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व्यंग्यः पीपल की जड़ें

घरेलू लड़ाइयों की यही फितरत है, वे शुरू भले नीबू से हों, खत्म कहां होंगी, इसका अनुमान लगाना मुश्किल होता है। जिस सज्जन के पंखे पर समाज कल्याण लिखा है, वे भी सभा में उपस्थित हैं और जिसने आरोप लगाया है वह भी।
Author October 16, 2016 00:29 am

कैलाश मंडलेकर

उस सभा में वृक्षारोपण की बात हो रही है। कुछ कुछ पर्यावरण टाइप का मामला है। हरा-भरा वातावरण, शुद्ध हवा, स्वच्छता आदि। कॉलोनी की सभा है। इस कॉलोनी में बरसात के दौरान या उतरती बरसात में इस तरह की सभाएं या मीटिंग, होती रहती हैं। सभ्य और भद्र जनों की कॉलोनी है। कुछ लोग अनपढ़ हैं, पर यहां रहते-रहते सभ्य हो गए हैं। सभ्य लोगों का तो यही मानना है, उन अनपढ़ लोगों के बारे में। सभ्य लोग रात-दिन इसी गुमान में रहते हैं कि वे पढ़े-लिखे हैं और यह देश और दुनिया उन्हीं के कारण चल रही है। वे अखबार पढ़ते हैं, टीवी देखते हैं और सुनहरे फ्रेम का चश्मा लगा कर छत पर टहलते हैं। छत पर वे यों ही नहीं टहलते, बल्कि टहलते हुए सोचते भी हैं। उनके पास महंगी कारें हैं और उनके बच्चे विदेश में पढ़ते हैं। उन लोगों के मन में देश के अलावा इस कॉलोनी को भी हरा-भरा और स्वच्छ बनाने की योजनाएं हैं। इन्हीं योजनाओं के चलते यह मीटिंग रखी गई है।

