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कहानी : सोना गिलहरी की बहादुरी

इस बीच गिलहरी भी मन ही मन योजना बना चुकी थी कि उसे सांप का मुकाबला किस प्रकार करना है। सांप को आगे बढ़ता देख कर वह तत्परता के साथ सांप की पूंछ की ओर दौड़ी।
Author नई दिल्ली | June 5, 2016 07:44 am
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सोना गिलहरी अपने बिल से बाहर निकली। रोज की आदत के अनुसार उसने बाहर आते ही अपने दोनों कान बिल्कुल सीधे-खड़े कर लिए। ऐसा करके वह काफी दूर से आ रही किसी भी बारीक से बारीक आवाज को सुन लेती थी। इससे वह अनुमान लगा लेती कि कोई खतरनाक जीव उसके बिल की तरफ तो नहीं आ रहा। वह बिल के मुहाने से लगभग एक फुट की दूरी पर थी। वह ठीक उस प्रकार बैठी हुई थी जिस प्रकार कोई बच्चा पालथी मार कर बैठा हो। पूंछ पीछे जमीन पर चिपकी हुई थी और अगले पांव छाती के साथ सटे हुए।

उस समय वह अपनी नजर दूर सामने की ओर टिकाए हुए थी। उसके एंटिना जैसे कानों ने बिल की ओर आती हुई एक बारीक-सी सरसराहट को पकड़ लिया था। सरसराहट नजदीक से नजदीक आती जा रही थी। सोना जानती थी कि ऐसी सरसराहट किसी सांप की ही हो सकती है। इसीलिए वह सामने की ओर आंखें गड़ाए हुए थी।

सोना एक मैदानी गिलहरी थी। इसीलिए वह जमीन में बिल बनाकर रहती थी। हालांकि पेड़ों पर चढ़ना, दौड़ भागना और वहां से भोजन इकट्ठा करना उसकी दैनिक क्रियाओं में शामिल था। उसका बिल एक पेड़ के समीप, ठीक उसकी जड़ों के साथ बना हुआ था। बिल भीतर जाकर कई शाखाओं में बंट जाता था। उन सभी शाखाओं की कुल लंबाई लगभग साठ मीटर थी। ऐसा उसने सांप जैसे खतरनाक शत्रुओं से बचने के लिए किया हुआ था। उसके दो छोटे-छोटे बच्चे भी थे जो अब बिल के भीतर विश्राम कर रहे थे।

सोना की आंखों ने घास के बीच से अपनी ओर तेजी से आते एक सांप को देख लिया । वह झट से आगे की तरफ बढ़ गई। अब बिल और मोना के बीच की दूरी कई मीटर हो गई थी। ऐसा उसने इसलिए किया था ताकि सांप उसके बिल की स्थिति को न जान सके। खुद की जान बचाना तो उसके लिए बहुत आसान बात थी। किसी भी पेड़ पर चढ़ जाती। सांप उसे पकड़ नहीं पाता। उसका मुख्य उद्देश्य तो अपने बच्चों के प्राण बचाना था।

तब तक सांप नजदीक आ चुका था। वह काफी लंबा, मोटा और मजबूत भी था। इस आधार पर उसका नाम लंबू सांप रखा जा सकता था। सांप ने भी सोना को बीच राह में खड़े देख लिया था। वह समझ गया था कि गिलहरी उसके उधर आने पर नाराज है। अगर वह आगे बढ़ता है तो वह निश्चय ही उसके साथ दो-दो हाथ जरूर करेगी। सांप यह भी जानता था कि अगर एक बार किसी तरह उसे गिलहरी को काटने का मौका मिल गया तो फिर वह हमेशा-हमेशा के लिए मौत की नींद सो जाएगी। सांप ने उसे डराने के लिए अपना फन तान लिया और फुंफकारने करने लगा।

