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आधी आबादीः सुंदरता के पैमाने

मीडिया और विज्ञापनों ने महिलाओं की जो सदाबहार सुंदरी वाली छवि बनाई है, इससे उनके ऊपर हर समय ज्यादा से ज्यादा भूमिकाओं को निभाने का दबाव भी बढ़ा है। महिलाओं पर न सिर्फ हर समय सुंदर दिखने का दबाव रहता है बल्कि उनसे पूर्ण कुशल होने की उम्मीद भी की जाती है।
Author December 4, 2016 01:15 am

यशस्वनी

दुनिया भर में महिलाओं की जिंदगी के दबावों को समझने के लिए लंदन स्थित ‘डव रिसर्च सेंटर’ ने हाल ही में अभी तक का सबसे बड़ा शोध किया है। तेरह देशों में किए शोध से पता चला है कि सारी दुनिया की महिलाओं में अपने शरीर को लेकर जबरदस्त हीनभावना है। रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि दुनिया भर की महिलाओं पर सुंदर दिखने का दबाव बढ़ने के कारण उनके आत्मविश्वास में बेहद कमी है। मगर तसल्ली की बात है कि भारतीय महिलाएं इसका अपवाद हैं। शोध 10 से 17 साल की लड़कियों और 18 से 64 साल की महिलाओं के आयु-वर्ग को लेकर हुआ। पाया गया कि महिलाओं में शरीर को लेकर हीनभावना न सिर्फ उनकी खुशी के स्तर बल्कि उनके निर्णयों पर भी असर डालती है। इस शोध में सामने आया कि जो लड़कियां अपने चेहरे-मोहरे को लेकर संतुष्ट नहीं थीं, वे अपने निर्णयों में अस्थिर थीं। दस में से नौ महिलाएं ऐसी थीं, जो सिर्फ अपनी काया और शक्ल को लेकर इंतनी संजीदा थीं कि खाने-पीने में ज्यादा परहेज करती थीं। यहां तक वे इसके लिए अपने स्वास्थ्य को भी खतरे में डाल देती हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक किसी खास देश और सभ्यता की नहीं, बल्कि सारी दुनिया की लड़कियां और स्त्रियां अपने शरीर को लेकर बेहद हीनभावना रखती हैं। महिला आबादी का बड़ा हिस्सा सुदर्शन होने के दबाव से त्रस्त है। मीडिया में महिलाओं की शक्लो-सूरत को लेकर जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है उसे बदलना चाहिए और इस पर लगातार बात किए जाने की जरूरत है। विकसित और विकासशील, पारंपरिक और आधुनिक सभी तरह के देशों की महिलाएं अपने दैहिक सौंदर्य को लेकर दबाव और चिंता में रहती हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य यह है कि विकसित देशों में महिलाएं अपने सौंदर्य और चेहरे को लेकर सबसे ज्यादा चिंता और आत्महीनता की स्थिति में हैं। विकसित देशों के लोग और नागरिक समितियां मीडिया में स्त्रियों की बनाई जा रही खास छवि के प्रति सजग होने के बावजूद इसके प्रभाव से बच नहीं पा रही हैं। इसका सबसे बेहतर उदाहरण अमेरिका है।
यह रिपोर्ट बताती है कि 2010 में अमेरिका में जहां 85 प्रतिशत महिलाएं अपनी सुंदरता को लेकर आत्मविश्वासी थीं, वहीं 2016 में यह आंकड़ा गिरकर 50 प्रतिशत पर आ गया है। अधखुले भारतीय समाज में महिलाएं बहुत तरह के दैहिक हमलों और मानसिक दबावों का सामना करती हैं।

इसके बावजूद यहां की महिलाएं और लड़कियां अमेरिका, कनाड़ा, ब्रिटेन जैसे खुले समाजों की महिलाओं से ज्यादा आत्मविश्वासी हैं। भारत में 96 प्रतिशत स्त्रियां अपनी शख्सियत को लेकर आत्मविश्वासी हैं। भारतीय महिलाओं और लड़कियों में इस आत्मविश्वास के कई संभावित कारण नजर आते हैं। एक तो यहां जन्म से ही लड़कियों को हर स्तर पर संघर्ष करना पड़ता है। इस संघर्ष के साथ वे जितना आगे जाती हैं, उनका आत्मविश्वास भी साथ-साथ बढ़ता जाता है। दूसरा, अक्सर छोटी उम्र से ही लड़कियों को उनकी सुंदरता के लिए टोका-टाकी का सामना करना पड़ता है, इस कारण वे विज्ञापन और मीडिया द्वारा स्त्री सौंदर्य के दबावों को लेकर अचानक दबाव में नहीं आतीं। तीसरा, भारतीय लड़कियां बचपन से ही कई किस्म के हीनताबोध में होती हैं। बड़े होने के साथ-साथ उनमें इस हीनता से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता भी पैदा होती जाती है।चौथा, नई पीढ़ी की बेटियां चुपचाप अपनी मांओं से सबक लेती हैं। भारतीय लड़कियां सिर्फ काया के दम पर आत्मविश्वासी बनने की बजाय अपने करिअर और हुनर के प्रति ज्यादा सजग होती हैं।

