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बढ़ावा भी, मनाही भी

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार पिछले दस साल में जहरीली शराब पीने से 11,032 लोगों की मौत हुई है।
Author नई दिल्ली | March 19, 2016 23:08 pm
देश में प्रतिवर्ष धूम्रपान की वजह से दस लाख लोगों की मौत होती है।

एक तरफ भारत को गर्व के साथ युवा-शक्ति के तौर पर पेश किया जा रहा है, लेकिन, इस सच्चाई को तब धक्का पहुंचता है जब हमें यह पता चलता है कि इस समय हमारा मुल्क दुनिया में नशाखोरी के मामले में दूसरे स्थान पर है। इस समय भारत में 10.80 करोड़ युवा आबादी धूम्रपान की गिरफ्त में है। देश में प्रतिवर्ष धूम्रपान की वजह से दस लाख लोगों की मौत होती है। यह आंकड़ा देश में होने वाली कुल मौतों का दस फीसद है। भारत में सत्रह साल पहले धूम्रपान करने वाले पुरुषों की संख्या 7.9 करोड़ थी। इसमें 2.9 करोड़ का इजाफा हुआ है। देश में धूम्रपान करने वाली महिलाओं की संख्या 1.1 करोड़ है। शोध के अनुसार भारत में पिछले डेढ़ दशक में सिगरेट पीने वालों की तादाद काफी बढ़ी है। 15 से 29 वर्ष तक की आयु वर्ग के लोगों में धूम्रपान की लत में जबर्दस्त वृद्धि हुई है। शहरों में धूम्रपान करने वालों की संख्या में 68 और ग्रामीण क्षेत्रों में 26 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सिगरेट पीने के मामले में आज भारत पूरी दुनिया में दूसरे स्थान पर है। अभी तक वह सिर्फ चीन से पीछे है। जिस रफ्तार से भारतीय युवाओं में सिगरेट पीने का चलन बढ़ रहा है, अगर यही गति बनी रही तो जल्द ही वह चीन को भी पीछे छोड़ देगा।

हाल ही में टोरंटो विश्वविद्यालय में हुए एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि भारत में अठारह साल की उम्र में धूम्रपान करने वाले पुरुषों की संख्या में छत्तीस फीसद का इजाफा हुआ है। यानी सिगरेट और बीड़ी पीनेवालों की संख्या 10.80 करोड़ पहुंच गई है। यह वृद्धि 1998 से 2015 के बीच दर्ज की गई है। 15 से 29 आयुवर्ग में धूम्रपान की लत में जर्बदस्त वृद्धि पाई गई है। नशे को हमेशा से विनाशकारी चीजों में शुमार किया जाता रहा है। नशे के चक्कर में सभ्यताओं और संस्कृतियों तक को तबाह होते देखा गया है। चीन जैसा ताकतवर देश एक जमाने में अफीमचियों का देश कहा जाने लगा था। उससे उबरने में उसी दशकों लगे। आज भी कई देश हैं जो अपने शत्रु-देशों से निपटने के लिए वहां के नागरिकों में नशे की लत डालने की कोशिश करते रहते हैं। मगर चिंता का विषय तो यह है हमारी सरकार (जिसे कल्याणकारी राज्य माना जाता है), वह भी नशाखोरी में हमसाज रहती है। राज्यों का आबकारी विभाग एक तरफ नशे को बढ़ावा देने में लगा रहता है तो साथ ही मद्य-निषेध विभाग इसे रोकने में। यह कैसा अंतर्विरोध है, यह कैसा विरोधाभास है?