सोना भी जानती थी कि अगर वह सांप से डर गई तो वह उसके बच्चों को अपना भोजन बना लेगा। वह डरने की अपेक्षा तेजी से ऊंची आवाज में बोलने लगी ताकि सांप भी समझ जाए कि वह आसानी से हार मानने वाली नहीं है। सांप थोड़ा सा आगे बढ़ा ताकि गिलहरी डर कर भाग जाए।

इस बीच गिलहरी भी मन ही मन योजना बना चुकी थी कि उसे सांप का मुकाबला किस प्रकार करना है। सांप को आगे बढ़ता देख कर वह तत्परता के साथ सांप की पंूछ की ओर दौड़ी। ऐसा करते समय उसने ध्यान रखा कि उस तक सांप का मुंह एकदम नहीं पहुंच सके। सांप ने सोचा कि गिलहरी उससे भयभीत होकर भाग रही है इसलिए उसने आगे बढ़ने का निर्णय लिया। बड़ी मुश्किल से वह दस-पंद्रह सेंटीमीटर आगे खिसका होगा कि उसे गिलहरी के दांत अपनी देह में घुसते महसूस हुए। दर्द से तड़प उठा वह। उसे नहीं मालूम था कि गिलहरी के अगले दो दांत बहुत तीखे और मजबूत होते हैं। ये दांत सांप की रीढ़ को भी काट सकते हैं।

वह एक झटके के साथ पीछे मुड़ा। तेजी से गिलहरी की ओर लपका। इस प्रयास में वह एक दुहरी रस्सी जैसा हो गया। लेकिन, गिलहरी बड़ी फूर्ति के साथ पीछे हट गई। इससे पहले कि सांप कुछ समझ पाता वह उस जगह पहुंच गई, जहां से सांप पीछे की ओर मुड़ा था। ठीक उसी मोड़ पर उसने अपने दांत गड़ा दिए। फिर से भयंकर दर्द उसके पूरे बदन को सिहरा गया। वह पूंछ पटकता हुआ फिर से मुड़ा पर गिलहरी फिर से उठल कर दूर चली गई थी। सांप ने फन फैला कर फुंकार मारी। इससे गिलहरी जरा-सी भी भयभीत नहीं हुई। वह फिर से पूंछ की ओर बढ़ी तो सांप भी फन समेट कर पीछे की ओर मुड़ गया। इसी अवसर की तलाश में थी गिलहरी। बड़ी चालाकी से वह पीछे हटी और उछल कर सांप की गर्दन में अपने दांत घुसा दिए।

सांप ने भी फुर्ती दिखाते हुए गर्दन घुमा कर उस पर डंक मारना चाहा। गिलहरी इस बार बाल-बाल बची । उसे मालूम था कि अगर उसने जरा-सी भी सुस्ती दिखलाई तो वह उसके मासूम बच्चों को खा जाएगा। अब तक वह तीन जगह से सांप को काट चुकी थी। तीनों जगह से खून तो बह ही रहा था, दर्द भी खूब हो रहा था और गिलहरी थी कि पीछे ही नहीं हट रही थी। सांप ने वापस भागने का फैसला कर लिया।

बड़ी तेज गति से वह पीछे की ओर भागा। गिलहरी समझ गई कि वह डर कर भाग रहा है। वह उठ कर उसकी पीठ पर बैठ गई और दौड़ते सांप की चमड़ी में छेद करके उसकी हड्डियों तक पहुंचने लगी। सांप तुरंत एक ऐसी झाड़ी में घुस गया जिससे गिलहरी उसकी पीठ पर बैठी नहीं रह सकती थी। विवश होकर उसे नीचे उतरना पड़ा। वह बहुत थक गई थी पर अपने बच्चों को बचाने में सफल हो गई थी। सांप तो भूल कर भी उसके बिल की ओर मुंह करने वाला नहीं था।
वह अपने बिल में लौट कर विश्राम करने लगी।

(रामकुमार आत्रेय)

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