December 11, 2016

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नवधारा: लोक क्षेत्र की संभावनाएं

शिक्षा के क्षेत्र में लोक क्षेत्र का एक प्रयोग इलाहाबाद में स्वराज विद्यापीठ के रूप में सामने आया है।

Author November 27, 2016 03:54 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

मनोज त्यागी

आ जादी के सत्तर सालों बाद भारत ने मोटे तौर पर दो तरह की अर्थव्यवस्थाएं देखीं। 1990 तक चली अर्थव्यवस्था में निर्णायक स्थिति में सार्वजनिक क्षेत्र रहा, हालांकि इसमें निजी क्षेत्र भी शामिल था, लेकिन प्रभावी नहीं था। 1990 के बाद से निजी क्षेत्र हावी हो गया। निजी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था देश की बुनियादी समस्याओं यानी गरीबी, बेरोजगारी, विषमता, आर्थिक अन्याय आदि से देश को निजात नहीं दिला सकी और यही निष्कर्ष पिछले 25 साल से चले आ रहे निजी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के बारे में आसानी से निकाला जा सकता है। दोनों तरह की अर्थव्यवस्थाओं ने मिलकर एक काम और किया है, वह है पर्यावरण विनाश का। इसे रोकने का रास्ता भी इन दोनों तरह की व्यवस्थाओं में नहीं है। वैश्विक स्तर पर भी देखें तो साम्यवादी और समाजवादी देशों की व्यवस्थाओं में निर्णायक भूमिका सार्वजनिक क्षेत्र के हाथ में रही और पूंजीवादी देशों में यह भूमिका निजी क्षेत्र ने निभाई।

कुछ छिटपुट अपवाद जरूर रहे। अब सार्वजनिक क्षेत्र वाली साम्यवादी और समाजवादी व्यवस्थाएं तो लगभग टूट चुकी हंै और पूंजीवादी व्यवस्थाएं एक बार फिर महामंदी के किनारे पर खड़ी हंै। विश्व में कहीं भी इन दोनों प्रकार की व्यवस्थाओं में गरीबी, बेरोजगारी और पर्यावरण विनाश की बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं हो सका है और न ही दुनिया शांति की तरफ बढ़ी है। समाजवैज्ञानिक और अर्थशास्त्री नहीं समझ पा रहे है कि समाधान कौन सी व्यवस्था में होगा। सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र की व्यवस्थाओं में चिप्पीकारी-पच्चीकारी करके वे फौरी समाधान ढूंढ़ रहे है। निजी क्षेत्र वाली वाली व्यवस्था काफी चली है और उसके समर्थक अर्थशास्त्रियों ने तो यहां तक कह दिया कि इस व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है। जब वे कहते है कि ‘कोई विकल्प’ नहीं है तो इसका अर्थ होता है कि अब केवल निजी क्षेत्र वाली व्यवस्था ही चलेगी जिसमें सारी अर्थव्यवस्था निजी कारपोरेट (जिन्होंने अब इतना विशालकाय रूप ग्रहण कर लिया है कि वे देशों से भी बड़ी हो गई हैं) के हाथ में होगी, वे ही निर्णायक भूमिका निभाएंगी, राजनीति उनकी चेरी होगी और राज्य उनके हितों की रक्षा करने वाली और उनकी गतिविधियों को सुसाध्य और सुगम बनाने वाली संस्था होगी। लोकतंत्र तो होगा पर वह निजी क्षेत्र को कुछ भी करने, कुछ भी बोलने, कहीं भी आने-जाने, किसी भी तरह का निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता देगा। लोकतंत्र में लोक को कुछ समयांतराल पर मात्र वोट देने का अधिकार मात्र होगा, बाकी कुछ नहीं। निजी क्षेत्र के सिरमौर अमेरिका में तो ‘कॉरपोरेटो की, कॉरपोरेटो के द्वारा, कॉरपोरेटों के लिए’ वाला लोकतंत्र कायम हो गया है।

