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शिक्षा : भय के साए में पढ़ाई

देश के उच्चतम न्यायालय में भी कुछ वर्षों पूर्व एक जनहित याचिका के माध्यम से असुरक्षित स्कूलों का मामला लाया जा चुका है।
वास्तव में जरूरत इसकी भी है कि स्थितियां ऐसी बनें कि माता-पिता बच्चों को कहीं भी बच्चों को स्कूल भेजने में डरे नहीं।

कई बार माता-पिताओं के संदेहों और अंधविश्वासों के बोए बीज ही बच्चों को स्कूलों में भयभीत या आशंकित बने रहने के कारण बनते हैं। इसी वजह से कई मिड डे मील को न खाने या एस्कूलों में दूसरे धर्म, जाति या क्षेत्र वालों से संपर्क रखने में भी बच्चे डर जाते हैं। बच्चे बहुत संवेदनशील भी होते हैं। उनमें अवसाद शिक्षकों की मार से ही नहीं, बल्कि अपमान से भी चोट पहुंचती है। फीस न दे पाने के लिए दुत्कारे जाने या लगातार सजा के लिए खड़े किए जाने या सजा में झाड़ू लगाने, मुर्गा बनाने आदि से बच्चे गहरे सदमे में पहुच जाते हैं। ऐसे ही कारणों से पिछले दो तीन सालों में स्कूली बच्चों की आत्म-हत्या की खबरें मीडिया में आई हैं।

कुल मिलाकर स्कूलों में बच्चे जिस प्रकार की हिंसा झेल रहें हैं, वे शारीरिक ही नहीं मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक भी हैं। शिक्षालयों में मारपीट या हिंसा की कोई जगह नहीं है। इसके लिए एक अभियान भी चल रहा है। फिर भी, छोटे बच्चों के मामले में स्कूलों में यौनिक दुर्व्यवहार के मामले बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे मामलों में कई बार शिक्षक या विद्यालय के कर्मचारी भी शामिल पाए जाते हैं। जब इस तरह की घटनाएं सुर्खियां बन जाती हैं, तब भी बच्चे-बच्चियां स्कूल जाने में डरने लगती हैं। अभिभावक भी बच्चों को स्कूल भेजने में डरने लगते हैं। कई दूसरे कारण भी होते हैं, जिनसे बच्चा स्कूल जाने में हीनता या दबाव महसूस करता है-जैसे-लिंग, जाति, अपंगता, आर्थिक स्थितियां आदि। बच्चों में भी स्वाभिमान की भावना बहुत बलवती होती है। जब कक्षा में या विद्यालय में ऐसा होता है तो भी बच्चा आक्रांत वातावरण में रहता है, इसके घातक परिणाम होते हैं। संवेदनाहीन विद्यालय प्रबंधन या शिक्षक शिक्षिकाओं के कारण ऐसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं।

भयमुक्त शिक्षा देने में जर्जर स्कूल भवन भी चिंता के कारण हैं। उत्तराखंड में बागेश्वर जिले के सुमुगढ स्कूल में अगस्त 2010 में दुखद हादसा हुआ था। इस स्कूल की इमारत ढहने से अठारह मासूम बच्चों की मौत हो गई थी। उत्तराखंड में ही एक संस्था व्दारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार जंगलों की आग भी पहाड़ों के एक तिहाई स्कूलों की राह खतरनाक बना देती है। असुरक्षित स्कूलों में आग लगने, दीवार या छतों के ढहने, बच्चों को बिजली के करंट लगने की घटनाएं भी आए दिन होती रहती हैं।

देश के उच्चतम न्यायालय में भी कुछ वर्षों पूर्व एक जनहित याचिका के माध्यम से असुरक्षित स्कूलों का मामला लाया जा चुका है। उच्चतम न्यायालय ने विद्यालयी भवनों को सुरक्षित बनाए रखने के लिए संरचनात्मक संदर्भों में भी सुरक्षित होने के प्रमाणीकरण, अग्निशमन उपकरणों के होने की बाध्यता आदि भी रखी है। खासकर भूकम्पकीय संवेदनशील क्षेत्रों में तो स्कूल भवन भूकम्प अवरोधी बनाए ही जाने चाहिए।

वास्तव में जरूरत इसकी भी है कि स्थितियां ऐसी बनें कि माता-पिता बच्चों को कहीं भी बच्चों को स्कूल भेजने में डरे नहीं। उत्तराखंड में तो 2014 के आपदा के बाद पुल टूट गए हैं। बच्चों को कमजोर रस्सी या पिंजड़ानुमा ट्रालियों या पेड़ के तनों पर नदी नाले पार करने पड़ रहे हैं। आज स्कूल जाने में या बच्चों को स्कूल भेजने के डर में आतंकवाद और क्षेत्रीय अशांति का मसला भी निर्णायक होता जा रहा हैं। अशांत क्षेत्रों में पैसों या संपर्कों वाला वर्ग तो अपने बच्चों को दूसरे शांत राज्यों में या क्षेत्रों में भेज दिया दे रहा है, लेकिन बाकी बच्चे डरते-डरते स्कूलों जाते हैं। कश्मीर और पूर्वोत्तर में स्थिति काफी खराब है।

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