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कहानी- होशियार गुलाम

लोग तो दिन में न जाने कितनी बार झूठ बोलते हैं और तुम तो साल में बस एक बार झूठ बोलते हो। मेरे यहां तो लगभग सभी गुलाम ऐसे हैं, पर मैंने उन्हें इस बात पर नहीं बेचा।’
Author November 12, 2017 05:04 am
अली भी ऐसा ही एक गुलाम था। वह बहुत मेहनती और हृष्ट-पुष्ट युवक था। वह कई बार बिक चुका था।

यह  दिनों की बात है जब इराक में गुलाम प्रथा प्रचलित थी। इस प्रथा के अनुसार गरीब व्यक्ति अमीर के पास गुलाम बन जाते थे और गुलामों का व्यापार भी किया जाता था। अगर किसी कारणवश अमीर गुलाम व्यक्ति को नहीं रख पाता था तो फिर वह उसे गुलामों की मंडी में जाकर बेच आता था। अली भी ऐसा ही एक गुलाम था। वह बहुत मेहनती और हृष्ट-पुष्ट युवक था। वह कई बार बिक चुका था। इस बार उसे एक बार फिर से बेचने के लिए गुलामों की मंडी में लाया गया था। एक धनी शेख इब्न-बिन-सऊद मंडी में अच्छे गुलाम की तलाश में था। उसकी नजर हट्टे-कट्टे अली पर पड़ी। उसे अपने घर के लिए एक ऐसे ही गुलाम की तलाश थी। उसने अली को वाजिब दाम देकर खरीद लिया और अपने घर ले आया। रास्ते में अली और उसका नया मालिक शेख-इब्न-बिन सऊद बोला, ‘क्या तू अपने मालिक के यहां पहली बार गुलामी कर रहा था।’ अली, शेख से बोला, ‘नहीं मुझे सातवीं बार बेचा गया है।’ इस पर शेख उसे हैरानी से देखता हुआ बोला, ‘तू क्या कामचोर है, जो तुझे इतनी बार खरीदा-बेचा गया है।’ अली बोला, ‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। मैं कामचोर बिल्कुल नहीं हूं। मेरे काम से अभी तक किसी को कोई शिकायत नहीं हुई।’  यह सुन कर शेख झल्ला कर बोला, ‘अगर ऐसा है तो फिर तुझे बार-बार क्यों बेचा गया?’ इस पर अली कुछ सोचते हुए बोला, ‘कुछ खास बात नहीं मालिक, बस मेरे अंदर एक ही कमी है कि मैं साल में एक बार झूठ बोलता हंू।’ यह सुन कर शेख और हैरान हो गया। वह बोला, ‘यह कौन-सी बड़ी बात है। लोग तो दिन में न जाने कितनी बार झूठ बोलते हैं और तुम तो साल में बस एक बार झूठ बोलते हो। मेरे यहां तो लगभग सभी गुलाम ऐसे हैं, पर मैंने उन्हें इस बात पर नहीं बेचा।’

अली बोला, ‘शेख साहब, दरअसल साल में बोला गया मेरा एक ही झूठ सब झूठ पर भारी पड़ जाता है। आप भी मेरा एक साल बाद बोला गया झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे।’ यह सुन कर शेख बोला, ‘मैं तुम्हारा झूठ बर्दाश्त कर पाऊंगा और अगर नहीं कर पाया तो मैं तुम्हें आजाद कर दूंगा।’ यह सुन कर अली की बांछें खिल गर्इं। दिन बीतते रहे। आखिर एक साल भी होने को आया। अब अली के झूठ बोलने की बारी थी। एक दिन शेख अली को लेकर अपने गोदाम पर गया। वहां जाकर उसे याद आया कि वह घर की तिजोरी खुली छोड़ आया है। अब अली उसका स्वामिभक्त गुलाम था। वह अली से बोला, ‘जा, घर जाकर देख कर आ कि कहीं तिजोरी खुली तो नहीं रह गई।’ मालिक के हुक्म के अनुसार अली तुरंत घर के लिए रवाना हो गया। अब उसके मन में मुक्ति की भावना पनपी। उसने रास्ते में अपने कपड़े फाड़ लिए और सीना पीट-पीट कर रोने लगा। उसे बुरी तरह रोता हुआ देख कर लोग उसके पास आकर कारण पूछने लगे। वह बोला, ‘अभी-अभी मेरे शेख-इब्न-बिन सऊद अल्लाह को प्यारे हो गए हैं। वे बड़े ही नेक बंदे थे।’  शेख की उस नगर में बहुत साख थी। लगभग सभी लोग उससे परिचित थे। अचानक यह समाचार सुन कर वे भी हैरान रह गए। जल्दी ही यह खबर आग की तरह फैल गई।

