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कहानी : ब्रेकअप के बाद

‘पूरा साल लग गया उससे उबरने में, पर शायद पूरी तरह नहीं उबर पाया। हीलिंग प्रोसेस लंबी चलती है, पर अब मुझे कोई उसकी कहानी सुनाता है तो फर्क नहीं पड़ता।
Author नई दिल्ली | June 5, 2016 06:44 am
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धुआं खाए आसमान में सूरज का नामोनिशान नहीं था, मगर हवा राहगीरों को मफलर कसने पर मजबूर कर रही थी। यों तो इन दोस्तों की आपस में वाट्सऐप पर बातें होती रहतीं, मगर अरसे बाद इन्होंने सप्ताहांत मिलने का क्रार्यक्रम बना डाला। आज उनकी बातचीत का मुद्दा था- हाल में हुए अन्वय का ब्रेकअप, जिसे सुनने के लिए बेताब थे सब दोस्त।

‘आए दिन बदलते ऐसे अस्थायी किस्म के संबंधों को आज हम कितनी शिद्दत से याद कर रहे हैं। जबकि सच तो यह है कि हम उस दौर की मासूमियत को मिस कर रहे होते हैं, जो आज दूर-दूर तक नजर नहीं आती। तब हम अपने दिल की आवाज सुनते थे, पर आज तो इस पेशेवर जमाने के सुर में सुर मिलाने में एक्स्पर्ट होते जा रहे, हैं न!’ अन्वय के मुंह से ऐसी सूफियाना बात सुन कर सब चौंक पड़े, लेकिन दोस्तों के विस्मय से बेखबर वह बोलता रहा- ‘दोस्तो, अरसे से अपने सीने में उस लड़की के दिए जख्म दफ्न करता रहा हूं, पर अब और जगह नहीं बची।…’

नेहा ने सबकी तरफ देखते हुए कहा- ‘हम सबको तेरे प्यार के बारे में खूब पता है। पूरे पांच साल तक चला तेरा अफेयर और बात शादी तक पहुंच गई थी, पर बाद के किस्से के डिटेल्स तो किसी को नहीं पता। इस सच्ची कहानी का कच्चा चिट्ठा तू सुना डाल। हां अन्वय, शुरू से प्लीज। इससे तेरे दिल का बोझ कुछ तो हल्का होगा।’

‘हमारी दोस्ती की शुरुआत तो कॉलेज कैंपस में ही हुई थी। उसे देख कर पहली बार मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। फिर जब हमारी दोस्ती आगे बढ़ी तो बस कुछ दिनों बाद ही मुझे ऐसा लगने लगा कि अपना सब कुछ इस लड़की पर न्योछावर कर दूं। दोस्ती के बाद प्यार का इकरार हुआ। हम हर रोज तेजी से आगे बढ़ते जा रहे थे।

वो अक्सर कहती- यू नो, हमारे पेरेंट्स के बीच आए दिन झगड़े होते रहते। हमारे मां-बाप तलाक के नाजुक मोड़ तक पहुंच चुके थे, मगर तब तक मैं मां के पेट में आ गई, सो उनके बीच की कड़ी मैं बनती गई। सच बताऊं, मुझे अपने पेरेंट्स का सच्चा प्यार कभी नहीं मिला। मैं भी तुम्हारी तरह सिंगल चाइल्ड हूं और मुझे भी बचपन से पेट्स अच्छे लगते हैं। जब मैं पांच-छह साल की रही होऊंगी तब भी मेरे पेरेंट्स के पास मेरे लिए समय नहीं रहता। अपने पेट के साथ खेलती रहती।

चपन से ही मेरे पेरेंट्स ने मुझे अलग कमरे में सुलाया। खुद ही अपने कपड़े चेंज करती, खुद ही खाना निकाल कर खाना, खुद ही सोने जाना पड़ता। बहुत सारे काम खुद करने की प्रेक्टिस रही है मेरी। वे कहा करतीं, ऐसे बच्चे ज्यादा कानफीडेंट ऐंड इंडिपेंडेंट बनते हैं, सो ऐसी ट्रेनिंग मिली है मुझे शुरू से।… और तुम्हारा कैसा बचपन रहा है अनि?’

