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सेहत- सफाई का मनोविकार

बार-बार हाथ धोए, दिन में कई बार नहाए, कपड़े बदले, घर में बार-बार झाड़ू-पोंछा लगाए या लगवाए तो यह एक प्रकार का मनोविकार माना जाता है।
Author July 16, 2017 02:08 am
प्रतीकात्मक चित्र।

अपने आसपास साफ-सफाई रखना स्वस्थ जीवन के लिए जरूरी है। मगर कोई व्यक्ति सफाई को लेकर इस कदर सतर्क रहने लगे कि उसे हर कहीं गंदगी नजर आने लगे, हर समय उसका ध्यान सफाई पर लगा रहे। बार-बार हाथ धोए, दिन में कई बार नहाए, कपड़े बदले, घर में बार-बार झाड़ू-पोंछा लगाए या लगवाए तो यह एक प्रकार का मनोविकार माना जाता है। चिकित्सकों का कहना है कि मनुष्य के अवचेतन मन में दबे विचार गाहे-बगाहे बाहर निकलते रहते हैं। सामान्य मनुष्य उन्हें नजरअंदाज कर दूसरे कामों में अपना ध्यान लगाते हैं, मगर जब वे विचार किसी व्यक्ति की जीवन-शैली का हिस्सा बन जाते हैं तो वह बीमारी का रूप ले लेते हैं। सनक की हद तक व्यक्ति किसी एक आदत से बंध जाता है, उसे दोहराता रहता है। ऐसे मनोविकार को आॅब्सेसिव कंपल्सिव डिसआॅर्ड यानी ओसीडी कहते हैं। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ऐसे मनोरोगी में आॅब्सेशन यानी आवेश और कंपल्सन यानी विवशता दोनों होती है। वह अपने विचार को लेकर आवेश में रहता है और उसे दोहराता रहता है। यह उसकी विवशता बन जाती है। ओसीडी के कारण मस्तिष्क के दो हिस्सों के बीच संवाद में समस्या उत्पन्न हो जाती है। उसमें संक्रमण का डर, अपने को या दूसरों को नुकसान पहुंचाने की कल्पना, आक्रामकता, इच्छाओं पर नियंत्रण न होना, यौन संबंध के बारे में जरूरत से अधिक चिंतन, अत्यधिक धार्मिक निष्ठा, बीमारी का डर आदि ओसीडी का कारण बन जाती है।

इसमें व्यक्ति की सोच पर उसका नियंत्रण समाप्त हो जाता है। कई बार विचारों का प्रवाह इतना अधिक बढ़ जाता है कि उसका शरीर शिक्षिल पड़ने लगता है। एक शोध में ओसीडी के आनुवंशिक होने की भी जानकारी मिली है, लेकिन इसकी संख्या बहुत कम है। यह मनोविकार केवल साफ-सफाई को लेकर नहीं देखा जाता। अक्सर बसों, रेलों में ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो महिलाओं से सट कर खड़े होने में मानसिक संतोष पाते हैं। इसी तरह कुछ लोगों में इस कदर चोरी वगैरह का भय घर कर जाता है कि वे बार-बार घर के दरवाजे का ताला देखते रहते हैं कि वह ठीक से लगा है या नहीं। कुछ लोग बार-बार अपनी मेज पर या घर की चीजों पर अंगुली फिरा कर देखते हैं कि उस पर धूल के कण तो नहीं जमा हो गए। बिस्तर पर जाते हैं तो उन्हें लगता रहता है कि उस पर धूल के कण जमा हैं। कुछ लोगों में धार्मिक भावना इस कदर बैठ जाती है कि वे हर समय कोई न कोई मंत्र या भजन गुनगुनाते रहते हैं। दरअसल, यह एक प्रकार के भय से उपजी हुई मानसिक विकृति है। व्यक्ति के मन में किसी चीज को लेकर लगातार चिंता बनी रहती है। वह उस चिंता से मुक्त होने के लिए बार-बार एक ही क्रिया को दोहराता रहता है। अब मनोचिकित्सक इसे मानसिक रोग मानने लगे हैं।

ओसीडी का निदान

हालांकि ओसीडी से ग्रस्त व्यक्ति को अंदाजा नहीं होता कि वह किसी रोग की गिरफ्त में है। इसलिए वह भय से उपजे अपने विचारों को दोहराता रहता है। चिकित्सक मानते हैं कि ओसीडी एक ऐसा मानसिक विकार है, जो अज्ञानता के अभाव में वर्षों तक मरीज के अंदर दबा रहता है। यह बीमारी जितनी पुरानी होती है, उसके निदान में उतना ही लंबा समय लगता है। व्यक्ति इस बीमारी से किसी भी उम्र में पीड़ित हो सकता है। इसके निदान के लिए जरूरी है कि मरीज को उसके परिवार वालों का पूरा सहयोग मिले और वह इसे सामान्य बीमारी की तरह लेते हुए मनोचिकित्सक से संपर्क करें। ओसीडी से मुक्त होने की इच्छा का मन में पनपना इलाज के लिहाज से फायदेमंद रहता है। निदान के लिए मरीज को शिक्षित करने से लेकर विहेवियर थेरेपी तक की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, इस समय एक करोड़ से ऊपर भारतीय किसी न किसी रूप से इस बीमारी से पीड़ित हैं, जिसमें एक फीसद बच्चे भी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय पर इलाज कराया गया, तो इस बीमारी के शिकार लोगों की यह समस्या साठ से सत्तर फीसद तक कम हो जाती है। ओसीडी से पीड़ित व्यक्ति का उसकी चिंता से ध्यान हटाने का प्रयास होना चाहिए। अगर बच्चों में यह विकार पैदा हो गया है तो उनका ध्यान खेल-कूद की तरफ मोड़ें। अगर किसी व्यक्ति में यह विकार है तो उसके भय को दूर करने के लिए उसका ध्यान दूसरे कामों की तरफ बंटाएं। उसमें किसी न किसी बहाने भरोसा पैदा करें कि वह जिस चीज को लेकर चिंतित है, वह व्यर्थ है। ०

 

 

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First Published on July 16, 2017 2:08 am

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