ताज़ा खबर
 

प्रयाग शुक्ल की कहानी : कम्प्यूटर स्क्रीन पर मोर

वह कॉलेज में थी तब कुछ रूमानी-सी कहानियां लिखी थी। और पिता के साधनों से एक छोटी-सी पुस्तिका भी छपा ली थी।
Author नई दिल्ली | August 20, 2016 22:11 pm
representative image

माधव उठ कर चला गया तो थोड़ी देर तक वह इधर-उधर निहारती रही, फिर उसने अपने नीले रूमाल में लिपटी हुई चाभी को थोड़ी देर तक इस तरह देखा जैसे वह उसकी न हो, किसी और की हो, कोई उसे वहां रख कर भूल गया हो। हां, जब वह पार्क के दो-तीन चक्कर लगा लेने के बाद पत्थर की इस बेंच पर आकर बैठी थी, तो कुछ बेफिक्री के साथ ही उसने रूमाल और चाभी को अपनी बगल में रख दिया था। माधव भी जब बेंच पर आकर बैठ गया था तो उसने बस चाबी और रूमाल को अपनी ओर थोड़ा-सा खिसका लिया था, जैसे माधव के लिए जगह बना रही हो, हालांकि पत्थर की बेंच बड़ी थी और उसमें अगर चार नहीं, तो तीन लोग आराम से बैठ सकते हैं। बहरहाल, चाभी और रूमाल के बीच उसकी उगलियां कुछ इस तरह उलझीं मानो वह उन्हें उठाए या न उठाए, के सोच में हो, फिर वह उंगलियां उसकी गोद में आकर सिमट गर्इं। नहीं, थोड़ी देर वह यहां और बैठना चाहती है। अभी से होटल के कमरे में जाकर क्या करेगी? चली गई तो कोई न कोई दरवाजा खटखटा कर पूछ ही बैठेगा, ‘रागिनी आपने चाय पी ली।’ ‘आपने’ और ‘रागिनी’ की जगह, संबोधन चाची, मौसी बुआ, मामी, नानी, दादी आदि का भी हो सकता है। पूरा कुनबा ही तो इकठ्ठा है होटल में।

दूर-पास के रिश्तेदार, एक शादी के मौके पर यहीं रह रहे हैं, होटल में, जबकि जिस परिवार में यह शादी है, उसका बड़ा-सा घर इसी शहर में है। अपने ही शहर में, जहां वह बड़ी हुई, और पढ़ी-लिखी है, वहीं एक होटल में ठहरने की बात सोच कर रागिनी चौंकी जरूर थी। पर, उसके बेटे अरुण ने ठीक ही तो कहा था, मां यह अरेंजमेंट तो बहुत अच्छा है, आपको कोई दिक्कत न होगी। आप अपनी तरह से रह सकेंगी। फिर उसने नेट पर उस होटल की तस्वीरें उसे दिखाई थीं- स्वीमिंग पूल की, बगीचे में दो-एक मोरों की, जो होटल के उस बगीचे में टहल रहे थे, जिन्हें देख कर उसके भीतर कुछ जागा था- बचपन में जयपुर के अपने घर की छत पर और घर के सामने के लॉन में, वह मोरों को टहलते हुए देखती थी। कभी-कभी उनके पीछे दौड़ती थी। पर, वह तो बहुत दिनों पहले की बात है। उसकी छवियां धुंधला गई हैं। उसके देखे हुए मोरों की जगह, कंप्यूटर का यह मोर सामने है, जो संभव है, होटल में रहते हुए उसे दिख जाए, पर वह कैसे पहचानेगी कि यह वही मोर है जो कंप्यूटर स्क्रीन पर उसने देखा था। अरुण ने उसे होटल के कमरे भी दिखाए थे। कमरे बड़े थे, फर्नीचर अच्छा था सुरुचिपूर्ण। और कमरा छेटे-से फ्रिज, एयरकंडीशनर आदि से लैस था। बेडशीट ठेठ राजस्थानी थी, और बिस्तर पर कई छोटे-बड़े कुशन, गाव तकिए आदि सजे थे। अरुण ने उसे वाई-फाई की सुविधा सुलभ होने की सूचना भी दी। और जो विदेशी होटल की विजिटर्स बुक में होटल की प्रशंसा में कुछ शब्द लिख कर गए थे, उनके वे प्रशंसात्मक शब्द भी अरुण ने पढ़ कर सुनाए थे। वह सुनती रही थी। पर, सोचती कुछ और रही थी। यही कि वह नौ बरस बाद जयपुर जा रही है। सुनती है, वहां काफी कुछ बदल गया है। गाड़ियां बढ़ी हैं। ट्राफिक जाम भी होने लगे हैं।