नशे की दुनिया जितनी कल्पनाओं में विचरती है, काश उतनी ही स्वाथ्यकारी भी होती! दुनिया भर के तमाम चिकित्सीय शोध और अध्ययन बता चुके हैं कि नशा कोई भी हो, असल में है वह है धीमा जहर ही। लेकिन, नशे को लेकर हमारी सरकारों का मापदंड दोहरा है। किसी भी किस्म के नशे को समाज में अच्छी नजर से नहीं देखा जाता, लेकिन फिर भी इसका चलन बदस्तूर कायम है। एक तरफ सिगरेट, शराब, तंबाकू, बीड़ी, गुटखा आदि नशीली चीजों का बाकायदा जोरशोर से उत्पादन और बिक्री हो रही है, दूसरी तरफ उसका सेवन न करने के खर्चीले अभियान चलाए जा रहे हैं। लाखों-करोड़ों रुपए विज्ञापनों में फूंका जाता है। पंजाब जैसा संपन्न राज्य प्रतिबंधित नशाखोरी की वजह से पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है।

सिगरेट सेवन इस लिहाज से और ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यह उन लोगों को भी प्रभावित करता है, जो पीनेवालों के आस-पास होते हैं। शराब या तंबाकू का सेवन करने वाले सीधे तौर पर खुद को नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन आर्थिकरूप से वे अपने परिवार को ही तबाह कर देते हैं।

आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रति वर्ष दस लाख लोग धूम्रपान से मरते हैं। चिकित्सकों का मानना है कि धूम्रपान के कारण गले और मुंह का कैंसर, ब्रांकाइटिस, हृदय रोग, फेफड़ों का कैंसर आदि बीमारियों की आशंका बहुत हद तक बढ़ जाती है। असल में धूम्रपान शरीर के सारे अंगों पर बुरा असर डालता है। मनुष्य का दिमाग, चेहरा, खून, डीएनए यहां तक कि पूरी बीमारी से लड़ने वाली प्रतिरोध शक्ति ही कमजोर पड़ने लगती है। सिगरेट की तरह शराब का भी भारत में चलन बढ़ा है। कई बार तो जहरीली शराब पीने से लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार पिछले दस साल में जहरीली शराब पीने से 11,032 लोगों की मौत हुई है। शराब के ज्यादा मात्रा में उपयोग करने से हिमोग्लोबिन की कमी, स्नायु तंत्र की खराबी, किडनी-लीवर का कैंसर, एकाग्रता में कमी, दौरे पड़ना, उच्च रक्तचाप आदि बीमारियां हो जाती हैं। एक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि तमाम पियक्कड़ पुरुष पीने के बाद अपने पत्नियों और बच्चों पर हिंसा करते हैं। इस तरह से बहुत सारे घरों में शराब के कारण पूरा का पूरा परिवार तबाह हो जाता है। शराबखोरी मार्ग दुर्घटनाओं की एक बड़ी वजह है।

सवाल यह है कि अगर सरकारें सच में अपने लोगों के स्वास्थ्य के प्रति इतनी चिंतित हैं कि नशाखोरी के विरोध में वे लाखों-करोड़ों रुपए विज्ञापन देने और प्रचार-प्रसार करने और अभियान चलाने पर खर्च करती हैं तो वे इनका उत्पादन या बिक्री ही क्यों अपने राज्य में बंद नहीं कर देतीं?

इससे ज्यादा हास्यास्पद बात और क्या होगी कि सराकर का ही एक अंग नशा बिकवाने मशगूल रहता है और दूसरा रुकवाने में। कुछ लोगों का दावा है कि आबकारी और नशीली वस्तुओं की बिक्री से सरकारों के खजाने में राजस्व आता है। इससे सरकार की खजाना भरता है। लेकिन, असल सवाल तो यही है कि एक तरफ सरकारें खजाना भरती हैं और दूसरी नशा-विरोधी अभियानों में खाली करती हैं। अगर राजस्व-वृद्धि का तर्क मान भी लिया जाए तो दूसरी ओर यह भी देखना चाहिए कि बड़ी संख्या में नशे से जो जनहानि और धनहानि होती है, क्या उसकी भरपाई हो सकती है। सवाल यह भी है कि क्या किसी सरकार को अपने ही राज्य के बाशिंदों की सेहत से खेलने की इजाजत सिर्फ इसलिए मिलनी चाहिए, क्योंकि इससे उसका खजाना भरता है। आखिर, किसी भी राज्य का कोष होता किसलिए है?

