June 24, 2017

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व्यंग्य : मुलाकात एक आशु कवि से

कुछ देर पहले कवि महोदय पंतजी की प्रसिद्ध पंक्तियां गुनगुना रहे थे। यह रचना उससे उलट लग रही थी। ह्यआप बहुत अच्छी कविताएं लिख लेते हैं।

Author March 19, 2017 06:23 am
प्रतीकात्मक फोटो

प्रतुल जोशी

मैंने अपने को महाकवि के जीवन संघर्षों के साथ पाया। कई बार मुझे भी बहुत से सरकारी गेस्ट हाउस में रुकने का अवसर मिला है। वहां की व्यवस्थाओं के चलते संपूर्ण व्यवस्था के प्रति मेरे भीतर बहुत रोष उत्पन्न हुआ। लेकिन अपने इस रोष को कविता में परिणत करने का खयाल मेरे भीतर कभी नहीं आया। यहीं पर मुझे अपनी हीनता का बोध हुआ और समझ में आया कि किस तरह एक बड़ा कवि छोटे कवियों के मुकाबले बड़ा होता है। लेकिन बड़े कवि के सम्मुख छोटे कवि को बहुत देर तक खयालों की दुनिया में विचरने की आजादी नहीं है। उन्होंने अपने ब्रीफकेस से तुरंत वह रचना निकाली, जिसे आलोचक ह्ययुग बोधह्ण, ह्यभोगा हुआ यथार्थह्ण आदि उपाधियों से विभूषित करते हैं।
ह्यटपक रहा है नल/ जैसे सत्ता का छल-बल/ हाथी दांत से शावर/ भीतर नहीं कोई पावर/ व्यवस्था मे खोट/ बैठाते सब अपनी गोट/ बल्ब अचानक फ्यूज/ करता मुझको कन्फ्यूज/ लड़ना ही होगा/ इस अंधेरे के खिलाफ/ लड़ना ही होगा।

ह्ण महाकवि की कविताएं सुन कर मेरी मुट्ठियां तनने लगी थीं। मेरा मन हुआ कि मैं अभी उठ कर गेस्ट हाउस की सारी खिड़कियां और दरवाजें तोड़ डालूं। उनकी कविता का प्रभाव जबर्दस्त था। लेकिन इस बीच गेस्ट हाउस का वेटर बढ़िया नाश्ते के साथ कमरे में दाखिल हो चुका था। मुझे महाकवि के साथ पूरे पंद्रह दिन बिताने का अवसर प्राप्त हुआ। इस बीच उन्होंने शहर की किसी भी घटना या वस्तु को अपने काव्य का विषय बनाने से नहीं छोड़ा। मेरे अपने शहर में इतनी सारी काव्य प्रेरणाएं उपस्थित हैं, इसका ज्ञान मुझे महाकवि के पदार्पण के बाद ही हुआ था। उनकी कविताओं के शीर्षक थे, ह्यटपकता हुआ नलह्ण, ह्यमहिला ट्रैफिक सिपाहीह्ण, ह्यदीवार पर चढ़ती छिपकलीह्ण, ह्यबिना साइकिल रिक्शों वाला शहरह्ण, ह्यमुझे देख कर वह क्यों मुस्कराईह्ण, ह्यगेस्ट हाउस का बिलह्ण, ह्यचीड़ की फुनगी पर बैठा सूरजह्ण, ह्यअंधेरे में भटकने के खिलाफह्ण, ह्यसुबह देर से अखबार का मिलना ह्ण आदि।
उनके प्रवास के पंद्रह दिन, इस छोटे पहाड़ी शहर के अब तक के इतिहास के गौरवशाली रचनात्मक दिन थे। इन पंद्रह दिनों में पूरा शहर कविता की चपेट में आ चुका था। मेरे अलावा गेस्ट हाउस के वेटर, मैनेजर से लेकर सिक्युरिटी गार्ड, स्थानीय इंटर और डिग्री कॉलेजों के हिंदी के अध्यापक, युवा से लेकर प्रौढ़ावस्था तक पहुंची शहर की कवयत्रियां, बाजार के कोने में वर्षों से जूते बनाने का काम कर रहा मोची, दिलकश पान भंडार का स्वामी रामऔतार, शहर के कई टैक्सी ड्राइवर आदि। जाने से पहले वह शहर में एक लंबे-चौड़े पाठक वर्ग का निर्माण कर चुके थे। उनके जाने के बाद शहर को फिर से एक सन्नाटे ने घेर लिया है। अब पूरे शहर को किसी नए महाकवि का इंतजार है, जो पुराने महाकवि के जाने से रिक्त हुए स्थान को भर सके।

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First Published on March 19, 2017 6:23 am

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