लेकिन, कहते हैं कि इंसान समस्याओं का निदान खोजने से बाज नहीं आ सकता। उसने एक समाधान खोजा है पिपुल्स सेक्टर यानी लोक क्षेत्र। दुनियाभर में जन समुदाय छोटी-छोटी पहल करके पिपुल्स सेक्टर को खड़ा कर रहे है। विशेषज्ञ अपने आलीशान कक्षों में बैठकर और किताबी अध्ययन करके भले ही धरातल पर न देख पाएं पर आम आदमी तो धरातल पर ही रहता है और अपनी समस्याओं को दूर करने की यथार्थवादी कोशिश करता ही है। दुनिया भर में स्थानीय जन समुदाय पहल करके कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र में पिपुल्स सेक्टर को सफलतापूर्वक लागू कर रहा है । पिछले महीने जर्मनी के ऊर्जा मंत्री राबर्ट हैबक भारत आए तो उन्होंने बताया कि जर्मनी के समुद्र तटीय उत्तरी प्रांत सेल्सबिग होलस्टीन में स्थानीय जन समुदाय ने अपनी मालकियत में पवन ऊर्जा पार्क खड़ा किया है। वहां के जन समुदाय के हर व्यक्ति ने 500 यूरो से 10,000 यूरो तक अपना पैसा लगाकर और कुछ मदद राज्य से लेकर यह पार्क विकसित किया है और अपनी जरूरत की पूरी बिजली इस स्रोत से पैदा कर रहे हैं। बची बिजली की बिक्री से जो लाभ होता है वह जनसमुदाय के सदस्यों में बंट जाता है। बड़ी कंपनियां कोयले और परमाणु के बिजलीघर तो चला रही थीं जो प्रदूषणकारी और महंगी थी, पर पवन बिजली के स्वच्छ स्रोत में पैसा लगाने को तैयार नहीं थीं। तब लोग उठ खड़े हुऐ और ग्रीन पार्टी के अपने मंत्री की मदद से अपना स्वयं का स्वच्छ बिजली उत्पादन का केंद्र बना डाला।

साम्यवादी सोवियत संघ बिखर गया तो छोटे से क्यूबा पर भयंकर संकट आ गया। क्यूबा का निजी क्षेत्र ठप्प पड़ गया। तो क्यूबा की सरकार ने नया प्रयोग किया। वहां कृषि फार्म और छोटे कारखाने स्थानीय समुदाय को सौंप दिए गए। सब्जी, फल उत्पादन के लिए घरों के पास किचन गार्डन को प्रोत्साहित किया गया। अगले कुछ वर्षों में स्थानीय समुदायों ने मिलकर नई व्यवस्था का निर्माण कर दिया जिसमें पिपुल्स सेक्टर की बड़ी भूमिका है। कनाडा की नोबेल पुरस्कार विजेता ओलीनार आस्ट्रम ने नेपाल, भूटान जैसे कुछ देशो में सामुदायिक आर्थिक गतिविधियों का गहन अध्ययन करके निष्कर्ष निकाला कि जल, जंगल, जमीन और खनिजों जैसे प्राकृतिक संसाधनों का अनुकूलतम और सर्वोत्तम उपयोग तब होता है जब वे समुदाय के पूर्ण नियंत्रण में होते हंै और उनके नियोजन का निर्णय लेने का अधिकार उसी के पास होता है। सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र इतने दक्ष और निपुण तरीके से इन संसाधनों का इस्तेमाल नहीं कर पाते और पर्यावरण का भी विनाश कर देते हैं, पर समुदाय इसके उलट कम संसाधनों में ज्यादा उत्पादन, पर्यावरण संरक्षण, रोजगार सृजन, गरीबी उन्मूलन करने में सक्षम होता है।