और यह सब सही निकला है। उससे भी ज्यादा सही, जो उसने लगभग उदासीन मन से सुना-जाना था। अचानक ठंडी-सी हवा बही और सचमुच कहीं कोयल बोली। न जाने कहां से एक तरंग-सी उठी और एक मीठी-उदास-सी धुन के साथ उसके भीतर से गुजर गई, जिसे मानो उसके मन ने ही अनुभव किया, जाना। शरीर ने नहीं। पर, ऐसा भला कभी होता है क्या!
सहसा रागिनी के होठों पर एक स्मिति भी आ बसी। उसकी सहेली जया कहा करती थी न, ‘मिट्टी का माधो’। उसने तब यही कहा था, तू भी न जाने क्या-क्या मनगढ़ंत बातें बना लेती है। माधव बस पड़ोसी ही तो है, हम साथ-साथ बड़े हुए हैं। साथ खेलते भी थे। दोस्ती तो होनी ही थी।

‘अच्छा दोस्ती, पर कैसी दोस्ती!’ रागिनी तब बात को आगे नहीं बढ़ाती थी। वह कहां जानती थी कि उस दोस्ती को क्या नाम, रूप दिया जाए!
पर, कोई एक रेख तो है, जो खिंची थी…
क्या ‘मिट्टी के माधो’ के मन ने भी उस रेख का अनुभव किया है!
पास के पेड़ से कुछ पत्तियां झरीं। दो-तीन उसके रूमाल और चाभी पर भी आकर बैठ गर्इं।

बहुत दिनों बाद रागिनी को ऐसी फुर्सत मिली है। वह चाहे तो बैठी रहे, चाहे उठ जाए। और होटल में शादी के लिए जो लोग ठहरे हैं, वे भी सचमुच आपको ‘परेशान’ नहीं करते- वे चाहे पुरानी पीढ़ी के हों या नई पीढ़ी के। उसे आए अभी डेढ़ दिन ही तो हुए हैं। कुछ लोग डिनर के समय मिले, कुछ नाश्ते के! थोड़ी-बहुत बातें हुर्इं। उसने कई परिजनों से अपनी प्रशंसा सुनी, ‘देखो तो रागिनी को, बिल्कुल वैसी ही लगती है। पिछली बार कब मिले थे? हां, दस बरस तो हो गए।’ उसे यह प्रशंसा एक संतोष से भर गई। वह आईना देखती है, और जानती है कि इस प्रशंसा में कुछ सच्चाई तो है ही। बेटी और बहू, दोनों ने उसे जींस-टॉप पहनने के लिए मजबूर किया, तो वह पहनने लगी थी। उसे वह ड्रेस खुद अच्छी लगने लगी थी। और सलवार-कमीज में भी वह भला ढीली-ढाली-ढली कहां लगती है!

इस बार, उसमें सचमुच कैसी और कितनी स्मृतियां जाग रही हैं। किशोर दिनों की भी। घर दो मंजिला था। कभी उसकी सहेलियां और उसके भाई के दोस्त भी-खूब मिल कर धमा-चौकड़ी मचाते। शाम को सीढ़ियों में अंधेरा-सा रहता, जब तक वहां कोई दीया या लालटेन न रख दी जाती। उसके भाई का एक दोस्त था, नलिन। एक दिन उसे न जाने क्या सूझी कि सीढ़ियों पर उसके बालों-गालों को सहला कर, वह ओ ओ, कहता हुआ भाग गया। यह बात उसने कभी किसी को बताई नहीं। और लगता है नलिन भी इसे किसी फिल्मी-से दृश्य की नकल भर मान कर, उससे आगे इसी तरह पेश आता रहा, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