नागरिकों की भलाई के लिए या विनाश के लिए। अगर नशाखोरी से राज्य के लोगों का अहित हो रहा है तो ऐसा कमाई किस काम की मानी जाएगी ? भारत में गुजरात में लंबे समय से शराबबंदी है। क्या गुजरात में राजस्व की कमी हो गई है ? सच तो यह है कि गुजरात देश संपन्न राज्यों में है। इस तथ्य के बावजूद कि वहां शराब की बिक्री से राजस्व नहीं जुटाया जाता। हाल में बिहार में नीतीश सरकार ने भी गुजरात से सबक लेते हुए अगले वित्तीय वर्ष से शराबबंदी की घोषणा की है। वह भी तब जब बिहार को गरीब राज्यों में गिना जाता है और विकास कार्यों के लिए उसे राजस्व की सबसे ज्यादा जरूरत है।

असल में, राजस्व जुटाने की दलील ही थोथी है। यह कुलमिलाकर राजनीतिक इच्छाशक्ति का मामला है। तमाम राज्यों में शराब -माफिया पैदा हो गए हैं। इन माफियाओं से राजनेताओं की साठगांठ है। इस इस शराब-लॉबी की वजह से नेताओं की भी पौ-बारह रहती है। लेकिन, सोचनेवाली बात यह है कि अपने ही राज्य के लोगों की जिंदगी और सेहत की तबाही की कीमत पर नशाखोरी का यह चलन कब तक बर्दाश्त किया जा सकता है। जाहिर है यह नेताओं और समाज सुधारकों को सोचना होगा। पंजाब जैसा भरा-भरा राज्य नशेखोरी की वजह से कहां पहुंच गया है ? यह गहरी चिंता का विषय है।

नशे पर पाबंदी को लेकर समय-समय पर अदालतें भी काफी सक्रिय हुई हैं। दो अक्तूबर 2008 को पहली बार सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध लगाया गया। 2004 में स्कूलों से लगभग तीन सौ मीटर के दायरे में तंबाकू और गुटखा आदि की बिक्री और सेवन आदि पर प्रतिबंध लगा। मई 2009 में पहली बार कानून बनाया गया कि तंबाकू किसी भी उत्पाद के पैकेट पर चालीस प्रतिशत हिस्से पर चित्र से बनी चेतावनी दिखाई जाएगी। आज एक सिगरेट के पैकेट के लगभग 60.65 प्रतिशत भाग पर मुंह और गले के कैंसर के चित्र और 15 प्रतिशत जगह पर लिखित चेतावनी दी जाती है। इसके बावजूद आज भारत में पढ़े-लिखे युवाओं में सिगरेट पीने की लत तेजी से बढ़ रही है।

सार्वजनिक जगह पर सिगरेट पीना प्रतिबंधित करने के पीछे भी यही सोच थी कि न पीने वालों को इससे नुकसान नहीं होना चाहिए। लेकिन सवाल तो यह है कि जब सार्वजनिक जगहों पर यह इतना नुकसान पहुंचाती है तो घर के भीतर बच्चों समेत परिवार के अन्य सदस्यों को कितना नुकसान पहुंचता होगा?

फिल्मों में भी सिगरेट पीने को दिखाई जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 76 प्रतिशत फिल्मों में तंबाकू और 72 प्रतिशत फिल्मों में सिगरेट का सेवन धड़ल्ले से दिखाया जाता है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने इस बात पर जोर दिया है कि फिल्मों में नायक-नायिकाओं द्वारा सिरगेट पीते दिखाने से दर्शकों की मानसिकता पर इसका असर पड़ता है। लिहाजा इसे प्रतिबंधित किया जाए। इसी सोच के तहत दो अक्तूबर 2005 को फिल्मों और टीवी में पात्रों द्वारा सिगरेट के सेवन पर प्रतिबंध लगाया गया। लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने फिल्मों में सिगरेट के सेवन के प्रतिबंध को हटा दिया। हाई कोर्ट ने फिल्म में सिगरेट पीने के प्रतिबंध को हटाकर फिल्म के प्रदर्शन से पहले मध्यांतर में और धूम्रपान के दौरान परदे पर वैधानिक चेतावनी के प्रचार-प्रसार को जरूरी कर दिया। नशे की चीजों के पैकेटों पर दी जाने वाली स्वास्थ्य चेतावनी, गले और मुह के कैंसर खौफनाक चित्र और तमाम तरह के विज्ञापन किसी भी नशे को कम करने के लिए रत्ती भर भी भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। देखा यह जा रहा है कि ऐसी कोशिशें हास्यास्पद होकर रह गई हैं। सरकार सच में अगर चाहती है कि लोग सिगरेट-शराब का सेवन करना छोड़ दे तो फिर वह इन चीजों का उत्पादन या बिक्री किसके लिए कर रही है?

