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सफलता की विराट उड़ान

कोहली की कप्तानी की सबसे बड़ी खासियत है, कभी हार नहीं मानना। जब चटापट विकेट गिर जाएं तो बल्ले से टीम को संकट से निकालना उनकी आदत बन गया है। जब विपक्षी बल्लेबाज हावी होते दिखाई देते हैं तो भारतीय कप्तान अपने दांवपेच इस बखूबी से खेलता है कि उसमें नाकामी की गुंजाइश न रह जाए।
Author December 4, 2016 01:19 am
विराट कोहली

सुरेश कौशिक

टैस्ट क्रिकेट में विराट और टीम इंडिया के नाम एक और कामयाबी। इंग्लैंड के खिलाफ मोहाली टैस्ट में मिली जीत से सफलता का सिलसिला जारी हैं। सोलह टैस्ट से भारतीय टीम अजेय है। रिकार्ड से बस एक टैस्ट दूर। बीस टैस्ट मैचों में बारह में जीत दिलाना किसी भी कप्तान के लिए गौरवमय आंकड़ा है। क्रिकेट जैसे खेल में सफलता बल्लेबाजों और गेंदबाजों के कमाल से ही नहीं मिलती, इसमें कप्तानी की भी भूमिका अहम रहती है। कप्तानी एक ऐसा कौशल है जो आपकी साख को बना या बिगाड़ सकता है। कप्तान होने के नाते आपका पहला काम टीम साथियों को बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करना होता है। साथियों को प्रेरित करने के लिए अगर कप्तान खुद प्रेरणादायी प्रदर्शन करता है तो यह सोने पर सुहागा होता है।
मैदान पर प्रतिकूल होती परिस्थिति को किस तरह अपने अनुकूल करना, विपक्षी टीम के बल्लेबाजों की कमजोरियों को भांपना, किस तरह की गेंदबाजी की जाए उसकी रणनीति बनाना, फील्डिंग की सजावट जैसे कई पहलुओं पर कप्तान को अपनी कुशलता की छाप छोड़नी पड़ती है। भारतीय टीम खुशकिस्मत है कि महेंद्र सिंह धोनी के शानदार सफर के बाद टैस्ट टीम की कमान को विराट कोहली ने बखूबी संभाला है। बल्ले से जोरदार प्रदर्शन के साथ-साथ कप्तानी में अपने आक्रामक रवैये से विराट ने सभी को प्रभावित किया है। इंग्लैंड के खिलाफ चल रही शृंखला में भारत ने पहले तीन में से दो टैस्ट जीत कर दिखाए। अक्सर यह कहा जाता है कि स्पिनरों की मददगार पिचें बनाकर भारत मेहमान टीमों को पस्त करता है। लेकिन इस बार ज्यादा टर्न नहीं ले रही पिचों के बावजूद अपने गेंदबाजी कौशल से भारतीय स्पिनरों ने इंग्लैंड के बल्लेबाजों को नतमस्तक किया है।
कोहली की कप्तानी की सबसे बड़ी खासियत है, कभी हार नहीं मानना। जब चटापट विकेट गिर जाएं तो बल्ले से टीम को संकट से निकालना उनकी आदत बन गया है। जब विपक्षी बल्लेबाज हावी होते दिखाई देते हैं तो भारतीय कप्तान अपने दांवपेच इस बखूबी से खेलता है कि उसमें नाकामी की गुंजाइश न रह जाए।
यह ठीक है कि शृंखला में भारतीय टीम की सफलता में स्पिनरों की भूमिका अहम रही लेकिन इस दौरान ऐसे भी मौके आए जब तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी और उमेश यादव अपने कप्तान के भरोसे पर खरे उतरे। जब भी कोहली को विकेट की जरूरत पड़ी इन तेज गेंदबाजों ने उन्हें निराश नहीं किया। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि कोहली ने अपनी तरकस के हर बाण का इस्तेमाल बाखूबी किया।
एक सफल कप्तान कभी नहीं चाहता कि टीम पर खिलाड़ियों की चोटों का संकट आए लेकिन इस शृंखला में शिखर धवन, केएल राहुल, गौतम गंभीर और रिधिमन साहा को चोट के कारण दूर रहना पड़ा। लेकिन उनके विकल्प के रूप में मिले खिलाड़ियों से प्रेरणादायी प्रदर्शन करा कर विराट ने इनकी कमी नहीं खलने दी। और तो और, राजकोट टैस्ट की दूसरी पारी में प्रभावी गेंदबाजी करने वाले लेग स्पिनर अमित मिश्रा को दूसरे टैस्ट की प्लेइंग इलेवन से बाहर कर कप्तान कोहली ने सभी को चौंका दिया। क्लिप के तौर पर खिलाए गए जयंत यादव उनकी कसौटी पर खरे उतरे। हर टैस्ट में किसी नए खिलाड़ी को मौका देना भी विराट कोहली का अचूक दांव बन गया है। रविचंद्रन अश्विन के टीम में रहते उन्होंने एक और आॅफ स्पिनर को भी खिलाने का जो फैसला किया वह मास्टर स्ट्रोक साबित हुआ। इस गेंदबाज यादव ने दूसरे और तीसरे टैस्ट में विकेट तो झटके ही, उपयोगी पारियां खेलकर बल्ले से छाप छोड़ी। जिस अंदाज में मोहाली में टैस्ट की पहली पारी में जयंत यादव ने अपने करिअर की पहला अर्द्धशतक लगाकर भारतीय पारी को मजबूती दी, उससे खिलाड़ी का आत्मविश्वास काफी बढ़ा है।