हालांकि विज्ञापनों, फिल्मों, टीवी और मीडिया में स्त्री के सौंदर्य की जो छवि पेश की जा रही है उससे भारतीय महिलाएं और लड़कियां पहले की अपेक्षा ज्यादा ग्रसित हैं। मीडिया और विज्ञापनों ने महिलाओं की जो सदाबहार सुंदरी वाली छवि बनाई है, इससे उनके ऊपर हर समय ज्यादा से ज्यादा भूमिकाओं को निभाने का दबाव भी बढ़ा है। महिलाओं पर न सिर्फ हर समय सुंदर दिखने का दबाव रहता है बल्कि उनसे पूर्ण कुशल होने की उम्मीद भी की जाती है। शोध में यह भी सामने आया है कि 78 प्रतिशत महिलाएं और लड़कियां किसी भी काम में गलती न करने का गहरा दबाव महसूस करती हैं। अमेरिका,ब्रिटेन,आॅस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी आदि देशों में जहां लिंगभेद से परे समानता और आजादी सबके लिए है, वहां भी सिर्फ महिलाओं के ऊपर ही ‘सर्वगुणसंपन्न’ होने का दबाव रहता है। महिलाओं के एक तबके में अब इन दबावों से निकलने की छटपटाहट भी बढ़ रही है।

सौंदर्य की समाज या मीडिया द्वारा दी गई परिभाषा को खारिज करते हुए आज के दौर की ज्यादातर महिलाएं और लड़कियां खुद के बनाए हुए सौंदर्य पैमाने पर खरा उतरना चाहती हैं। 83 प्रतिशत महिलाएं और 77 प्रतिशत लड़कियां दूसरों के थोपे गए सौंदर्य के पैमानों को खारिज कर अपने खुद के तरीके से सुंदर और आकर्षक दिखना चाहती हैं। सौंदर्य के बारे में महिलाओं की यह नई सोच सदियों पुराने ‘ब्यूटी मिथ’ पर चोट करती हैं। हालांकि इस परंपरागत ब्यूटी मिथ को तोड़ने में भी एक पेच यह है कि महिलाएं अपने ही तरीके से सुंदर दिखकर आत्मविश्वास से भरना चाहती हैं! घुमाफिरा कर महिलाओं का व्यक्तित्व और आत्मविश्वास उसके दैहिक सौंदर्य के इर्द-गिर्द ही घूम रहा है। आखिर स्त्रियां दैहिक सौंदर्य के इस कुचक्र से कैसे निकल सकती हैं?

डव मास्टरब्रंड की सीनियर ग्लोबल डायरेक्टर विक्टोरिया कहती हैं -सुंदरता और शक्ल की चिंता के इस दुश्चक्र को तोड़ने का सबसे बुनियादी तरीका है कि महिलाएं अपने दिमाग, शरीर और सेहत पर ध्यान दें और इसके लिए समय निकालना शुरू करें। सुंदरता आत्मविश्वास का जरिया बनना चाहिए न कि चिंता का। डव का प्रयास है कि पुरी दुनिया की महिलाएं और लड़कियां सिर्फ सुंदरता से नहीं, बल्कि जैसी वे दिखती हैं उसी से आत्मविश्वासी बनें। सुंदर, सर्वगुणसंपन्न और सवश्रेष्ठ होने का दबाव न सिर्फ महिलाओं के आत्मविश्वास को कम करता है बल्कि उनके व्यक्तित्व विकास को भी बाधित करता है। आत्मविश्वास की कमी और व्यक्तित्व की हीनता महिलाओं के स्वास्थ्य और उत्पादन क्षमता पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है। इस तरह किसी भी देश में महिलाओं के लिए बने सामाजिक सौंदर्य के पैमाने उस देश की आधी आबादी की रचनात्मकता, स्वास्थ्य और उत्पादन क्षमता को बहुत हद तक नकरात्मक तरीके से प्रभावित करते हैं। दुनिया भर के देशों को अपनी आधी आबादी की सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की खातिर, स्त्रियों के लिए गढ़े गए सौंदर्य के पैमानों को बदलना ही चाहिए। ०

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