जनहित में जारी तमाम विज्ञापन असल में ढोंग बनकर रह गए हैं। कोई भी देश या समाज तभी सुखी रह सकता है, जब उसके नागरिक स्वस्थ हों। जहां देश के युवा वर्ग का बड़ा हिस्सा सिगरेट और शराब की गिरफ्त में हो, वहां कैसे एक स्वस्थ्य, सुदृढ़ और रचनात्मक भविष्य का सपना देखा जा सकता है? यह देश के नेतृत्व की जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने लोगों के सामने स्वस्थ्य विकल्प रखे न कि बीमार बना देने वाले! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर अपने भाषणों में भारत के युवाओं की जिक्र करते रहते हैं । ऐसे में यह सोचना जरूरी है कि क्या हम बीमार और नशे की गिरफ्त में जकड़ी युवा शक्ति के दम पर आगे बढ़ेंगे!

नशे की जद में पंजाब

नशाखोरी किसी समाज को कितनी क्षति पहुंच सकती है, पंजाब इसका जीता जागता उदाहरण है। वहां जो नशा पसरा हुआ है, वह वैसे तो गैरकानूनी है, लेकिन इसमें सरकार की भूमिका इसलिए है कि वह इसे रोकने में नाकाम रही है। महिला और बाल सामाजिक सुरक्षा विभाग के अनुसार पंजाब के 67 प्रतिशत घरों में कम से कम एक व्यक्ति मादक पदार्थों का लती है। समाज का सबसे ऊर्जावान और संभावनाओं से भरा तबका सबसे ज्यादा मादक पदार्थों की चपेट में है। पंजाब में सर्वेक्षण में पाया गया कि 15-25 साल के 75 प्रतिशत युवा मादक पदार्थों का सेवन कर रहे हैं। हर सप्ताह नशीली दवाओं के सेवन से एक व्यक्ति की मौत हो जाती है।

पंजाब की नशाखोरी का खतरनाक पहलू यह है कि वहां प्रतिबंधित मादक द्रव्यों ने युवाओं को अपनी जकड़ में ले रखा है। अफीम, मॉरफीन और हेरोइन जैसी नशीले पदार्थों ने वहां अपना जाल बिछा रखा है। पंजाब में सबसे ज्यादा हेरोइन का इस्तेमाल होता है। पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान से आने वाली हेरोइन असल में पंजाब से सीमावर्ती इलाकों में पहुंचती है। पंजाब के युवाओं की नशे की भूख पर तस्करों की पैनी नजर रहती है। इस कारण पहले वे पंजाब में ही अपना बाजार बनाने की जुगत में रहते हैं और इस काम में सफल भी हो रहे हैं। इस तरह से हेरोइन की तस्करी में लगे लोगों को कम मेहनत में पास में ही बड़ा बाजार मिल जाता है।

दूसरे नशों की तुलना में हेरोइन का नशा जल्दी लोगों को आदी बनाता है। शरीर के हर एक हिस्से पर इसका बुरा असर पड़ता है। पंजाब जैसे खुशहाल और संपन्न प्रदेश के लिए इससे बड़ा अभिशाप क्या होगा कि वहां की युवा आबादी हेरोइन जैसे खतरनाक नशे की जबरदस्त चपेट में है।

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