‘तुमसे एकदम उल्टा। पापा पांच साल से बाहर पोस्टेड हैं, सो मैं तो अब भी अपनी ममा के रूम में सोता हूं। पापा और ममा से अपनी हर बात शेयर किए बिना मुझे ठीक से नींद ही नहीं आएगी। मैंने अपनी इस दोस्ती के बारे में भी पापा को बताया तो वे बोले- ‘गुड यार, उसे घर लेकर आओ। यहां-वहां मिलने की जरूरत नहीं। अपना इतना बड़ा घर है, सो घर पर ही मिला करो। ठीक से एक-दूसरे को समझ कर इस दोस्ती में आगे बढ़ना वरना नहीं।’

‘यह कैसे संभव है? हमारे यहां तो कोई ऐसे खुलेपन की बात सपने में भी नहीं सोच सकता। इट्स अनविलीवेबल… कहते हुए उसकी आंखें चमकने लगीं किसी चौकन्नी बिल्ली की तरह और बोल पड़ी- ‘पर मेरी ममा ने एक बात शुरू से ही समझाई कि किसी पर भी ज्यादा भरोसा करना ठीक बात नहीं।’

‘यह पूरा सच नहीं है। मेरे घर का माहौल तो बेहद खुला है। मेरे पेरेंट्स वर्किंग हैं, मगर उनके बीच बड़ी गहरी समझदारी और खूब सारा प्यार है।’ ‘इतनी लंबी रामकहानी मत सुना यार। तेरा ब्रेकअप कैसे हुआ ये तो बता। पांच साल लंबा अफेयर टूटना कोई मामूली बात नहीं है।’ नेहा ने कहा।

‘बताता हूं। दरअसल, मुझे कंपनी की तरफ से साल भर के लिए यूएस जाना पड़ा, तभी से हमारे रिश्ते में दरारें आनी शुरू हो गर्इं। जब भी मैं वहां अपने टीम मेंबर्स के साथ किसी ग्रुप डिस्कशन में होता और उसकी पिक्स एफबी पर डालता, तो वह एकदम से उखड़ पड़ती और ढेर सारे गंदे-गंदे मैसेज भेज कर मुझे डिस्टर्ब करती। वह अक्सर किसी फीमेल सहकर्मी के संग मेरे संबंध की कहानी गढ़ कर इल्जाम मैसेज कर देती। घंटों लड़ती-झगड़ती। फोन पर ही चीख-चिल्ला कर मुझे इतना परेशान कर डालती कि मेरा मन करता कि मैं अपने प्रोजेक्ट को अधूरा छोड़ कर वापस लौट आऊं, पर मेरे पेरेंट्स उस दौरान मेरे लिए मजबूत सहारा बन गए।

जब भी मैं बेचैन होता तो उनसे मैं अपनी हर बात शेयर करता। ममा मुझे हौसला देतीं। अगर पेरेंट्स ने इनकरेज न किया होता तो मेरा काम पूरा नहीं हो पाता, वरना उसने तो इसी बीच ऐसे-ऐसे झूठे और फेक इल्जाम लगाए, जो मैं कल्पना तक नहीं कर सकता था। लिसन, उसने मां से कहा कि मैं ड्रग्स लेने लगा हूं और ड्रग एडिक्ट बनता जा रहा हूं, मगर थैंक्स टु माई ग्रेट ममा कि उन्होंने उसकी एक नहीं सुनी और मुझ पर भरोसा बनाए रखा।’

‘शायद वह इनसिक्योर रही हो…।’ अनस ने कहा तो वह पलट कर बोला- ‘मे बी ईगो प्रॉब्लम कि मैं उसे छोड़ कर विदेश क्यों गया। ठीक से बता पाना तो मेरे लिए भी मुश्किल है, पर मेरा मन पहली बार तब उसके लिए खट्टा हुआ जब उसने मेरी ममा को ‘फेक लेडी’ कहा। फिर तो मैं हिल गया। जबकि मेरे पेरेंट्स ने उसे भावी बहू के रूप में स्वीकार कर लिया था। मां के लिए ऐसा बोलने पर मैंने इतना जरूर कहा- पूरी दुनिया में तुम ऐसी पहली और आखिरी लड़की होगी, जिसने मेरी प्यारी मां के लिए ऐसे अपशब्द बके।’ वह बोलते हुए अचानक रुक गया।

