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चिंता : बुनकरों की दीनदशा

राजस्थान में ग्रामीण क्षेत्रों के सर्वेक्षण के बाद यह देखने में आया है कि बुनकर अपने बुनने का कार्य छोड़कर अब या तो सिलाई का कार्य करने लगे हैं या फिर बाजा बजाने का कार्य।
गांवों में आज भी यह जाति गरीबी रेखा से नीचे का जीवन जीने को विवश है। महाजनी प्रथा के शिकार ये बुनकर कर्ज में डूबे हैं।

राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में जुलाहों का जीविकोपार्जन दिनोंदिन कठिन होता जा रहा है। जुलाहें जिन्हें बुनकर और कोली नाम से भी जाना जाता रहा है, आज भीउपेक्षित हैं। इन लोगों की बस्तियां गांवों में सवर्ण लोगों से अलग-थलग पाई जाती हैं। दीन-हीन फटेहाल अवस्था में जी रहे जुलाहे अपने मूल कार्य को छोड़ते जा रहे हैं और दूसरे धंधे अपनाने को बाध्य हो रहे हैं।

जुलाहा सूत कातकर उनकी घुर्टियों से ताने-बाने पर मोटे रेजे बनाने का काम करता रहा है। ये रेजे रजाइयां-लिहाफ और अन्य मोटे कपड़े से बनने वाली पोशाक बनाने के काम आता है। इसके अलावा जुलाहा ऐसा मोटा कपड़ा भी हाथ से बुनता रहा है जो ग्रामीणों के अंगरखे, कुर्ते, कमीज और धोतियों के काम में आता रहा है। अब भी वैसे ग्रामीण इलाकों में जुलाहों के साप्ताहिक बाजार (हटवाड़ा) लगते हैं। जिनमें आस-पास का जुलाहा वर्ग इकट्ठा होता था। इन बाजारों में फुटकर बिक्री के अलावा थोक के भाव से खरीद होती थी।

लेकिन, अब तो गांवों में भी मोटे रेजे का चलन खत्म होता जा रहा है। उसके एवज में मीलों में बने कपड़ों के लिहाफ और रजाइयां तैयार की जा रही हैं। वैसे रेजे की रजाइयां मील के कपड़े की तुलना में अधिक गरम और आरामदायक होती हैं। साथ ही सस्ती और अधिक समय तक चलने वाली भी। लेकिन रेजे के कपड़े की उपेक्षा ने ग्रामीण जुलाहों का यह मूल धंधा चौपट कर दिया है।

गांवों में आज भी यह जाति गरीबी रेखा से नीचे का जीवन जीने को विवश है। महाजनी प्रथा के शिकार ये बुनकर कर्ज में डूबे हैं। गिरी हुई माली हालत के कारण वे लोग न तो स्वयं शिक्षित हो पाए न ही उनके बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का कोई प्रबंध हो रहा है। अशिक्षा के दायरे में रहने के कारण सरकारी नोकरियों तक ये पहुंच ही नहीं पाते।

राजस्थान में ग्रामीण क्षेत्रों के सर्वेक्षण के बाद यह देखने में आया है कि बुनकर अपने बुनने का कार्य छोड़कर अब या तो सिलाई का कार्य करने लगे हैं या फिर बाजा बजाने का कार्य। कहीं-कहीं कोली समाज बागान या खेती-बाड़ी की ओर भी मुड़ा है। सिलाई और बाजा बजाने का यह कार्य ऐसा है जिसका गांवों में कोई भविष्य नहीं है।

शादी-ब्याह के अवसर पर ही सिलाई और बाजों का महत्त्व रहता है, वर्ना गांवों में इन साधनों का उपयोग इतना अधिक नहीं है। फिर सिलाई या बाजा बजाने की दरें भी शहरों की तुलना में गांवों में कई गुना कम है। इसलिए मूल धंधे से कट कर भी जिंदगी बोझ बनी हुई है।