हां, कुछ तो नहीं हुआ था- उसने भी फिर यही मान लिया था। ‘हुआ’ सिर्फ इतना था कि उस वक्त उसकी उम्र जिस मोड़ पर थी, उसमें यह बच्चों का-सा खेल, शरीर में एक और तरह की चीज भर गया था। यह बात उसे याद भी न रहती, अगर थोड़े-थोड़े दिनों के अंतराल पर वह ऐसा ही कुछ करता हुआ, अचानक भाग न जाया करता। पर, एक दिन नलिन ने अपना हाथ, अपने आप खींच लिया था, जैसे यह हरकत न करने वाली हरकत हो! क्या यह बात उसके ‘पुरुष’ बनने की निशानी थी? कि नहीं, एक लड़की के साथ ‘अब’ ऐसा करना ठीक नहीं है। वह बड़ी हो गई है!

मानो, आज इस सबको समझ कर वह मुस्कराई और जिसको लेकर उसके मन में एक दिन रोष, लज्जा, और कुछ गलत घटित हो जाने के भाव मन में उमड़े थे, वे ‘कुछ नहीं’ जैसे मालूम पड़े। समय बहुत कुछ सिखा-समझा देता है। और ‘मिट्टी का माधो’ प्रसंग भी, क्या एक ‘आकर्षण मात्र’ का प्रसंग नहीं था- दो युवाओं के बीच किसी तरह की चाहत भर का प्रसंग!
वह आसमान की ओर देखने लगीं। एक चिड़िया उड़ती हुई दिखाई पड़ी और कुछ बादल यहां-वहां छितरे हुए। उसे यह सोच कर अच्छा लगा कि विवाह के लिए परिजनों की जो मंडली होटल में इकठ्ठा है, उसमें शायद ही कोई उन्हें मिस कर रहा होगा। और यह कितनी बड़ी राहत की बात है! अब वह अमेरिका रिटर्न्ड चाची, बुआ आदि नहीं रही, न वह ‘रागिनी’, जिसकी ओर कुछ अलग से, विशेष ध्यान देने की जरूरत हो। यहां तो प्राय: सबके बच्चे-परिजन अब विदेश में हैं। और सबका पहनावा ऐसा है कि उसके लिए ‘विदेश में बसा/ बसी’ होने की जरूरत नहीं है। वह अपनी मौसेरी बहन को ‘पलाज्जो पैंट्स’ और कुर्ते में देख कर चौंकी नहीं- उस मौसेरी बहन को जो लगभग उसी की उम्र की है, और जो कभी सिर्फ साड़ी में दिखती थी!

उम्र! रागिनी अब साठ की देहरी पर है। विक्रम से विवाह जब हुआ तब बाइस-तेईस की ही थी। बहुत दिनों बाद, उन दिनों की याद आई। पिता इंजीनियर थे। बड़ा नाम था। शहर में अपनी तरह का मान-सम्मान भी। तब शादियों में दस-पंद्रह दिन का गाना-बजाना हुआ करता था। सो, वह भी हुआ था।

किसी ओर न देखती हुई रागिनी को रह-रह कर कई पगचापें सुनाई पड़तीं, और कभी-कभी हवा में तैरती हुई, पास से गुजरती हुई बातों के टुकड़े! जीवन में कुछ न कुछ घटता ही रहता है। न जाने कितने लोगों को हम किसी ट्रेन, बस, बाजार में देखते हैं, और फिर उनकी शक्लें भी याद नहीं रहतीं। न जाने कितने परिजनों, प्रियजनों से बिछुड़ते हैं, फिर मिलते है। नई पीढ़ियों के चेहरे, और फिर वे भी कहीं गुम हो जाते हैं। पड़ोस बदलते हैं, शहर बदलते हैं, स्कूल, कॉलेज बदलते हैं। दिन, हर दिन, किसी न किसी रूप में कुछ नया घटित कर जाता है।