हमारे देश में ऐसे छोटे-छोटे प्रयोग कई स्थानों पर चल रहे है। ऊर्जा उत्पादन, वस्तु उत्पादन, कृषिउत्पादन, तालाब-नहर निर्माण, सड़क पुलिया निर्माण से लेकर स्वच्छता के काम तक में ये प्रयोग फैले हुए हैं। इनमें सार्वजनिक क्षेत्र या निजी क्षेत्र शामिल नहीं हैं। बल्कि ये पूरी तरह लोकक्षेत्र द्वारा संचालित, निर्देशित और क्रियान्वित है। केरल के कोट्टायम जिले के एक गांव में ग्राम समुदाय ने पुलिया निर्माण के लिए सरकारी ठेकेदारों, इंजीनियरों और निजी कंपनियों को नहीं आने दिया और स्वयं मिलकर एक तिहाई धन से बहुत कम समय में पुलिया का निर्माण कर दिया। उत्तराखंड के टिहरी जिले के चमियाला में बाल गंगा नदी पर दो मेगावाट का पनबिजलीघर का निर्माण गांव के लोगों की मदद से हो रहा है। हजारीबाग के करणपुरा क्षेत्र में दो गांवों में ग्राम समुदाय की देखरेख में बीस-बीस किलोवाट के छोटे थर्मल पावर प्लांट लगाए गए हैं, जो गांव की बिजली की जरूरत को पूरा करते हैं। उत्तर पूर्व के राज्यों में भी कई स्थानों पर ऐसे प्रयोग चल रहे हैं। पर ये सब स्थानीय लोगों के धन और श्रम से ही चल रहे है। सरकारों का इनमें कोई योगदान नही है। मुंबई के डिब्बा वाला, बंग्लुरु में अपना सब्जी कारोबार कर रहे किसान, कई सामुदायिक भोजनालय ऐसे ही प्रयोग है।

शिक्षा के क्षेत्र में लोक क्षेत्र का एक प्रयोग इलाहाबाद में स्वराज विद्यापीठ के रूप में सामने आया है। असल में लोकक्षेत्र में असीम संभावनाएं हैं। जरूरत है इन प्रयोगों को बड़े स्तर पर प्रोत्साहित करने की। कृषि में उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन स्थानीय किसान समुदाय के हाथ में होगा तो बेरोजगार लाखों नौजवानों को वहां सम्मानजनक रोजगार मिलेगा। शहरों में खाली घूम रहे लाखों नौजवान, जिनके पास व्यावसायिक प्रशिक्षण है और कुछ करने का जज्बा भी, उन्हें निर्माण क्षेत्र और सेवा क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से सामूहिक कार्य में लगाया जा सकता है। ग्राम सभाओं को विकास योजनाओं से मुक्त पैसा दिया जाए और उस पैसे को इस्तेमाल करने का अधिकार उनके पास हो तो अस्पताल, प्राइमरी शिक्षा,मिड डे मील, आवास निर्माण, शौचालय निर्माण, सिंचाई योजनाएं, मनरेगा जैसी योजनाएं वे स्वयं बनाकर चला सकते है। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले का हिवरे बाजार गांव इस प्रयोग का जीता जागता नमूना है।

देश की सरकारें तो लोक क्षेत्र की तरफ से बिल्कुल उदासीन हैं। ऐसा नहीं है कि नीति निमार्ताओं का ध्यान इस तरफ न जाता हो, पर राजनीतिक दलों, सरकारों और बड़ी कारपोरेट कंपनियों को लोक क्षेत्र से शायद डर लगता है। सहकारी सस्थाएं चलाने का प्रयोग किया गया था, लेकिन वे सरकारी हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के कारण बेकार हो गर्इं। सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार रखने वाला और प्राकृतिक संसाधनों पर मालकियत वाला लोक क्षेत्र राजनीतिक तंत्र और कारपोरेटों के निजी क्षेत्र के आर्थिक आधार ही खत्म कर देगा इसलिए वे डरते हैं। अगर लोक क्षेत्र को नीति के स्तर पर प्रोत्साहन मिले, बैंको से क्रेडिट मिले, तकनीकी और प्रबंध संस्थानों से जानकारियां मिलें तो यह बहुत जल्दी खड़ा हो सकता है और देश की बुनियादी समस्याओं के निपटारे में अहम भूमिका निभा सकता है। १

 

 

 

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First Published on November 27, 2016 3:52 am

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