January 23, 2017

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मुद्दाः समाज बनाम बाजार

हमारे लिए आज चुनौती क्या है? इस सवाल का जवाब ही यह साफ करेगा कि हम देश और समाज को लेकर किस तरह की चेतना से भरे हैं।

Author October 16, 2016 00:39 am

प्रेम प्रकाश

हमारे लिए आज चुनौती क्या है? इस सवाल का जवाब ही यह साफ करेगा कि हम देश और समाज को लेकर किस तरह की चेतना से भरे हैं। वह चेतना जो पूरी तरह बाजार प्रायोजित है या फिर ऐसी चेतना जो विचार और समाज को एक सीध में देखने की चुनौती सामने रखती है। इस सवाल और चिंता को लेकर हमारी समझ की स्थिति क्या है, इसके लिए एक दिन की चर्चा काफी है। ग्यारह अक्तूबर वैसे तो कैलेंडर के बाकी दिनों तक एक आम दिन है। पर इस दिन को मीडिया और उसमें भी खास तौर पर टीवी चैनलों ने इसलिए खास बना दिया क्योंकि यह अभिनेता अमिताभ बच्चन का जन्मदिन है। पर एक कथित महानायक को याद करते हुए हमारे दौर के लिए दो जरूरी नाम अक्सर या तो छूट जाते हैं या फिर कम ही याद आते हैं। ये दो नाम हैं जयप्रकाश नारायण यानी जेपी और नानाजी देशमुख का। ग्यारह अक्तूबर को इनकी भी जयंती है। जेपी को जनता ने ही कभी लोकनायक कहा था तो नानाजी आधुनिक राजनीति में संत छवि को जीने और निभाने वाले थे।
21वीं सदी के दूसरे दशक के आगाज के साथ भारतीय लोकतंत्र को सशक्त करने वाले कुछ शुभ संकेत प्रकट हुए। सड़कों पर तिरंगा लेकर देश के नवनिर्माण के लिए उतरने वाले नौजवानों की ललक में भले बहुत गंभीरता न हो और पर इस ललक की प्रासंगिकता और ईमानदारी पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है।
इस ललक के आलोक में ही देश में 1974 के बाद फिर से यह स्थिति आई कि हम देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसकी बुनियादी अवधारणा के साथ खुली मुठभेड़ कर सकें। इस मुठभेड़ ने ही यह साफ किया कि जो व्यवस्था भ्रष्टाचार की महामारी फैलाने की मशीनरी बन गई है, उसके कायम रहते राष्ट्रीय विकास और नवनिर्माण जैसे किसी लक्ष्य तक पहुंचने का संकल्प कैसे पूरा हो सकता है। जिस नई पीढ़ी की वैचारिक-सामाजिक संलग्नता को लेकर हम तरह-तरह के आग्रह-पूर्वाग्रह पाले बैठे हैं, उस फेसबुकिया पीढ़ी ने आगे आकर यह साफ किया कि सेक्स, सक्सेस और सेंसेक्स से आगे उसकी उड़ान देश और समाज के रचनात्मक उन्नयन से भी जुड़ी है। देश की युवाशक्ति की यह नई शिनाख्त राष्ट्रनिर्माण में उनकी प्रासंगिक भूमिका की नई पटकथा की तरह है, जिसमें अभी कई घटनाक्रम जुड़ने बाकी हैं।
कुछ अरसे पहले टीवी पर एक विज्ञापन खूब चला, जिसमें नेता और राजनीति में बदलाव के लिए माहौल को बदलने की बात जोर-.शोर से की गई। विज्ञापन का संदेश था कि पुराने माहौल और पुरानी राहों ने अगर हमें निराश किया है तो निश्चित रूप से नए परिवेश और नए पथ की बात होनी चाहिए। यहां तक तो विज्ञापन की सैद्धांतिक टेक समझ में आती है पर क्षोभ तब हुअ जब पता चलता है यह सब दिखाया-समझाया इसलिए जा रहा है क्योंकि एक महंगा प्लाई कवर बेचना है। जिस दौर में लोकतंत्र भी ‘एड मैनेजमेंट’ का एक जरूरी विषय बन जाए, उसमें इतनी बात तो जरूर कही जा सकती है कि लोकतंत्र की बेहतरी के लिए एक जरूरी रचनात्मक हस्तक्षेप की भूमिका बन चुकी है। अब तो बस इसके आगे के अध्याय लिखे जाने हैं।
जेपी बिहार आंदोलन के दिनों में अक्सर कहा करते थे कि जनता को ‘कैप्चर आॅफ पावर’ के लिए नहीं बल्कि ‘कंट्रोल आॅफ पावर’ के लिए संघर्ष करना चाहिए। अच्छी बात यह है कि राजनीति की जगह लोकनीति और सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात अब फिर से होने लगी है। असंतोष सिर्फ इस बात को लेकर है कि लोकतांत्रिक सशक्तीकरण के इन जरूरी मुद्दों को गिनाने वाले मुंह और खुले मंच तो आज कई हैं, पर आमतौर पर इनका सरलीकृत भाष्य ही परोसा जा रहा है।

