी संख्या में भारतीय छात्र विदेशों का रुख क्यों कर रहे हैं? इतना ही नहीं, इन छात्रों के साथ फीस और पढ़ाई का पैसा भी बहकर विदेशों में जा रहा है।

‘ओपन डोर’ संस्था की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 2015-16 में अमेरिकी कॉलेजों में दाखिला लेने वाले भारतीय छात्रों में पच्चीस फीसद वृद्धि हुई है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उन्होंने पांच अरब रुपए का योगदान दिया है। सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि पिछले कुछ साल में यूरोप और आॅस्ट्रेलिया जाने वाले छात्रों में भी नाटकीय ढंग से वृद्धि हुई है। जबकि इसी दौर में भारत में बड़ी संख्या में उच्च शिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालय खुले हैं। आखिर ये छात्र देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में क्यों नहीं पढ़ना चाहते? विदेश वे ही छात्र जा पाते हैं जिनके पास पैसे की कमी नहीं है चाहे वह कालेधन के रूप में ही क्यों न हो?

आ ज भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी व्यवस्थाओं में एक मानी जाती है। 2030 तक भारत में कॉलेज जाने की उम्र वाले चौदह करोड़ से अधिक लोग होंगे और ये विश्व का सबसे जवान देश माना जाएगा। ताजा हालात में भारत के लिए ये चुनौती होगी कि वह किस तरह से इन संभावित विद्यार्थियों को स्वदेश में ही रोके और उनकी प्रतिभा और योग्यता का अपने यहां अधिकतम इस्तेमाल कर सके, ताकि वे मेक अप इंडिया में अपना सहयोग कर सकें।
प्रतिभा पलायन की सबसे बड़ी वजह है कि विदेशी डिग्री, खासतौर पर अमेरिकी डिग्री से नौकरी पाना आसान है। आर्थिक उदारीकरण के बाद मध्यमवर्गीय परिवारों की आय का स्तर बढ़ा है और उनकी नजर में भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली में सीमित अवसर हैं। भारत में चुनिंदा विश्वविद्यालयों में ही पढ़ाई का स्तर ठीक है और सीमित सीटों के कारण वहां दाखिला दुष्कर होता जा रहा है। ज्यादातर छात्र विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित पढ़ने के लिए बाहर जाते हैं। बेशुमार सरकारी स्कॉलरशिप और अनुदान से छात्रों का बाहर जाकर पढ़ने का सपना आसान हो गया है।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय और एसोचैम जैसे संस्थानों को इस बात पर ध्यान देने कि जरूरत है कि इसे कैसे रोका जाए। प्रतिभा पलायन अब निश्चित रूप से घाटे का सौदा बनता जा रहा है। प्रतिभा पलायन रोकने के लिए आइआइटी और आइआइएम जैसे और संस्थान स्थापित किए जाने की जरूरत है। विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपने कैंपस खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उनके लिए कर रियायतें और प्रोत्साहन दी जानी चाहिएं जिससे हमारे देश का शिक्षा स्तर ऊपर हो। इससे प्रतिभा पलायन पर भी लगाम लगेगी। दूसरी तरफ उच्च शिक्षा के लिए सिर्फ सरकार पर ही निर्भर रहना उचित नहीं है बल्कि उद्योग और अकादमिक सहयोग से नई संस्थाएं स्थापित करना चाहिए और उनका स्तर बढ़ाया जाना चाहिए।

सरकार द्वारा उच्च शिक्षा की फीस भी बढ़ाई जाए क्योंकि जो छात्र विदेशों में इतना खर्च करने के लिए तैयार हैं वे अच्छी शिक्षा के लिए स्वदेश में भी खर्च कर सकते हैं। जहां तक गरीब छात्रों का सवाल है उनके लिए अमेरिका की तरह गारंटी प्रणाली की स्थापना की जाए जहां उन्हें बिना अभिभावकों की सुरक्षा के भी सस्ते ऋण मिल सकें। विदेशों में पढ़ने के लिए उदार भाव से दी जा रही सरकारी छात्रवृत्तियों और अनुदानों में भी कटौती की जा सकती है। अभी ब्राजील ने ऐसा किया है और उसके बाद वहां के छात्रों के विदेश जाने में कमी आई है। लेकिन ‘सबको शिक्षा सबको काम’ के मूलभूत अधिकार के संवैधानिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो उच्चशिक्षा को सीधे-सीधे निजी क्षेत्र के हवाले कर देना भी उचित नहीं होगा। आज विदेश का रुख करने वाले छात्रों के लिए एक आकर्षक विकल्प देश में ही पैदा करने की जरूरत है। अधिकांश सरकारी संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए एक आमूलचूल बदलाव की जरूरत है। शिक्षा माफिया के काले धन पर भी सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत है। यह शिक्षा व्यवस्था को दीमक की तरह चाट रहे हैं।

एक वैज्ञानिक या चिकित्सक या ज्ञान के किसी अन्य क्षेत्र का विशेषज्ञ कम वेतन और अन्य कठिनाइयों को भी सह सकता है, अगर उसकी योग्यता को अच्छी मान्यता मिले। उसके काम का ठीक मूल्यांकन हो तो वे विदेश नहीं जाएंगे। अच्छे प्रकार के साधन संपन्न प्रयोगशालाएं या पुस्तकालय राष्ट्रीय प्रतिभाओं में से अधिकांश को अपनी मातृभूमि छोड़ने से रोक देंगे चाहे विदेशों में कितना अधिक वेतन क्यों न उन्हें मिले। एक महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति अधिक धन कमाने के लिए विदेश में चला जाता है क्योंकि उसका अपना देश उसके मन की इच्छाओं की पूर्ति के मार्ग में बहुत से कानूनी और राजनीतिक प्रतिबंध लगाता है। दूसरी ओर विकसित देशों के ऐसे लोग बहुत ही कम होंगे जो अपना देश छोड़ कर विकासशील देशों में गए होंगे। विकसित देशों के रहन-सहन के ऊंचे स्तर ने विकासशील क्षेत्रों के लोगों को सदा ही अत्यधिक आकृष्ट किया है और प्रतिभाशाली लोग और विशेषज्ञ भी इस मोहजाल से अपने आप को नहीं बचा पाए। इसका परिणाम यह हुआ कि विकासशील देशों के अधिकांश प्रतिभासंपन्न व्यक्ति रहन-सहन के इस स्तर को प्राप्त करने में प्रसन्नता का अनुभव करने लगे जो कि विकसित देशों के एक साधारण नागरिक को भी उपलब्ध होती है। इसलिए ऐसी सुविधा देश में ही उपलब्ध कराने की योजना बनाई जाए। १

 

 

 

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First Published on November 27, 2016 2:53 am

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