ताज़ा खबर
 

व्यंग्य : चंदा

चंदे को आम बोलचाल की भाषा में लेना या मांगना जैसे शब्दों से संबोधित नहीं किया जाता है, इसे सामान्यतौर चंदा उगाहना कहा जाता है।
Author नई दिल्ली | March 19, 2016 23:18 pm
चंदे के लिए माकूल अंग्रेजी शब्द का नहीं मिल पाना भी इस विषय में शोध के लिए एक बड़ी बाधा बना हुआ है।

होली नजदीक है और चंदा उगाही का पवित्र काज आरंभ किया जा चुका है। होलिका के होली में जलने के प्रमाण हो सकते हैं, लेकिन चंदा मांगने की कला कब और कैसे विकसित हुई इस बारे में गूगल भी कुछ बताने को तैयार नहीं है। चंदे के लिए माकूल अंग्रेजी शब्द का नहीं मिल पाना भी इस विषय में शोध के लिए एक बड़ी बाधा बना हुआ है। हमारे देश में त्योहार दो प्रमुख श्रेणियों में विभक्त हैं। कुछ हैं जिनमें चंदे का कोई प्रावधान नहीं रखा गया है। दूसरी श्रेणी में होली, गणेश उत्सव, जन्माष्टमी और दुर्गा पूजा जैसे चंदायुक्त त्योहार सम्मिलित किए गए हैं, जिनमें चंदा लेने और देने का प्रचलन है।

चंदे को आम बोलचाल की भाषा में लेना या मांगना जैसे शब्दों से संबोधित नहीं किया जाता है, इसे सामान्यतौर चंदा उगाहना कहा जाता है। चंदा लेने वाले में अद्भुत वाकपटुता और शक्तिशाली होने का विलक्षण मिश्रण उसे चंदा उगाहने का विशेषज्ञ बनाता है। चंदा उगाहना जिस प्रकार से एक कौशल है उसी तर्ज पर चंदा देने से मना करना भी एक कला है। चंदा उगाहने वाला अधिकतम अकल्पनीय राशि की मांग चंदे के रूप में करता है और देने वाला व्यक्ति समुचित प्रयास कर ऐसे कारण जुटाता है जिससे वह चंदा कम से कम दे सके। चंदा लेने और देने का काज वैसे तो संसदीय सीमाओं को जब तक पार नहीं करता है तब तक मान-मनौव्वल परिधि में रहता है, लेकिन अनेक दफा विषय के गंभीर होने पर चंदा लेने और देने के इस मनोरंजक प्रसंग में कानूनी दफाएं भी लगती हैं।

चंदा उगाहने की प्रक्रिया पर कहीं से किसी प्रकार की सहायक सामग्री प्राप्त नहीं होने के कारण अपने ज्ञान में बढ़ोतरी के लिए मुझे अपने मोहल्ले के बाटू भैया ही एकमेव विकल्प नजर आए। डायरी-पेन अपने झोले में डाल कर मैं बाटू भैया की खोज में वैसे ही निकल गया जैसे कभी गौतम बुद्ध सत्य की तलाश में निकले होंगे। जीवन का लक्ष्य अगर कोई था तो वह था बाटू भैया से चर्चा। रात्रि के समय चांद तो नहीं निकला, लेकिन मेरे भाग्य का सूरज तब प्रगट हुआ जब भैया मोटरसाइकिल पर तिहरी सवारी जाते हुए नजर आ गए। मैंने जोर से चिल्ला कर उन्हें आवाज लगाई और उन्होंने रात के अंधेरे में भी मेरी आवाज पहचान कर गाड़ी रोक ली। मैंने गाड़ी रोकने और मेरी पहचान तजदीक करने के लिए उनका शुक्रिया अदा कर पूछा, ‘भैया ये चंदा क्यों लिया जाता है खास कर होली में?’ बाटू भैया दार्शनिक अंदाज में बोले, ‘देखो चंदा सिर्फ ली या दी जाने वाली राशि मात्र नहीं है, दरअसल, यह एक प्रकार का आश्वासन है, त्योहार के हंसी-खुशी संपन्न होने का, यह एक वादा है बिना अवरोध उल्लास मनाने का और सबसे महत्त्वपूर्ण यह एक प्रकार का अघोषित समझोता है सेवा लेने और देने वालों के बीच का।’

भैया का यह सारगर्भित वक्तव्य, मेरे लघु मस्तिष्क में पूरी तरह समाया तो नहीं था, लेकिन सहमति सूचक सिर हिलाने के अलावा वहां विकल्प सीमित थे। मैंने पूछा-मतलब दीवाली या राखी पर वह नियम लागू नहीं होता जो होली या दुर्गा पूजा पर फिट बैठता है? भैया मेरे अल्पज्ञान पर मुस्कुराए और बोले, ‘जब त्यंहार सार्वजनिक रूप से मनाओगे तब ही तो अपनी और चंदे की जरूरत होगी।’
मैं चंदे के विषय में जान पाया था या नहीं, यह तो नहीं पता लेकिन भैया ने मुझ से 501 रुपए का चंदा बिना रसीद ले जरूर लिया था।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.