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प्रसंग: प्रेमचंद की आस्था का सवाल

प्रेमचंद की एक कहानी ‘यही मेरी मातृभूमि है’ के आधार पर उनके हिंदूपन के स्वरूप को स्पष्ट करना चाहूंगा। कमल किशोर गोयनका का लेख।
Author October 2, 2016 01:53 am
प्रेमचंद ।

कमल किशोर गोयनका

प्रेमचंद के जीवन, साहित्य और विचार के अध्ययन-अन्वेषण को आधी सदी देने और विपुल दस्तावेजों, पत्रों, पांडुलिपियों के आधार पर उनकी एक नई मूर्ति गढ़ने पर देश-विदेश से प्रशंसा और विरोध दोनों ही सुनने-झेलने पड़े। प्रशंसा करने वालों का कोई दल या वैचारिक समूह नहीं था। ये प्रशंसक जीवन के विविध क्षेत्रों, विचारों और मान्यताओं वाले थे और प्रेमचंद उनके प्रिय लेखक थे। विरोध करने वालों में हिंदी-उर्दू के प्रगतिशील खेमे के लोग थे और ये अपनी ‘वस्तुवादी आलोचना दृष्टि’ से वामपंथी मापदंड से मेरी स्थापित नई मान्यताओं और निष्कर्षों से चीड़फाड़ करके मिथ्या तर्कहीन आरोपों का तूफान खड़ा कर रहे थे। इनकी वैज्ञानिक आलोचना मेरे द्वारा प्रस्तुत मूल दस्तावेजों-प्रमाणों की सत्यता पर अंगुली न उठा कर भी उनसे निकलने वाले निष्कर्षों को स्वीकार करने का साहस नहीं कर पा रहे हैं।

ऐसी स्थिति में अपनी भ्रामक धारणाओं को बचाने और प्रेमचंद का अपने राजनीतिक उद्देश्यों से इस्तेमाल करने की आपराधिक कुंठा से रक्षा करने के लिए ये मेरे प्रेमचंद संबंधी शोध पर आरोपों का अंबार खड़ा कर रहे थे। मेरे शोध-कर्म से प्रगतिशीलों की कई धारणाएं असत्य सिद्ध हो गर्इं- प्रेमचंद की गरीबी का झूठा मिथ टूट गया, प्रेमचंद की मानवीय दुर्बलताएं सामने आर्इं, प्रेमचंद की मार्क्सवादी छवि की सत्यता खंडित हुई और मार्क्स के अर्थ में प्रगतिशील लेखक की स्थापना की पोल खुली, प्रेमचंद के मूल दस्तावेजों पर आधारित निष्कर्षों की अवमानना और उपेक्षा से प्रगतिशीलों की वैज्ञानिक आलोचना की अवैज्ञानिकता सिद्ध हुई और प्रेमचंद के हिंदूपन की चर्चा से भयभीत होकर मुझे ‘गऊछाप’ और ‘हिंदूवादी’ लेखक घोषित करके मेरे पचास वर्ष के शोध-कर्म पर पानी फेरने का राजनीतिक षड्यंत्र भी स्पष्ट हो गया।

हिंदी के प्रगतिशील लेखकों की एक लंबी सूची है, जिन्होंने सन 1973-74 से आज तक बार-बार मुझ पर प्रेमचंद को हिंदू बनाने का आरोप लगाया है। मैं अब तक नहीं समझ पाया कि एक हिंदू परिवार में जन्मे लेखक को पुन: हिंदू कैसे बनाया जा सकता है? क्या ये वामपंथी लेखक मानते हैं कि प्रेमचंद मुसलमान या ईसाई थे और मैं उन्हें हिंदू बता रहा हूं? इसका उत्तर प्रेमचंद के पुत्र अमृत राय और हिंदी लेखक अमृतलाल नागर के शब्दों में देना चाहूंगा। अमृत राय ने कहा है कि प्रेमचंद हिंदू परिवार में पैदा हुए थे, अत: उनके साहित्य में हिंदू विश्वास और प्रवृत्तियों का होना स्वाभाविक है। अमृतलाल नागर ने भी स्पष्ट लिखा है कि प्रेमचंद हिंदू लेखक थे। यहां तक कि प्रेमचंद ने कई बार लिखा है कि वे हिंदू लेखक हैं। उन्हें इसका अफसोस था कि हिंदू होने के कारण ही उर्दू में उन्हें सम्मान नहीं मिला।