‘पता चला कि वह फिर से किसी और लड़के के साथ रिश्ते में है, जिसकी पिक्स उसने एफबी पर शेयर की है। तुझे चिढ़ाने के लिए ऐसा किया होगा, पर तूने उसे अनफें्रड या ब्लॉक क्यों नहीं किया?’ नेहा ने पूछा। ‘ओह, आॅब्सेसन, अटैचमेंट, एकतरफा प्यार, उसे पाने और उसके साथ हमेशा बने रहने का जुनून, अधूरे सपनों के टूटने का दंश।… सचमुच, मेरे लिए ये सबसे बड़ी तकलीफ थी कि मुझे नींद नहीं आती और घंटों बिस्तर पर पड़ा रहता। उस दौरान मैं दफ्तर भी नहीं जाता, पर मेरी मां मेरे लिए हर वक्त मजबूती से खड़ी रहीं। एक बार तो मेरी ममा मुझे किसी साइकेट्रिस्ट के पास भी ले गई थीं। पापा से भी हर चीज खुल कर शेयर की। अभी पिछले महीने से अपनी नई जॉब पर जाने लगा और नए सिरे से जिंदगी की छूटी डोर संभाली।’ अपनी बात करके वह एकदम खामोश हो गया।

‘वाउ, गुड, इस मुश्किल समय को निकाल कर तू अब बाहर आ गया अन्वय।’ नेहा के मुंह से खुशी निकल गई- इट्स रियली ग्रेट!’

‘लिसन, पिछले महीने मेरे जन्मदिन पर उसने फूल भेजे और भेजने वाले के नाम के आगे जानते हो क्या लिखा था? कैन यू इमेजिन? उसने लिखा था, योर एक्स…’ वह सकुचाते हुए रुक गया।

‘योर एक्स गर्लफ्रेंड और क्या?’ नेहा ने तत्काल एक झटके से अपनी बात पूरी की।
‘नहीं, योर एक्स वाइफ…’

‘इट्स हॉरिबल, पर ऐसा क्यों किया होगा उसने?’

‘ताकि तू फिर से उसी के पास दौड़ा चला जाए और पहले की तरह बहला फुसला कर फिर वह जैसा कहेगी, तू उसकी हां में हां मिलाने लगेगा, यहीं न?’

‘हां, पेट्स पालने का उसे भी शौक था और मुझे भी…।’

‘बस अब बंद कर उस चीटर की कहानी। उसने तो झटपट दूसरा पकड़ लिया और तू अभी तक उसके नाम की माला जप रहा है। इतना गहरा जख्म दे गई वो तुझे। बट शी इज लूजर, नॉट यू। ऐसों का साथ छूटने में ही बेहतरी है।’ इस बार गुस्से में फट पड़ी नेहा।

‘हां नेहा, सच बात तो यह है कि यह लंबी प्रोसेस है, ऐंड स्टिल आई ऐम सफरिंग। कई बार ऐसा लगता कि मैं जिंदगी में टोटली फेल हो गया। अब कुछ नहीं हो सकता मेरा। क्यों न मर जाऊं, आखिर किसके लिए जीऊं?’

उसकी बात पूरी समझे बगैर बोल पड़ा अनस- ‘सुन, वो तुझसे सच्चा प्यार कभी नहीं करती थी। हो सकता है, तुझसे ऊब गई हो और अलग होने का कोई बहाना खोज रही हो।’

‘हो सकता है।’

‘एक बात, इस ब्रेकअप से पहले से ही झगड़े शुरू हो गए थे?’ अनस के पूछने पर बोला- ‘हां, हम अक्सर बेवजह झगड़ने लगते। हर समय उसे खाने के लिए सिर्फ मैगी चाहिए होती। बाकी चीजें देख कर नाक-भौं सिकोड़ने लगती, जबकि मेरी मां कितनी मेहनत-मशक्कत से उसके लिए क्या-क्या बनाती रहतीं, पर वह छूती तक नहीं। उसका हर जन्मदिन हम जोर-शोर से मनाते। बेस्ट रेस्तरां में उसे ट्रीट देते। महंगे से महंगा तोहफा देते।…’

‘उसने तुझे भी तोहफा वगैरह दिए होंगे?’