अधिकांश जुलाहों के पास कच्चे घर हैं। सुविधाएं न के बराबर हैं। घरों में एक या दो तथाकथित कमरे और टूटी-फूटी दीवारें हैं। छोटे-छोटे दायरों में बने इन घरों में बुनकरों का जीना कठिन है। किसी तरह वे अपने बच्चों का लालन-पालन कर रहे हैं। लेकिन उनके भविष्य अंधेरे में है।

सर्दी-गरमी और वर्षा से बचने के लिए उनके पास समुचित वस्त्र तक नहीं हैं। आए दिन हारी-बीमारी के जाल में उलझा कबीरपंथी जुलाहों का वर्ग अपने लिए ही चदरिया का इंतजाम नहीं कर पा रहा है। पेट की आग शांत करना ही उनके लिए सबसे बड़ी लड़ाई है।

देखा गया कि दूसरी कई जातियां ऐसी हैं, जहां नशाखोरी भी काफी हद चक चलन में है, लेकिन बुनकर समाज अब भी इस रोग से मुक्त है। कोली जाति के लोग विनयशील और मृदुभाषी होते हैं। धूम्रपान वगैरह भी न के बराबर है। इतनी न्यून आवश्यकताओं वाला यह वर्ग जीविकोपार्जन के लिए तरह रहा है। सरकारी उपेक्षा की वजह से उसकी स्थिति और भी खराब हो गई है।

आवश्यकता है कि इस वर्ग के कुटीर उद्योगों को बढ़ावा और प्रोत्साहन देने की। सरकारी सुविधाएं मिल जाएं तो ये लोग रोजी-रोटी की कठिनाइयों से पार पा सकते हैं। इनके नष्ट होते उद्योगों को बचाने के लिए बैंकों से सस्ते ब्याज की दर पर ऋणों की सुविधा दी जानी चाहिए और इनके बुनाई के पारंपरिक औजारों में आधुनिक तकनीक का उपयोग बढ़ाकर उन्हें प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।

इन औजारों में और साधनों में यह तकनीक विकसित होनी चाहिए, जिससे कपड़ा अच्छा और बारीक रूप में उत्पादित किया जा सके। लागत कम आने से यह कुटीर उद्योग मील के कपड़ों की तुलना में बाजार में ठहर सकेगा। इसके अलावा इनके मोटे कपड़ों से ऐसी कलात्मक पोशाकें भी विकसित की जानी चाहिए, जिन्हें शहरों के बड़े-बड़े एंपोरियमों में बिक्री के लिए रखा जा सके।

विदेशी पर्यटकों को इनके कपड़ों के प्रति आकर्षित किया जा सकता है और विदेशी मुद्रा कमाई जा सकती है। इसके लिए जुलाहों को सरकारी स्तर पर प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, जिससे वे अपने पारंपरिक रूप से हटकर युगानुकूल वस्त्रों का उत्पादन भी कर सकें। इन्हें कम दाम पर भूमि और मकान आवंटित कर उन्हें सेहतमंद माहौल भी दिया जाना चाहिए, ताकि वे लोग खुली हवा में सांस ले सकें।

जुलाहों को ग्रामीण क्षेत्रों के बाजारों के अलावा शहरी इलाकों में भी बाजार की सुविधा दी जानी चाहिए। आर्थिक मदद इन्हें गरीबी रेखा से ऊपर उठा सकती है और उनके हुनर को भी बचाए रख सकती है।

राज्य सरकारों के लघु उद्योग निगमों को इनके धंधे के विकास के लिए योजनाओं को मूर्त रूप देने का प्रयास करना चाहिए और इन्हें कारीगर रूप में अपने यहां काम के अवसर भी सुलभ कराने चाहिए। वर्ना भारत का यह पारंपरिक वस्त्र निर्माता अकाल काल की गोद में समाता चला जाएगा और यह कुटीर उद्योग अपने आप इतिहास बन कर रह जाएगा। इन्हें आर्थिक, शैक्षणिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर प्रोत्साहित किया जाना वर्तमान व्यवस्था का दायित्व है।

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