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व्यंग्य कॉलम में प्रेम जनमेजय का लेख : बर्फ का पानी

छोटा लड़का विवश, निराश-सा बड़े के पास खड़ा हो गया था, उसके होंठ सूख रहे थे और वह उन्हें बार-बार जीभ फेर कर तर कर रहा था। इस बीच प्रतीक्षा खत्म हो गई थी।
Author नई दिल्ली | July 17, 2016 01:02 am
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समाचार मिला कि वे मर गए हैं। बाहर जून की गर्म दोपहर थी और वे मर गए थे। बाहर मुहावरे में ही नहीं, हकीकत में आग बरस रही थी। वे दिल्ली जैसे महानगर में मरे थे, जहां किसी मरे की अरथी को कंधा देने जाने के लिए सड़क पर बार-बार मरने से बचना होता है। एसी का आदी हो चुका शरीर बिन एसी अधमरा हो जाता है। लू के थेपेड़े आपको अधमरा कर ही देते हैं। वैसे एक लाभ है, मरे आदमी की अंतिम यात्रा में अधमरा होकर जाया जाए, लगता है कि आप बहुत दुखी हैं।

वे दिल्ली के दूसरे कोने मे मरे थे, तीस किलोमीटर दूर। ये दोनों बूढ़े पेंशनधारी हैं। पेंशन दवाई खाने में अधिक खर्च होती है, खाना खाने में कम। पर जाना तो है, वरना बिरादरी क्या कहेगी। वे अपनी अनिच्छा और बिरादरी की इच्छा से चले। टैक्सी की औकात नहीं थी, बस में धक्के खाने की हिम्मत नहीं थी, सो उन्होंने आॅटो ले लिया। आॅटो में लू चारों दिशाओं से वैसे ही आक्रमण करती है जैसे चुनावों में उसकी गर्मी।

जो मरे थे वे जेजे कॉलोनी के दो कमरे के मकान में अपने कुनबे के साथ रहते थे। जेजे कॉलोनी का श्मशान भी निवासियों की तरह गरीब होता है। न पंखा और न बैठने का उचित स्थान। लाश को निबटाने का मन करता है। पॉश कॉलानियों का श्मशान भी पॉश होता है। यहां बार-बार मर कर आने का दिल करता है। शवयात्रा में आई सुंदरियों से शोभा बढ़ जाती है।

जमीन पर बिछी दरियों पर बैठे, सहमे-से विवश लोग… धूप की तेजी को रोकने के लिए, अपनी मौत को रोकने को विवश किसी गरीब किसान-सा तना शामियाना। थके-हारे दोनो बूढ़े पेंशनधारी, पानी के दो गिलास गटक कर गर्म शमियाने के अंदर बैठ गए थे। कैसे मरे? क्या हुआ था? यह सब कैसे हो गया? कल तक तो ठीक थे, जैसे प्रश्नों के बाद एक चुप्पी। अब कोई कितनी देर तक मरे आदमी की बात करे। ताजा मौत हुई थी और शव अभी पड़ा था, इसलिए आवाज ऊंची नहीं उठ सकती थी। बड़ी लड़की हरिद्वार में रहती थी। उसे तार दे दिया गया था। शव बर्फ की सिल्लियों के बीच रखा हुआ था। इतनी तेज गर्मी में चार-पांच घंटे भूखे रहना तो संभव था, पर सूखते गले को सहना कठिन था। एक टब में पानी भर कर बर्फ डाल दी गई थी। गिलासों को धोने, उन्हें रखने-उठाने की आवाज उदास चुप्पी को तोड़ रही थी। कभी-कभी पानी की चाह में अपराधबोध से ग्रस्त जैसी आवाजें बिखरी हुई थीं। औरतों के बीच घिरी शव की पत्नी का विलाप अब हिचकियों में बदल गया था। बड़ी लड़की के इंतजार में लोग धूप में जल रहे थे। प्रतीक्षारत लोगों को मरने वाले के मरने का दुख कम हो रहा था और लड़की के अब तक न आने का कष्ट बढ़ रहा था। उदासी बेचैनी में बदल रही थी। बहुत देर तक जमीन पर घुटने मोड़ कर न बैठ पाने वाले दर्दिया रहे थे। बतरसियों को चुप्पी खल रही थी। धीरे-धीरे लोगों ने परिचितों के पास सिमट कर फुसफुसाहट में बतियाना शुरू कर दिया। लाश बर्फ में लिपटी पड़ी थी। गर्मी के कारण पीने का पानी कम पड़ रहा था। उम्मीद नहीं थी कि इतना इंतजार करना पड़ेगा। हरिद्वार से टैक्सी दिल्ली के बार्डर तक तो ठीक आई, पर दिल्ली में घुसते ही जाम में फंस गई थी।