‘उसने कार्ड के सिवा कुछ नहीं दिया आज तक।’ वह एक-एक बात खुल कर बताने लगा।

‘कुछ तो दिया होगा प्यारे। साफ-साफ बता न, तुम लोग फिजिकल हुए होगे न?’ अनस ने टटोलते हुए पूछा।

‘हां हां’, उसने सकुचाते हुए गर्दन नवा कर हामी भरी।

‘तो बस उसी देने को वह सब कुछ मानती रही और तू साला, उस पर अपनी जिंदगी, अपना सब कुछ कुर्बान करता रहा।’

‘वैसे ये तो हमें एकतरफा मामला लगता है। तूने उसके प्रोजेक्ट पूरे करवाने में मदद की होगी न?’ नेहा ने कुरेद कर पूछा।

‘क्या-क्या नहीं किया उसके लिए! बताने लगूंगा तो न जाने कितने दिन लग जाएंगे। हमारी साथ में ढेरों पिक्स हैं, क्लोजली

टुगेदरनैस की। करवाचौथ के दिन हाथों में मेंहदी लगा कर ममा के साथ पूजा भी की थी उसने, मेरी खातिर।’

‘आंटी ने उसे बहू के रूप में माना था न, इसलिए। तेरे जैसे सीधे-सादे लोगों से काम निकालने में माहिर होती हैं कुछ चंट लड़कियां। उसके तो दोनों हाथों में लड्डू थे। तू उसके लिए समय और पैसा बहा रहा था और वह मजा लूट रही थी।’ खुशी ने अपनी बात खत्म की तो अन्वय बोलने लगा- ‘ममा, पापा के अलावा मैं अक्सर उसकी पसंद से आॅनलाइन शॉपिंग कराता रहा।…’

‘गनीमत समझ कि तूने उससे शादी नहीं की, वरना ऐसी लड़की का क्या भरोसा। बाद में तुझे छोड़ कर चल पड़ती अपने रास्ते। अभी तो फिर भी काफी कुछ बचा है जिंदगी में।’ अनस ने कहा। ‘यू आर राइट। दरअसल, आज के जमाने में यूज ऐंड थ्रो बन गया है वैल्यू सिस्टम। तेरे बाहर जाते ही उसने थाम लिया किसी का हाथ। यहां कोई प्यार-व्यार कतई नहीं होता। न कोई रूहानी लगाव की बातें सोचता है।’

नेहा की बात पूरी होते ही अन्वय बोलने लगा- ‘हां तभी तो कुछ महीने में ही सब कुछ हाथ से फिसलता चला गया यानी मेरे लौटने तक का इंतजार नहीं किया उसने।’

‘यार, तू अब भी बच्चों की तरह सोच रहा है जबकि अब तक तो तुझे उबर जाना चाहिए। सच सुन पाएगा, तो सुन, उसने तेरे प्यार को ‘जस्ट टेकेन फॉर ग्रांटेड’ मान लिया। वो तेरे इस पागलपन का लुत्फ उठा रही होगी वह, जो तेरे जैसे नेक परिवार के विरले लोग ही कर पाते हैं। आई बात समझ में?’ नेहा ने दोटूक कहा।

‘गनीमत थी कि तुम अपने पेरेंट्स से सब शेयर करते रहे जिससे तुम बच गए, वरना कई लड़के तो ऐसे तनाव में घुट कर मौत को गले लगा लेते हैं। तमाम आत्महत्याएं इसी तरह के एकतरफा प्रेम के चलते होती हैं।…’

‘पूरा साल लग गया उससे उबरने में, पर शायद पूरी तरह नहीं उबर पाया। हीलिंग प्रोसेस लंबी चलती है, पर अब मुझे कोई उसकी कहानी सुनाता है तो फर्क नहीं पड़ता। उसके बारे में जान कर न अच्छा लगता है, न बुरा।’
‘दैट्स गुड, पर अगर फिर उस लड़के से मन भर गया और तेरे पास लौट आई तो?’