प्रेमचंद की एक कहानी ‘यही मेरी मातृभूमि है’ के आधार पर उनके हिंदूपन के स्वरूप को स्पष्ट करना चाहूंगा। इसका कथानायक अमेरिका से लौट कर पुराने छोड़े भारत को ढूंढ़ता है, लेकिन उसे सर्वत्र यूरोप, अमेरिका की सभ्यता दिखाई देती है। वह अंत में अपने भारत को गंगा किनारे और हिंदू भारत में पाता है और ऐसे भारत को अपनी मातृभूमि मानता है। प्रेमचंद इस कहानी में देश-प्रेम में हिंदू संस्कृति से आत्मीय संबंधों और उससे एकत्व को देखते हैं और इसे ही सर्वश्रेष्ठ भारत कहते हैं।  कहानी में कथानायक सुखी-समृद्ध जीवन जीकर साठ वर्ष के बाद अमेरिका से भारत लौटता है। वह अनंत धन, प्रियतमा पत्नी, सपूत बेटों-पोतों का परित्याग इसलिए करता है कि वह अपनी ‘प्यारी भारत-जननी’ के दर्शन कर सके और अपनी मातृभूमि का रज-कण बन सके। कथावाचक बंबई के बंदरगाह पर उतरता है, अंगरेजी बोलते मल्लाहों के साथ ट्राम-मोटरगाड़ियां आदि देखता है, तो उसे यह अमेरिका, इंग्लैंड दिखाई देता है, प्यारा भारत नहीं दीखता। वह अपने गांव, अखाड़ा, बरगद का पेड़, चौपाल आदि स्थानों पर जाता है, पर सर्वत्र उसे भारत का विघटन और अंगरेजी सभ्यता का प्रभाव दिखाई देता है और उसे कहीं अपना भारत नहीं मिलता, लेकिन एक दिन भोर होते समय कुछ स्त्री-पुरुष ‘हमारे प्रभु अवगुन चित न धरो’ गाते हुए और ‘शिव-शिव, हर-हर, गंगे-गंगे, नारायण-नारायण’ का उच्चारण करते हुए जाते हैं, तो वह इनमें अपने ‘देश का राग’ और ‘मातृभूमि का स्वर’ सुनाई पड़ता है।

उसे इस राग में जीवन का सर्वाधिक आनंद और सुख प्राप्त होता है, क्योंकि वह इनमें अपने प्यारे देश की बातें पाता है। वह ‘पतित-पावनी’ नदी (गंगा) के किनारे उन व्यक्तियों के साथ-साथ पहुंचता है, जिसकी लहरों में डुबकी लगाना और जिसकी गोद में मरना प्रत्येक हिंदू अपना परम सौभाग्य समझता है। कथावाचक के लिए गंगा ‘पतित-पावनी भागीरथी’ है और उसके मन में ‘गंगा माता’ के दर्शनों की प्रबल लालसा है। वह देखता है कि गंगा के किनारे कुछ लोग गायत्री मंत्र का जाप कर रहे हैं, कुछ हवन और कुछ तिलक लगा रहे हैं और कुछ सस्वर वेद मंत्रों का पाठ कर रहे हैं। वह कह उठता है, ‘यही मेरा प्यारा देश है, यही मेरी मातृभूमि है, यही मेरा सर्वश्रेष्ठ भारत और इसी के दर्शनों की मेरी उत्कट इच्छा है। ये लोग मेरे भाई हैं और गंगा मेरी माता है।’ वह गंगा के किनारे कुटी बनाता है और ‘राम नाम’ जपना ही उसका काम है। नित्य गंगा स्नान करता है और चाहता है कि यहीं प्राण निकलें और अस्थियां गंगा-माता की लहरों की भेंट हों। अब उसे कोई यहां से नहीं हटा सकता, क्योंकि यह मेरा प्यारा देश है और यही प्यारी मातृभूमि है।