यह सरलीकरण खतरनाक इसलिए है क्योंकि इसमें खास किस्म की सामाजिक सक्रियता और बाजारू ताकतों, दोनों को सिर माथे चढ़ाने का भाव है। यह मलेरिया के मच्छर और उसके टीके को एक साथ लेकर चलने की स्थिति है। यह एक छल है। यह एक तरफ तो अमिताभ बच्चन और सचिन तेंदुलकर जैसों के स्टारडम को पाए की तरह खड़ा करता है तो लोकनायक जैसी शख्सियत को भूलने की चालाकी भी बरतता है। बदलाव न तो बिकाऊ हो सकता है और न चलताऊ।
जेपी की लोकनीति और उसके लिए बनी लोक समिति ने कारगर तौर पर अपना प्रभाव भले न दिखाया हो पर उसका सबक तो आज भी प्रासंगिक है। और यह सबक यही है कि ग्रामसभा से लेकर लोकसभा तक का पिरामिड अगर उलटा खड़ा है तो देश में लोकतंत्र की क्या स्थिति है? यह अपने आप में विचारणीय है। लोकतंत्र की आत्मा न तो
तंत्र में है और न ही इसके किसी शीर्ष में। यह आत्मा तो स्वाभाविक रूप से लोक में बसती है। यही नहीं, केंद्रीकरण के उलट विकेंद्रीकरण लोकतंत्र का स्वाभाविक चरित्र है। अपने इस चरित्र के साथ ही लोकतंत्र सर्वाधिक रूप से कारगर है। लोकसभा या विधानसभा की तरह ग्रामसभा कभी विघटित नहीं होती है। इसका अस्तित्व हमेशा कायम रहता है और संबंधित क्षेत्र के अठारह साल के सभी नागरिक इसके आजीवन सदस्य हैं। जेपी ने बिहार आंदोलन के दौरान ये बातें चीख-चीखकर कहीं। पर न तो इस आंदोलन से निकलीं सियासी जमातें इस बात को जनता के बीच एक मुद्दे की शक्ल देने का साहस दिखा पा रही हैं और न ही जेपी का नाम लेने वाली कार्यकर्ताओं की फौज इस दिशा में कोई ठोस और बड़ी पहल कर पा रही है।
आइकन गढ़ने और उन्हें मान्यता देने में फौरी बाजारवादी ताकतें आज कुछ ज्यादा ही उतावली दिखा रही हैं। एक देश के जीवन में परंपरा और इतिहास के भी कुछ जरूरी सबक होते हैं। जेपी ऐसे ही एक सबक का नाम है, जिसको भूलने का मतलब लोकतांत्रिक सुधार की प्रक्रिया को स्थगित करना है। इस स्थगन को तब और खतरनाक मानना चाहिए जब वह बाजार के एक महानायक के महिमामंडन में व्यस्त हो जाए। समाज को लोकनायक चाहिए होता है, जबकि बाजार को महानायक। लेकिन, जनता को इतना प्रशिक्षित करना जरूरी है कि वह इसका फर्क समझ ले।

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First Published on October 16, 2016 12:39 am

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