मीटिंग को योगिराजजी संबोधित कर रहे हैं। प्राय: वही करते हैं। देखा जाए तो यह सभा भी उन्होंने ही बुलाई है। योगिराजजी भले आदमी हैं। उनके भले होने का प्रमाण यह है कि वे धीरे-धीरे चलते हैं और कभी-कभी अपनी सफेद धोती का एक छोर उठा कर जाकिट के खीसे में खोंस लेते हैं। योगिराजजी जमीन पर कदम इतने हल्के से रखते हैं कि कहीं धरती पर वजन ज्यादा न पड़ जाए। जबकि उनका वजन बहुत ज्यादा नहीं है। वे धोती-कुर्ता और चप्पल पहनते हैं और उनके बाएं कंधे पर एक झोला लटका रहता है, जो उन्होंने खादी ग्रामोद्योग से खरीदा है। इस झोले में फलों के बीज और विभिन्न प्रकार के वृक्षों की जानकारी देने वाली पॉकेट बुक्स रहती हैं। योगिराजजी धरती के बढ़ते हुए तापमान से दुखी हैं। वे कॉलोनी में वृक्ष लगा कर अपने दुख को कम करना चाहते हैं। वे अक्सर चिंतित रहते हैं।
आज की सभा में सभी चुनिंदा लोग उपस्थित हैं। दरोगाजी भी आए हैं, जो कद काठी से एकदम महापुरुष जैसे दिखते हैं। उनका अच्छा-सा कुछ नाम है, पर नाम में क्या धरा है, उन्हें सब दरोगाजी ही कहते हैं। वे पहले आबकारी विभाग में दरोगा थे, अब रिटायर्ड होकर यहां बस गए हैं। कॉलोनी नई है। अभी पूरी नहीं बसी है, लेकिन दरोगाजी ने यहां एक प्राइम लोकेशन पर बंगला बना लिया है, जो महल जैसा दिखता है। वे स्वभाव से बहुत विनम्र हैं, मीठा बोलते हैं, लेकिन उनकी आंखें बहुत शातिर हैं। जबसे वे इस कॉलोनी में आए हैं, उनके महापुरुष बनने की चेष्टाएं निरंतर जारी हैं, लेकिन लोग सब जानते हैं। वह तो उनके डाबरमैन नस्ल के कुत्ते, महंगी कार और इस महलनुमा बंगले से काफी रौब पड़ता है, वर्ना उनकी इज्जत दो कौड़ी की भी नहीं रहती। आज वृक्षारोपण वाली मीटिंग में दरोगाजी सबसे आगे वाली कुर्सी पर बैठे हैं।
यों देखा जाए तो यह कॉलोनी उतनी भी उजाड़ या वीरान टाइप की नहीं है कि कहीं कोई झाड़-पेड़ ही न हो। लोगों ने अपने-अपने अहातों में अपनी औकात के अनुसार नीबू, अमरूद आदि के छोटे-मोटे वृक्ष लगा रखे हैं। रबड़ और आम आदि के भी ढेरों हैं, पर हैं बाउंड्री के भीतर। बंगले आपस में इस कदर सटे हैं कि नीबू का झाड़ इधर लगा है, पर नीबू पड़ोस वाले खाते हैं। यही हाल अमरूद का भी है। या तो पड़ोस के बच्चे बाउंड्री वाल पर चढ़ कर तोड़ते हैं या राहगीर डाल झुका कर। क्या मजाल कि जिसने नीबू बोया है उसे एकाध चखने को मिल जाए। नीबू और अमरूद के कारण कॉलोनी में अक्सर छोटी-मोटी लड़ाइयां भी होती रहती हैं। कभी-कभी सिर फुटव्वल भी। भर भिनसारे से किसी न किसी के मकान में चें-चें शुरू हो जाती है।
यहां का नीबू किसने तोड़ा जी?
हमने नहीं तोड़ा। हमारे घर खुद का नीबू का झाड़ है।
लेकिन कल तो लगा था?
हमको क्या मालूम। आज भी लगा होगा। या वहीं कहीं पत्तों की आड़ में छिपा होगा। इस कॉलोनी के नीबू इतने बदमाश हो चुके हैं कि पत्ते की आड़ में छिपे रहते हैं। या फिर गिर गया हो, क्या नीबू अपने आप नहीं गिरते?
दूसरों का नीबू चुराते शर्म नहीं आती!
पहले अपने गिरेबान में झांको अंकलजी, आपके घर जो पंखा लगा है, वह कहां से लाए हो। आपने खरीदा है क्या? खरीदा है तो फिर उस पर समाज कल्याण विभाग क्यों लिखा है?
देखो, मुझ पर पंखा चोरी का आरोप तो लगाना नहीं, बताए देते हैं।
हम क्यों आरोप लगाएं, पंखा खुद बता रहा है कि वह कहां से आया है।
चोप्प!
घरेलू लड़ाइयों की यही फितरत है, वे शुरू भले नीबू से हों, खत्म कहां होंगी, इसका अनुमान लगाना मुश्किल होता है। जिस सज्जन के पंखे पर समाज कल्याण लिखा है, वे भी सभा में उपस्थित हैं और जिसने आरोप लगाया है वह भी। सार्वजनिक काम है और पर्यावरण का मामला है, इसलिए सबकी उपस्थिति जरूरी है। योगिराजजी प्रस्ताव रख चुके हैं। सुझाव आ रहे हैं। मशविरे चल रहे हैं। कॉलोनी को वृक्षों से पाट देना है। नर्सरी से लाए गए पीपल के ढेरों पौधे प्लास्टिक कि पन्नियों में सजा कर रख दिए हैं। हरियाली का प्रश्न है। स्वच्छता का वातावरण बनना चाहिए। कॉलोनी की नाक का सवाल है। टी गार्ड वाली बात उठ रही है। पीपल का झाड़ पवित्र होता है, किसी ने कहा। पवित्र तो वैसे नीम का भी होता है, कहो तो नीम के ले आएं। फिलहाल तो हर बंगले के सामने पीपल ही लगाएं, अगली बार नीम का सोचते हैं। किसी ने समाधान प्रस्तुत किया। सभा में सर्वसम्मति बन गई।

अचानक दरोगाजी खड़े हुए और गला साफ करते हुए बोले- भाइयो, मैंने सुना है कि पीपल की जड़ें बहुत मोटी होती हैं और जमीन के भीतर लगातार बढ़ती रहती हैं, कालांतर में इतनी मोटी हो जाती हैं कि घरों की दीवार में दरार पैदा करने लगती हैं। इसलिए मेरा निवेदन है कि मेरे घर के सामने कोई पेड़ न लगाया जाए। बाकी कॉलोनी में आप लोग जहां चाहें जितने झाड़ लगाएं। मुझे पर्यावरण के चक्कर में अपना घर नहीं तुड़वाना। इतना कह कर दरोगाजी बैठ गए।
दरोगाजी का सुझाव इतना तल्ख था कि पूरी सभा में पहले सन्नाटा जैसा हुआ, फिर एक अदृश्य भारीपन छा गया। खुसुर-फुसुर मचने लगी। लोग अपनी जगह से खड़े होने लगे। थोड़ी देर पहले जो सर्वसम्मति बनी थी, वह गहरी निराशा में तब्दील हो गई। पीछे से कोई कह रहा था, ऐसा है तो फिर बिना पीपल के ही अच्छे हैं, छत तो बची रहेगी। लोग उठ-उठ कर जाने लगे। योगिराजजी कुछ कहना चाहते थे, पर उनकी घिघ्घी बंधने लगी। दरोगाजी मूछों के भीतर मुस्कुराते हुए बाहर निकल रहे थे। उन्हें आभास होने लगा कि उनके महापुरुष बनने की संभावनाएं प्रबल होती जा रही हैं। प्लास्टिक की पन्नियों में रखे पीपल के पौधे मुरझाने लगे थे।

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