कहानी के इन तथ्यों और कथा नायक के इन वचनों में अगर किसी को हिंदू धर्म संस्कृति न दिखाई दे तो उसकी आंखों का ही कसूर है। कहानी में राम, शिव, नारायण आदि हिंदू-देवताओं का उल्लेख और उनके प्रति आस्था का भाव और गंगा के प्रति विशुद्ध हिंदू विश्वास इस कहानी को हिंदू धर्म संस्कृति की श्रेष्ठता को स्थापित करने वाली कहानी बना देती है और प्रेमचंद के हिंदू विश्वासों को स्पष्टत: उद्घाटित करती है। इसी कहानी में हिंदू आस्थाएं, विश्वास और जीवन दृष्टि आलोचनात्मक न होकर विश्वासपूर्ण तथा अनुकरणीय हैं और लेखक उनमें श्रेष्ठता और उच्चता देखता है। प्रेमचंद की इन हिंदू आस्थाओं को भयावह कहना एक भयंकर साहित्यिक अपराध है। उनकी हिंदू चेतना अपने समाज के धर्म और संस्कृति के साथ राष्ट्रीय भाव को जोड़ती है और अपने समय की राष्ट्रीयता को सांस्कृतिक आधार देती है। वामपंथी अपनी सांस्कृतिक राष्ट्रीय चेतना को छिटक रहे हैं, लेकिन प्रेमचंद की यह एक बड़ी शक्ति है, क्योंकि यह उस युग की एक बड़ी शक्ति और चेतना रही है। प्रेमचंद का हिंदुत्व ऐसा ही है, जो भारतीयता का पर्याय है और सांप्रदायिकता से कोसों दूर है। इसमें भारत देश का राग है और मातृभूमि का स्वर है, जो हजारों वर्ष की हिंदू धर्म संस्कृति से निकलता है।

मुझे आश्चर्य है, हमारे वामपंथी मित्र प्रेमचंद की हिंदू व्याख्या से इतने बिदकते क्यों हैं और क्यों ऐसी व्याख्या करने वालों को अपना शत्रु समझते हैं? प्रेमचंद पर उनका एकाधिकार नहीं है और न हिंदी समाज उनकी तानाशाही स्थापनाओं को स्वीकार करेगा। बेपेंदी के लोटे में पानी नहीं भरा जा सकता। प्रेमचंद की वसीयत को मार्क्सवादी खूनी दर्शन से जोड़ने की उनकी चालबाजी भी अब नहीं चलेगी। प्रेमचंद का साहित्य लगभग पंचानबे प्रतिशत हिंदू समाज पर आधारित है, इसलिए उस युग की हिंदू चेतना के आधार पर उसका मूल्यांकन करना क्यों ‘भयावह’ माना जा सकता है? अगर वामपंथी प्रेमचंद को प्रेमचंद की दृष्टि से देखें और उन्हें मार्क्सवाद के पिंजड़े में बंद न करें, तो वे निश्चय ही मेरी खोजों और स्थापनाओं के समर्थक बन जाएंगे। देश की सामाजिक संस्कृति या गंगा-यमुना संस्कृति में गंगा के इतिहास, अस्तित्व, संस्कृति और परंपरा के प्रवाह को महत्त्वहीन नहीं बना सकते और उसकी चर्चा को अपराध नहीं कह सकते। ०

 

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First Published on October 2, 2016 1:53 am

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