अब यह माधव से ही मिलना। बिल्कुल अचानक। संयोगवश। वह किसी ओर देख रही थी कि पास की आहट से उसने मुंह घुमा कर देखा तो माधव खड़ा था। लगभग वैसा ही। चेहरा जैसे हल्का-सा बड़ा हो गया हो और शरीर भी कुछ इस तरह भरा हुआ, कि ‘गोल मटोल’ होने की ओर हल्का-सा सरक गया हो। बालों में स्वाभाविक सफेदी थी! वैसे ही नाक-नक्श। किसी का भी ध्यान बंटाने के लिए उत्सुक से। वह अचकचा कर खड़ी होने को थी कि माधव ने उसे बरज दिया और स्वयं उसकी ओर थोड़े-से फासले पर बैठ गया। रागिनी भी बैठी रही, नीले रूमाल को अपनी ओर खींचती हुई सी। ‘तुम घर पर नहीं ठहरी हो क्या?’ माधव ने पूछा। रागिनी ने सब बताया कि उसकी बड़ी चचेरी बहन के बेटे की बेटी की शादी है। बारात भी इसी होटल में आकर, ठहरने वाली है आज। ‘दादी!’ हंस कर माधव ने उसकी ओर देखा। वह भी मुस्कराई।

माधव को घर जाकर तैयार होना है, आज किसी के साथ आॅफिस में उसका अपाइंटमेंट है, साढ़े नौ बजे! सो, उसे जाना होगा- यही कहता हुआ तो उठा था माधव उस पत्थर की बेंच से। तो माधव अभी उसी घर में है। उसके घर से चार-पांच घर छोड़ कर। रागिनी के मन में कुछ छवियां बनीं, उभरीं, तिरोहित हुर्इं उस घर की, पड़ोस की।

हां, अब उसे भी उठ पड़ना चाहिए। साढ़े सात क्या, पौने आठ होने को आए। विक्रम का फोन भी आ सकता है। कमरे में ही फोन पर बात करना उसे अच्छा लगता है। इस आदत की याद ने जयसिंह सर्किल के भीतर बने इस उद्यान में मानो बाहर के शोर को- चलती, घूमती गाड़ियों के शोर को- भीतर ला दिया, जिसे रागिनी अब तक भुलाए हुए-सी बैठी थी। दिन ऐसे ही तो बीतते हैं, जैसे कि सर्किल का एक चक्कर लगाती गाड़ियां या इससे फूटने वाली किसी सड़क की ओर मुड़ जाती हुर्इं गाड़ियां, धीमी, कभी तेज, कभी हॉर्न बजाती हुर्इं, कभी बस सर्र से गुजर जाती हुर्इं और कभी किसी संयोग से, इस सर्किल के चारों ओर ‘न गुजरती’ गाड़ियां, अपनी अनुपस्थिति से थोड़ी देर का एक मौन-सा रच देती हुर्इं।

हां, अब उसे उठ पड़ना चाहिए- यही फिर एक बार सोचा, रागिनी ने, पर हर बार की तरह, इस निर्णय को परे सरकाती हुई वह पत्थर की बेंच पर पीठ टिका कर थोड़ा-सा पसर गई और एक चंपा-पेड़ के फूलों की ओर देखने लगी। यही सोचती हुई कि कोई कंपलीमेंटरी ब्रेकफास्ट के लिए, तैयार हो रहा होगा, कोई स्वीमिंग पूल की ओर निकल जाने के लिए, और दिन के, शाम के जो कार्यक्रम बनाए जा रहे होंगे उनमें ‘स्पा’ और ‘मॉल’ का जिक्र जरूर होगा। उसने जरूर ‘बापू बाजार’ देखने की इच्छा एक बार जताई थी और कई कौतुक भरी, चौंकतीं-सी आंखें उसकी ओर उठी थीं।… पर, वह तो बचपन की, युवा दिनों की स्मृतियों से जुड़ा है, उसे कैसे भूल सकती है, रागिनी!