अली भीड़ में यह खबर फैला कर वहां से आंख बचा कर निकला और मालकिन के पास आकर अपना सिर पीट-पीट कर रोने लगा। मालकिन बोली, ‘क्या हुआ? इतनी बुरी तरह क्यों रो रहे हो?’ अली रोते हुए बोला, ‘मालकिन, मालिक गोदाम में चौकी पर बैठ कर बोरियों का हिसाब लगा रहे थे कि अचानक कई बोरियां उन पर धड़ाम से आ गिरीं और उन्होंने वहीं दम तोड़ दिया।’ यह खबर सुन कर मालकिन का दिल धक्क से रह गया। वह भी बुरी तरह रोने-चिल्लाने लगी। काफी देर रोने-पीटने के बाद मालकिन अली से बोली, ‘चल, अब उन्हें दफनाने की तैयारी करनी है। तू उनका शव लेकर कब्रिस्तान पहुंच।’ अली रोता-पीटता वापस गोदाम की ओर लौट पड़ा। उधर शेख ने अली की ऐसी हालत देखी तो वह बोला, ‘क्या हो गया तुझे? सब ठीक तो है न। यहां से तू तो अच्छी तरह गया था।’ अली रोते हुए बोला, ‘मालिक क्या बताऊं? घर में आग लगी हुई थी और मालकिन उस आग में जल कर अल्लाह को प्यारी हो गर्इं। डाकू तिजोरी का माल लूट कर ले गए और घर में आग लगा कर चले गए।’ यह सुन कर मालिक भी दहाड़ मार कर रोने लगा। फिर कुछ देर बाद वह बोला, ‘चल घर चलें।’ यह सुन कर अली बोला, ‘शेख साहब मालकिन को कब्रिस्तान पहुंचा दिया गया है। वहां सब आपका इंतजार कर रहे हैं।’ यह सुन कर शेख रोता-पीटता कब्रिस्तान की ओर पहुंचा। वहां उसने मालकिन को खड़ा पाया तो वह उसे भूत समझ कर भागने लगा। मालकिन भी शेख को जिंदा देख कर डर गई और दोनों एक-दूसरे को देख कर भयभीत हो गए।

तब मालकिन बोली, ‘अली ने तो बताया था कि आप बोरियों के नीचे दब कर मर गए हैं।’ शेख बोला, ‘इसने मुझे भी यही कहा था कि मालकिन जल कर मर गई हैं।’ यह बोल कर शेख अली की ओर घूमा और गुस्से से बोला, ‘यह क्या किया तूने? मैं तुझे आज जिंदा नहीं छोड़ूंगा।’ यह सुन कर अली मुस्कराते हुए बोला, ‘मालिक आप अपने वादे से मुकर रहे हैं। आपने कहा था कि अगर आप मेरे झूठ को हजम कर गए तो मुझे आजाद कर देंगे। अब या तो आप मेरे झूठ को हजम करिए या फिर मुझे आजाद करिए। हां, पर इतना याद रखिएगा कि अगर आपने मेरे इस झूठ को हजम कर लिया तो फिर अगले साल मैं ऐसा ही एक और झूठ बोलूंगा।’ यह सुन कर शेख बौखला कर बोला, ‘ओ जा… यहां से दफा हो… मैंने तुझे आजाद कर दिया।’ इस तरह अली अपनी बुद्धिमानी से गुलाम जीवन से मुक्त होकर आजादी का जीवन जीने लगा। ०

 

 

 

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