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कविता: मुक्तिकाम गांधी

राजेंद्र कुमार की कविता मुक्तिकाम गांधी।
Author October 8, 2016 23:41 pm
प्रतिकात्मक चित्र।

राजेंद्र कुमार
मुक्तिकाम गांधी

ओ मेरे देश के उत्सव-प्रिय लोगो
भूखे पेट भी
तुम
उत्सव मना लेते हो
प्रशंसनीय है
तुम्हारा उत्साह!

दबा कर घायल सीने की आह
तुमने खूब सीखा है
कि किस तरह करना चाहिए
उधार ली गई मुस्कराहटों से निबाह!

ओ मेरे देश के भाषण-प्रिय लोगो,
तुम सही अर्थों में मेरे अनुयायी हो
मेरा नाम लेते हो
अहिंसा से काम लेते हो
गिरता है आदमी
तो तुम आदमी को नहीं-
आदर्शों के मंच पर रखी
कुर्सी को/ थाम लेते हो
करते हो मेरी ही तरह
तुम भी
सत्य के साथ अपने प्रयोग,
झुकता है भीड़ में खोया हुआ सच
तुम
तन कर सलाम लेते हो!

ओ मेरे देश के लक्ष्य-बेधी लोगो,
एक गोडसे की गोली का
लक्ष्य बना था मेरा सीना
तुमने लक्ष्य बनाया मेरी आत्मा को,
स्थूल से सूक्ष्म की ओर
तुम्हारा यह अभियान
द्योतक है
तुम्हारे निरंतर सभ्य होते जाने का!

तुमने बार-बार
अपनी बंद मुट्ठियों को
हवा में उछाल कर
मेरी जय बोली है
मैं तो हिसाब भी नहीं रख सकता
तुम्हारे उपकारों का
कुछ फर्क नहीं पड़ता है लेकिन,
मेरे देश की धरती
क्लर्क-प्रसूता है!
बहुतेरे क्लर्कों ने
अपनी फाइलों में
दर्ज कर रखा होगा जरूर
पूरा ब्योरा नारों-
जय-जयकारों का!

यों इतना एहसान ही तुम्हारा
कुछ कम नहीं है, लेकिन क्या
इतना एहसान और न करोगे
अपने इस बापू पर
अपने इस गांधी पर
इस राष्ट्रपिता पर
कि-
इसे मुक्त कर दो!

इसके चरखे से कते हुए सूत में
इसी को बांध कर
तुमने डाल दिया है इसे
किसी खादी की दुकान में
और शांति के नाम पर
उड़ा दिए हैं
सच्चाई के कबूतर
स्वारथ के दूर तक
फैले मैदान में!

ओ मेरे देश के मुक्त चिंतको,
मुझे मुक्त कर दो-
मुक्त-
इस राष्ट्रपिता को
मुक्त कर दो! ०

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