सब के हृदय गर्मी की लू के कारण स्तब्ध थे। दूर-दूर तक कोई नहीं दिखाई दे रहा था जैसे चुनाव हारी हुई पार्टी के कार्यालय में दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आता है। बूढ़ा बोर हो रहा था। वह बहुत जल्दी बोर हो जाता है। वैसे भी यह समय उसके पंसदीदा सीरियल का था। अचानक उसने दो बच्चों को दौड़ते हुए अपनी तरफ आते हुए देखा। उसने अपना ध्यान इधर लगा दिया। दोनों में जैसे पहले पहुंचने की होड़-सी लगी हुई थी। एक बारह-चैदह वर्ष का होगा और दूसरा सात-आठ वर्ष के लगभग। उस भीषण गर्मी में न जाने किस उम्मीद में वे इस ओर भागते हुए आ रहे थे। बड़ा लड़का पहले पहुंचा था। उसने जैसे ही शव को बर्फ की सिल्ली पर पड़े देखा, सहम कर रुक गया। उसने अपने सिर पर हाथ रख लिया था। छोटा भी पहुंच गया और उसने प्रश्नवाचक आंखों से बड़े की ओर देखा। बड़े लड़के ने छोटे का हाथ उसके सिर पर रख दिया। दोनों के चेहरे बता रहे थे कि उन्होंने कुछ अनहोना देखा है। वे किसी उम्मीद में दौड़ते हुए आए थे। शायद शामियाना लगा देख कर उन्होंने सोचा होगा कि कोई शादी-ब्याह है। दोनों भागने के कारण हांफ रहे थे। बड़े ने नेकर और कमीज पहनी हुई थी और छोटा नेकर में था। दोनों नंगे पैर थे और सिर पर हाथ रखे अब भीड़ को घूर रहे थे। नंगे पैर जलने लगे तो दोनों छांह में खड़े हो गए। उनके लिए वहां रुकना आवश्यक नहीं था, पर शायद एक आतंकपूर्ण विवशता थी या फिर इतनी धूप में दौड़ कर आने के कारण वे वापस लौटने का साहस खो चुके थे। आते समय तो कुछ मिल जाने की उम्मीद थी, पर जाते समय…

छोटे लड़के को शायद प्यास लग आई थी। वह धीरे-धीरे पानी पीने के लिए उस ओर बढ़ रहा था, जहां पानी का टब पड़ा था। वहां पहुंच कर उसने हथेलियों से ओक बना कर पानी मांगा था, पर उस अधनंगे वीभत्स बच्चे को सामने देखते ही वहां खड़े सज्जन ने उसे डांट दिया था। प्यास की विवशता में जब छोटे लड़के ने दोबारा पानी मांगा तो वे सज्जन दांत पीसते हुए उसे मारने को दौड़े-से थे। बर्फ का ठंडा पानी बैठे हुए लोगों के लिए था, न कि उस आवारा लड़के के लिए।

छोटा लड़का विवश, निराश-सा बड़े के पास खड़ा हो गया था, उसके होंठ सूख रहे थे और वह उन्हें बार-बार जीभ फेर कर तर कर रहा था। इस बीच प्रतीक्षा खत्म हो गई थी। बेटी आ गई थी। शव को नहलाने के लिए उसे बर्फ की सिल्लियों में से निकाला गया। बर्फ की सिल्लियों को पास की सूखी नाली में लुढ़का दिया गया था, छोटे लड़के ने जीभ से एक बार फिर होठों को तर किया था।

‘राम नाम सत्त’ की आवाज से अरथी उठी। एक निष्प्राण देह जीवित लोगों की बिरादरी से उठ रही थी। तभी मैंने उस छोटे लड़के को देखा। वह नाली में फेंकी गई बर्फ का एक टुकड़ा उठा कर चूस रहा था। उसका दूसरा हाथ उसके सिर पर था।
बड़े ने उसे डांटा- फेंक इसे, ये मुर्दे की बर्फ है।
छोटे ने चूसते हुए कहा- बर्फ जूठी थोड़े होती है।

(प्रेम जनमेजय)

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