वेस्टइंडीज दौरे पर अपनी बल्लेबाजी के कौशल की छाप छोड़ने वाले विकेट कीपर साहा का मोहाली टैस्ट से पहले चोटिल होना कप्तान के लिए बड़ा झटका था। यह समस्या आन खड़ी हुई कि किसे खिलाया जाए। ऐसे में रणजी ट्राफी में ताबड़तोड़ रन बना रहे दिल्ली के युवा विकेट कीपर ऋषभ पंत को मौका देना बनता था। लेकिन कप्तान और कोच अनिल कुंबले ने उनके दावे को दरकिनार कर गुजरात के अनुभवी विकेट कीपर पार्थिव पटेल को वर्षों बाद टीम में खेलने का मौका दिया। खब्बू बल्लेबाज पार्थिव पटेल ने ओपनर के तौर पर मोहाली टैस्ट की दोनों पारियों में बढ़िया प्रदर्शन करते हुए क्रमश: 42 और नाबाद 67 रन बनाए। पार्थिव के इस प्रदर्शन में एक और विकल्प खोल दिया है। साहा की वापसी की स्थिति में पार्थिव को ओपनर की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।
टीम इंडिया की कमान संभालना सबसे मुश्किल जिम्मेदारी है। अलग-अलग राज्यों से आए क्रिकेटरों को एक टीम में पिरोना काफी टेढ़ा काम है। पर जो कप्तान साहसिक हो, कड़े फैसले लेने से घबराता नहीं हो, खुद प्रेरणादायी प्रदर्शन से खिलाड़ियों का भरोसा जीतता हो, उसके लिए हर मुश्किल आसान हो जाती है। विराट में जज्बा ही नहीं, बदला लेने की भी आग है जो उन्हें उग्र बना देती है।
इंग्लैंड से पिछली तीन शृंखला में हार का सिलसिला तोड़ने के लिए वह छटपटा रहे हैं। केवल जीत ही नहीं, बड़े अंतर से जीत दर्ज कर वह हिसाब बराबर करना चाहते हैं। कैप्टन कूल धोनी के विपरीत अपने आक्रामक अंदाज से विराट भारतीय क्रिकेट के सबसे सफल कप्तान बनने की दिशा में अग्रसर है। उनकी टैस्ट जीत का 60 फीसद औसत भारतीय कप्तानों में सबसे बढ़िया है। 20 में से उन्होंने केवल दो टैस्ट हारे, 12 जीते 6 ड्रा रहा। एमएस धोनी की सफलता का औसत 45 प्रतिशत है। उन्होंने 60 में से 27 टैस्ट जीते, 18 हारे, 15 ड्रा खेले।
सौरव गांगुली, जिन्हें भारतीय क्रिकेट में क्रांति लाने वाला कप्तान माना जाता है, ने 49 टैस्ट मैंचों में टीम इंडिया को 21 बार विजयी बनाया। उनकी सफलता का फीसद 42.85 रहा। अजहर ने 29.78 की औसत से 47 में से 14 टैस्ट जीते। भारतीय क्रिकेट के धुरंधर रहे सुनील गावस्कर, कपिल देव और सचिन तेंदुलकर कप्तान के तौर पर अपनी चमक नहीं बिखेर पाए।
विश्व के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज माने जाने वाले तेंदुलकर ने 25 टैस्ट मैंचों में कप्तानी की और टीम को सिर्फ चार टैस्ट मैच जिता पाए। गावस्कर ने 47 में से हारे भले ही 8 टैस्ट, लेकिन सुरक्षात्मक कप्तानी से उनका औसत 19.14 ही रहा। टाइगर पटौदी अच्छे कप्तान थे मगर 40 में से 19 टैस्ट हार जाने से उनकी छवि को नुकसान रहा। अजित वाडेकर भाग्यशाली कप्तान रहे। 1971 में उन्होंने भारत को वेस्ट इंडीज और इंग्लैंड पर ऐतिहासिक दिलाई थी। ०ू

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