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शिक्षा : मुफ्त शिक्षा का क्या हुआ

आलोचनाओं और दुष्प्रचार की वजह से सरकारी स्कूलों से लोगों का भरोसा लगातार कम हुआ है और छोटे शहरों, कस्बों और गांवों तक में बड़ी संख्या में निजी स्कूल खुले हैं।
Author नई दिल्ली | April 3, 2016 00:53 am
स्कूल में अध्ययन करते छात्र। (फाइल फोटो)

भारत में मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून लागू हुए छह साल हो गए। इस कानून को बनाने में हमें पूरे सौ साल लगे। 1910 में गोपाल कृष्ण गोखले ने सभी बच्चों के लिए बुनियादी शिक्षा के अधिकार की मांग की थी। इसके बाद 1932 वर्धा में हुए सम्मेलन में महात्मा गांधी ने इस मांग को दोहराया था लेकिन बात बनी नहीं। आजादी के बाद शिक्षा को संविधान के नीति निदेशक तत्त्वों में ही स्थान मिल सका, जो कि अनिवार्य नहीं था और यह सरकारों की मंशा पर ही निर्भर था। 2002 में भारत की संसद में 86वें संविधान संशोधन द्वारा इसे मूल अधिकार के रूप में शामिल कर लिया गया। इस तरह से शिक्षा को मूल अधिकार का दर्जा मिल सका। 1 अप्रैल 2010 को शिक्षा का अधिकार कानून -2009 पूरे देश में लागू हुआ। अब यह एक अधिकार है जिसके तहत राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना है कि उनके राज्य में 6 से 14 साल के सभी बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ-साथ अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हों और इसके लिए उनसे किसी भी तरह का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शुल्क नहीं लिया जा सकेगा।

इस कानून को लागू करने से पहले भी भारत में बुनियादी शिक्षा को लेकर काफी समस्याएं थीं और कानून आने के बाद इसमें कुछ नई दिक्कतें भी जुड़ी हैं, जैसे पर्याप्त और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी, शिक्षकों से दूसरे काम कराया जाना, सतत एवं व्यापक मूल्यांकन व्यवस्था को लेकर जटिलताएं, नामांकन के बाद स्कूलों में बच्चों की रुकावट और बच्चों के बीच में पढ़ाई छोड़ने की दर अभी बड़ी चुनौतियां हैं, लेकिन इसके सकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिल रहे हैं। आज लगभग सौ फीसद नामांकन हो गया है, जो की एक बड़ी उपलब्धि है और अब शहर से लेकर दूरदराज के गांवों में लगभग हर बसाहट या उसके आसपास स्कूल खुल गए हैं।

उपलब्धियां होने के बावजूद हमारी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था लगातार आलोचनाओं के घेरे में रही है। इस दौरान भारत में बुनियादी शिक्षा को लेकर जितनी भी रिपोर्टें आई हैं वे अमूमन नकारात्मक रही हैं। मीडिया में भी इसकी बदहाली की ही खबरें प्रकाशित होती हैं। सवाल उठता है कि आखिर इसकी वजह क्या है? क्या कानून में कोई कमी रह गई है या फिर हम इसे ठीक से लागू ही नहीं कर पा रहे हैं? इस बात की भी गुंजाइश है कि इस कानून के खिलाफ जानबूझ कर इसे निकम्मा साबित करने के लिए दुष्प्रचार किया जा रहा हो जिससे इसे एक ऐसे निष्क्रिय और अनावश्यक व्यवस्था के रूप स्थापित किया जा सके जिसमें सुधार करना नामुमकिन है।

आलोचनाओं और दुष्प्रचार की वजह से सरकारी स्कूलों से लोगों का भरोसा लगातार कम हुआ है और छोटे शहरों, कस्बों और गांवों तक में बड़ी संख्या में निजी स्कूल खुले हैं। इनमें से ज्यादातर निजी स्कूलों की स्थिति सरकारी स्कूलों से भी खराब है और उनका मुख्य ध्यान शिक्षा नहीं ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कूटना है। ‘एसोचैम’ के एक हालिया अध्ययन के अनुसार बीते दस सालों के दौरान निजी स्कूलों ने अपनी फीस में लगभग 150 फीसद बढ़ोतरी की है। शिक्षा क्षेत्र एक व्यापार के रूप में स्थापित हो चुका है जो सफल भी है, इस सफलता का कारण यह है कि निजी स्कूल जो लोग चला रहे हैं उनमें समाज के सबसे प्रभावशाली वर्ग के लोग शामिल हैं। इधर सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या लगातार घट रही हैं जबकि निजी स्कूलों में इसका उल्टा हो रहा है। देश के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (कैग) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार सरकारी स्कूलों में वर्ष 2010-11 में कुल नामांकन 1 करोड़ 11लाख था, जो 2014-15 में 92 लाख 51 हजार रह गया है, जबकि निजी स्कूलों में छात्रों की संख्या में 2011-12 से 14-15 में 38 प्रतिशत बढ़ी है। इन सबके बावजूद भारत के 66 फीसद प्राथमिक विद्यालय के छात्र सरकारी स्कूल या सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में जाते हैं।