‘प्लीज माफ करो मुझे फॉर गॉड्स सेक, एक बिग नो। मेरी मां ने कितना सही आकलन किया था कि जब वह मुझे फेक कह सकती तो तुझे कब क्या कह दे, कोई भरोसा नहीं।’

‘आज की ऐसी लड़कियों में अच्छाई परखने की सामथर््य ही कहां होती है? न शायद उतना पेशेंस कि वे रिश्तों के पकने का इंतजार कर सकें कि इन्हें विश्वसनीय आधार मिल सके।’ नेहा ने अपनी बात जारी रखी- ‘वो तो अपने जैसा ही समझेगी न दूसरे को भी। अजीब बात है, पर यही है आज के समय का सच। अपना काम निकाल कर चलते बनो अपने रस्ते। नो लव, नैवर, जस्ट फैशनेबल लव मींस टाइम पास…।’

‘पता है, वो कैसी कैसी शर्तें लगाती थी कि अगर तुम मेरा साथ चाहते हो तो सिर्फ मैं ही मैं रहूंगी और हमारे बीच कोई और नहीं। यहां तक कि तुम्हारी मां भी बीच में नहीं। सुन कर धक्का लगा था मुझे उस दिन। सबकी तरफ देख कर उसने आश्वस्त होते हुए फिर से बोलना जारी रखा: ‘दोस्तो, अपनी इस जिंदगी से बहुत खुश तो नहीं हूं, पर अब इस दर्द के साथ जीना सीख लिया है। किसी और लड़की पर दुबारा भरोसा कभी नहीं कर पाऊंगा मैं। यहां तक कि अपनी कंपनी की लड़कियों से भी बात करने का मन नहीं होता। अपने आप को काम में पूरी तरह झोंक दिया है, बस।’ कहते हुए उसने लंबी सांस ली।

‘जिदंगी लंबी है दोस्त, यों दिल छोटा नहीं करते। तेरे लायक कोई न कोई, कहीं न कहीं जरूर होगी।’
‘हम सब हैं न, तेरे साथ! कहते हुए सारे दोस्त इकट्ठे हो गए और गोल घेरे में अन्वय को लेते हुए बांहों में कस लिया। फिकर नॉट अन्वय… मस्त रह। चिल कर।’ कहते हुए वे सब किसी अंगरेजी गाने की धुन गुनगुनाने लगे।

‘हां, उसे लेकर डायरियां भरता रहा, पोयम्स लिखता रहा, पर आज सबसे कह कर रिलैक्स फील कर रहा हूं।’
‘बेशक, वह तेरा पहला प्यार थी, जिसे भूलना आसान नहीं होता, पर एक बात सोच ले कि कोई मनपसंद लुभाने लगे, पर यह जरूरी तो नहीं कि उसकी भी मनपसंद हम बनें। कई बार बाहर दिखते सुंदर और खुशबूदार फूल घर पर लगाते ही मुरझाने लगते हैं।’ नेहा की बात पर अनस बोला- ‘फूल बना कर चलती बनी वह तो अपने रस्ते, पर हम अपने अन्वय के लिए कोई मासूम और भावुक लड़की खोजेंगे, जो अन्वय जैसी हो।’

‘प्लीज कुछ करने की जरूरत नहीं। आइ एम ओके।’ इस बार वह दोटूक लहजे में बोल पड़ा।

‘जरूरत है, और हम ऐसा तब तक करते रहेंगे जब तक कि कोई तुझे पसंद न आ जाए। जैसे को तैसे का जमाना है प्यारे, और हमें जमाने के संग चलना है। तुझे देवदास नहीं बनने देंगे हम। जल्द ही स्टेटस डालेंगे- अन्वय इन ए न्यू रिलेशनशिप।’

‘हा, हा, हा… समवेत ठहाकों के बीच सबकी मिलीजुली आवाजों से एक नया कोरस बनने लगा था, जिसके सुर भले अलग-अलग दिशाओं की तरफ जा रहे थे, पर अंदरूनी लय एक जैसी थी। वे समय की नब्ज पकड़ रहे थे। वे नए समय में नए रंग भरने के लिए नए सिरे से जुगलबंदी करने लगे।

(रजनी गुप्त)

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