नहीं, अब तो उठना ही है, मन ही मन यह कहती हुई उठी रागिनी… दरअसल, एक नहीं, दो होटल बुक किए गए हैं, आसपास के, एक में ठहरे हैं घराती, एक में बाराती।
युवा दिनों में तो हम मानो मात्र एक संकेत से, एक क्षीण से आग्रह के साथ, कहीं पर भी चलने को राजी हो जाते थे, पर कोई भी कैसा भी दबाव आएगा, ‘मॉल’ या ‘स्पा’ का तो उसे रागिनी टाल जाएगी। जाएगी वहीं जहां सचमुच मन करेगा। एक बार बापू बाजार… इस वक्त रागिनी की चाल में कोई तेजी नहीं है, न ही वह शिथिल है, शरीर में न जाने कौन-सा ‘हल्कापन’ उतर आया है। कुछ-कुछ वैसा जैसा पानी में तैरते वक्त होता है।

उसके मन में न जाने यह स्मृति क्या सोच कर उतरी है… और कुछ नहीं, उड़ती हुई-सी मल्लिका की याद आ गई है- कहां, होगी अब मल्लिका। कई वर्षों से उससे कोई संपर्क नहीं हुआ। वह कॉलेज में थी तब कुछ रूमानी-सी कहानियां लिखी थी। और पिता के साधनों से एक छोटी-सी पुस्तिका भी छपा ली थी। वे सब भावुक, ‘कल्पना’ कर ली गई; या कच्ची-पक्की-सी सुनी-सुनाई प्रेम कहानियां थीं, एक नए अवतार में-सब सहेलियां, उन्हें पढ़ कर हंसी थीं, कभी-कभार उसे चिढ़ाती-छेड़ती थीं- भला उन दिनों की स्मृतियों का कोई अंत है। यह अलग बात है कि उनमें से प्राय: सभी, हवा में उड़ते, कागज के उन पृष्ठों की तरह हैं, जिनमें से कभी किसी की ओर हाथ बढ़ जाता है, अनायास, कभी किसी और के, उन्हें ‘समेटने’ के लिए।

घड़ी देखी तो आठ बजने को थे। कभी सोचा नहीं था कि एक दिन अपने ही शहर के भीतर के इस उद्यान में आकर वह सैर करेगी… यह सर्किल तो उसके घर से दूर ही था। हां, यहां से पहले भी वह गुजरी कई बार है, पर, हमेशा वाहनों में- इसके पास की एक सड़क पर से। उसने मेन गेट से होटल में प्रवेश किया। दो गार्ड ही दिखाई पड़े, और होटल के बड़े-से लॉन को घेरे हुए, पेड़-पौधों की वह हरी बाड़ दिखाई पड़ी, जो सड़क से होटल के भीतरी दृश्य को छिपा लेती थी- अलग करती थी। एक बहुत ऊंची दीवार की तरह-लॉन में टहलते हुए एक मोर को देख कर उसके मन में फिर कुछ उभरा-सा। तभी तीन-चार विदेशी स्त्री-पुरुष पास से गुजरे, उसका ध्यान कुछ बंटा, और मोर अपने बड़े-से पंख फैला कर उड़ गया।

वह थोड़ी देर वहीं खड़ी रही। क्या कभी यह मोर ही कंप्यूटर स्क्रीन पर फिर दिखेगा, यही मोर, जिसकी तस्वीर खींच कर होटल की वेबसाइट पर डाली जाएगी… या कोई परिजन ही इसकी तस्वीर खींच कर शादी की अन्य तस्वीरों के साथ ‘वाट्सऐप’ पर डाल देगा… और वह भी इसकी एक झलक देख कर, आज के, अभी के इस मोर की याद एक बार फिर करेगी… या फिर आज दिखा यह मोर अब कभी नहीं दिखेगा… न यथार्थ में, न स्मृति में ही- बहुत स्पष्ट होकर, और न ही वह कंप्यूटर स्क्रीन पर कभी दिखेगा- कौन जाने! पर ‘अभी’ तो है। अभी तो था। और उसे देखना कितना अच्छा लगा है, यही सोचती हुई रागिनी अपने कमरे की ओर बढ़ गई। एक संभावना यह भी तो है कि किसी दिन जब कम्प्यूटर स्क्रीन पर कुछ अक्षर भी हों कोई इमेज न हो तो सहसा उभर आए मोर की मेज!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.