कानून की भी सीमाएं हैं जिसका दुष्प्रभाव भी देखने को मिल रहा है, यह कानून 6 से 14 साल की उम्र के ही बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है और इसमें 6 वर्ष के कम आयु वर्ग के बच्चों की कोई बात नहीं की गई है यानी बच्चों के प्री-एजुकेशन को नजरअंदाज किया गया है। 15 से 18 आयु समूह के बच्चे भी कानून के दायरे से बाहर रखे गए हैं। इसी तरह से निजी स्कूलों में 25 फीसद सीटों पर कमजोर आय वर्ग के बच्चों के आरक्षण की व्यवस्था की गई है। यह एक तरह से गैर बराबरी और शिक्षा के बाजारीकरण को बढ़ावा देता है और सरकारी शालाओं में पढ़ने वालों का भी पूरा जोर निजी स्कूलों की ओर हो जाता है। जो परिवार थोड़े-बहुत सक्षम हैं वे अपने बच्चों को पहले से ही निजी स्कूलों में भेज रहे हैं लेकिन जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर हैं, उन्हें भी इस ओर प्रेरित किया जा रहा है।

कानून को लागू करने में भी भारी कोताही देखने को मिल रही है। बीस प्रतिशत स्कूल तो एक ही शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं और उनका भी ज्यादातर समय रजिस्टर भरने और मिड-डे मील का इंतजाम करने में चला जाता है। इसी तरह से स्कूलों को अतिथि शिक्षकों के हवाले कर दिया गया है जो शिक्षक कम और ठेके का कर्मचारी ज्यादा लगता है। इन सबका असर शिक्षा की गुणवत्ता और स्कूलों में बच्चों की रुकावट पर देखने को मिल रहा है। बजट को लेकर भी समस्याएं हैं। नवीनतम बजट में सर्व शिक्षा अभियान के लिए 52 फीसद राशि ही आबंटित की गई है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या तो सरकारों के रवैए में है। कानून बन जाने के बाद वे इसे सबसिडी योजना के नजरिए से ही देख रही है।

जन-भागीदारी और निगरानी की बात करें तो शिक्षा कानून के तहत स्कूलों के प्रबंधन में स्थानीय निकायों और स्कूल प्रबंध समितियों को बड़ी भूमिका दी गई है। कानून के अनुसार स्थानीय निकाय स्कूल के विकास के लिए योजनाएं बनाएंगी और सरकार द्वारा दिए गए अनुदान का इस्तेमाल करेंगी और पूरे स्कूल के वातावरण को नियंत्रित करेंगी लेकिन ऐसा हो नहीं पाया हैं, इसके पीछे कारण यह है कि या तो लोग पर्याप्त जानकारी और प्रशिक्षण के आभाव में निष्क्रिय हैं या फिर एक दूसरे पर दोष मढ़ने और अपना निजी फायदा देखने में व्यस्त हैं। गुणवत्ता समेत सहित सभी पहलुओं पर निगरानी के लिए राष्ट्रीय और राज्य बाल अधिकार आयोगों को भूमिका दी गई थी। आयोग बन भी गए हैं, लेकिन निगरानी का तंत्र भी अभी तक विकसित नहीं हो पाया है।

इन सब रुकावटों के बावजूद कुछ ऐसी कहानियां और प्रयोग हैं जो उम्मीदों को बनाए हुए हैं। हमें यह समझना होगा कि शिक्षा केवल राज्य का ही विषय नहीं है और केवल ठीकरा फोड़ने से मामला और बिगड़ सकता है। स्कूलों को सरकार और समाज मिल कर ही सुधार सकते हैं।

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  1. R
    raj kumar
    Apr 3, 2016 at 2:36 am
    पता नहीं शिछा हर बच्चे का मूल अधिकार हे या नहीं पर हो ये रहा हे की ज्यादातर सरकारी और गेर सरकारी अफसरों के बच्चे निजी स्कूल में ही अपने बच्चों को पढ़ाने,में अहमियत देते हे इसी वजह से निजी स्कूल वालो के भाव बढ़ते ही जा रहे हैं. सरकारेहाथ पे हाथ धरे बैठी हैं क्युकी ज्यादातर स्कूल और कॉलेज इन्ही नेताओं की मिलीभगत से या इनके ही स्वामित्व में चल रहे हैं. इनमे पड़ने वाले कोई कमाल कर रहे हों ऐसा नहीं लगता पर इन दुकानों का एक ही उद्देश्य हे की फीस उची से उची वसूल करना फिर कैसे उम्मीद करे की समाज में एका हो
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  2. S
    suresh k
    Apr 3, 2016 at 4:44 am
    सरकारी कर्मचारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़े कानून बने , नहीं पढ़ाने वालो की पदोन्नति रोके , सारे स्कूल सुधर जायेंगे
    Reply
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