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सबसे ज्यादा बदनाम साहित्यकार

मंटो ने खुद और अपने अफसानों के बारे में लिखा है,‘जमाने के जिस दौर से इस वक्त हम गुजर रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ हैं तो मेरे अफसाने पढ़िए। अगर आप इन अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब यह है कि यह जमाना नाकाबिले-बर्दाश्त है।
Author नई दिल्ली | January 17, 2016 01:59 am
मंटो ने खुद और अपने अफसानों के बारे में लिखा है,‘जमाने के जिस दौर से इस वक्त हम गुजर रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ हैं तो मेरे अफसाने पढ़िए।

बदनाम लेखक मंटो पर उनके जीवन काल में ही कई किताबें लिखी गर्इं। मुहम्मद असदुल्लाह की किताब ‘मंटो-मेरा दोस्त’ और उपेंद्रनाथ अश्क की ‘मंटो-मेरा दुश्मन।’ आलोचक मुहम्मद हसन अस्करी ने लिखा है, ‘मंटो की दृष्टि में कोई भी मनुष्य मूल्यहीन नहीं था। वह हर मनुष्य से इस आशा के साथ मिलता था कि उसके अस्तित्व में अवश्य कोई-न-कोई अर्थ छिपा होगा जो एक-न-एक दिन प्रकट हो जाएगा। मैंने उसे ऐसे अजीब आदमियों के साथ हफ्तों घूमते देखा है कि हैरत होती थी। मंटो उन्हें बर्दाश्त कैसे करता है! लेकिन मंटो बोर होना जानता ही न था। उसके लिए तो हर मनुष्य जीवन और मानव-प्रकृति का एक मूर्त रूप था, सो हर व्यक्ति दिलचस्प था। अच्छे और बुरे, बुद्धिमान और मूर्ख, सभ्य और असभ्य का प्रश्न मंटो के यहां जरा भी न था। उसमें तो इंसानों को कुबूल करने की क्षमता इतनी अजीब थी कि जैसा आदमी उसके साथ हो, वह वैसा ही बन जाता था।’

समझा जा सकता है कि मंटो कैसे उन किरदारों को अपने अफसानों में केंद्रीय भूमिका में लाने में कामयाब हो पाए, जो जिंदगी के सियाह हाशिये में गर्क थे। मंटो के किरदार तलछट में रहने वाले हैं, गटर में। बदबू और सड़ांध मारते माहौल में रहने वाले लोग, जिनका चरित्र बाहर से घृणित दिखाई पड़ता है, पर जब हम उस किरदार के भीतर जाते हैं तो महसूस करते हैं कि वे पतित नहीं हैं, बल्कि मानवीय बोध और संवेदना से लबरेज हैं। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि मंटो मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखते हैं, इस नजर से वह महान मानवतावादी लेखक हैं। उनकी कई कहानियों में राष्ट्रीय आंदोलन के ऐसे जीवंत चित्रण हैं, जो आंदोलन की प्रकृति को निर्धारित करते हैं।

मंटो के समग्र साहित्य का संकलन करने और उनकी कई गुमशुदा रचनाओं को ढूंढ़ निकालने वाले ने ‘सआदत हसन मंटो, दस्तावेज’ में लिखा, ‘ इस सृष्टि में अंधेरे और उजाले की लड़ाई कितने युगों से जारी है। मंटो ने इस लड़ाई का दृश्य उन आदमियों के कुरुक्षेत्र में भी देखा जो अंधेरों के वासी थे। हमारे परंपराबद्ध और नैतिक मूल्यों के टिमटिमाते दीये, जिन्होंने अंधे कानूनों को जन्म दिया था, उस अंधेरी दुनिया तक उन दीयों की रोशनी पहुंचने में असमर्थ थी। शायद इसीलिए मंटो उर्दू भाषा का सबसे ज्यादा बदनाम साहित्यकार है, जिसे सबसे ज्यादा गलत समझा गया। कानून अंधे थे, मगर वे आंखें जिनसे फिरंगी हुकूमत या खुदा की बस्ती के तथाकथित बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, नैतिक उत्तरदायित्व की झूठी और पाखंडपूर्ण धारणा का झंडा ऊंचा करने वाले कथा साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों के चेहरे सजे हुए थे, क्या वे आंखें भी अंधी थीं? और वे साहित्य समालोचक, नैतिकता के वे प्रचारक जिन्होंने साहित्य को अपने विद्वेषों के प्रकाशन का एक आसानी से उपलब्ध माध्यम समझ रखा था, और जो लकड़ी की तलवारों से मंटो का सिर कलम करने की धुन में मगन रहे, आखिर वे क्या देख रहे थे? यह सवाल हमारा नहीं, और न ही नवयुग के सांस्कृतिक मूल्यों का है। यह सवाल मंटो की प्रताड़ित कहानियों, उन कहानियों के चरित्रों…का है।’ इस दस्तावेज का पहला खंड समर्पित किया गया मोपासां के नाम, सौ बरस पहले जिसके बस जिस्म को मौत आई थी।
मोपासां भी दुनिया के बदनाम लेखकों में शुमार हैं।

मंटो ने खुद और अपने अफसानों के बारे में लिखा है,‘जमाने के जिस दौर से इस वक्त हम गुजर रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ हैं तो मेरे अफसाने पढ़िए। अगर आप इन अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब यह है कि यह जमाना नाकाबिले-बर्दाश्त है। मुझमें जो बुराइयां हैं, वो इस अहद की बुराइयां हैं। मेरी तहरीर में कोई नुक्स नहीं। जिस नुक्स को मेरे नाम से मंसूब किया जाता है, दरअस्ल मौजूदा निजाम का नुक्स है, मैं हंगामापंसद नहीं। मैं लोगों के ख्यालातो-जज्बात में हेजान पैदा करना नहीं चाहता। मैं तहजीबो-तमद्दुन की और सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी। मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, इसलिए कि यह मेरा काम नहीं…लोग मुझे सियाह कलम कहते हैं, लेकिन मैं तख्ता-ए-सियाह पर काली चाक से नहीं लिखता, सफेद चाक इस्तेमाल करता हूं कि तख्ता-ए-सियाह की सियाही और ज्यादा नुमायां हो जाए। यह मेरा खास अंदाज, मेरा खास तर्ज है जिसे फहशनिगारी, तरक्कीपसंदी और खुदा मालूम क्या-क्या कुछ कहा जाता है। लानत हो सआदत हसन मंटो पर, कमबख्त को गाली भी सलीके से नहीं दी जाती…’

अब इससे ज्यादा एक लेखक और साफ-साफ कह भी क्या सकता है! सौ बरस से ज्यादा बीत गए जब मंटो को इस दुनिया में तशरीफ लाए थे। महज 42 की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। एक छोटी-सी जिंदगी। और इस दरम्यान अदीबों की महफिलों से लेकर अदालतों के कठघरे और पागलखाने तक में नमूदार हुए। यह दुनिया रोज बनती है। जैसे रोटी। दुनिया बनती रहेगी, बदलती रहेगी। सियाही बढ़ेगी या कम होगी, कह पाना मुश्किल है। पर जिंदगी के लिए, एक मुकम्मल जिंदगी के लिए जंग शायद खत्म न हो, क्योंकि समय का पहिया थमता और रुकता नहीं। मंटो का साहित्य समय से मुठभेड़ के दौरान आयद हुआ। ‘समय से मुठभेड़’ के क्रम में ही शायर अदम गोंडवी ने अपनी एक गजल में मंटो के बारे में कहा था- जिसके अफसाने में ठंडे गोश्त की रूदाद है।

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