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नन्हीं दुनियााः सच्चा मित्र

नन्हीं दुनियााः सच्चा मित्र
Author September 17, 2017 01:11 am

रैनु सैनी

बहुत पुरानी बात है। सिसली द्वीप के सरोक्यूज नामक नगर में दो गहरे मित्र थे। एक का नाम डामन और दूसरे का पेथियस था। दोनों की मित्रता की मिसाल दूर-दूर तक दी जाती थी। उन दिनों सिसली पर एक अत्यंत कू्रर तथा धूर्त राजा का शासन था। उसका नाम डायनोसस था। क्रूर डायनोसस से पूरी प्रजा घृणा करती थी, लेकिन डर के कारण कुछ नहीं बोलती थी। एक दिन डामन से उसका अत्याचार नहीं देखा गया और उसने उसकी कड़े शब्दों में निंदा कर दी। बस फिर क्या था? डामन को राजद्रोह के अपराध में बंदी बना लिया गया और उसे मृत्युदंड की सजा सुना दी गई। जब यह बात पेथियस को पता चली तो वह दौड़ा-दौड़ा डायनोसस के राजदरबार में गया। उस समय डोमन डायनोसस से बात कर रहा था और कह रहा था, ‘राजन! आपने मुझे मृत्युदंड की सजा दी है। मैं मरने को तैयार हूं, लेकिन मैं आखिरी बार अपनी पत्नी और बच्चों से मिलना चाहता हूं। वे दूर समुद्र पार रहते हैं। कृपया मुझे उनसे मिलने की मोहलत दे दी जाए।

डामन की बात सुन कर क्रूर डायनोसस बोला, ‘यह कभी नहीं हो सकता।’ डामन बोला, ‘महाराज! उन्हें तो यह भी नहीं पता कि मैं किस हाल में हूं। कम से कम अंतिम बार मुझे उनसे मिल लेने दीजिए।’ पर डायनोसस नहीं माना।
आखिर कुछ सोच कर वह बोला, ‘मैं तुम्हें ऐसे जाने की इजाजत तो कभी नहीं दूंगा, लेकिन हां, अगर तुम्हारे वापस आने तक तुम्हारे बदले कोई दूसरा व्यक्ति जेल में रहने को तैयार हो जाए तो मैं तुम्हें पंद्रह दिन की मोहलत दे दूंगा। पर अगर तुम पंद्रह दिन में नहीं लौटे, तो सोलहवें दिन उस व्यक्ति को तुम्हारी जगह मृत्युदंड दे दिया जाएगा।’

तभी डामन का प्रिय मित्र पेथियस वहां उसके सामने प्रकट होकर बोला, ‘राजन मैं अपने मित्र की जगह पंद्रह दिन जेल में बिताने को तैयार हूं। मुझे आपकी शर्त मंजूर है। अगर डामन पंद्रहवें दिन नहीं लौटा तो आप मुझे मृत्युदंड दे दीजिएगा।’
पेथियस की बात सुन कर डायनोसस दंग रह गया। वह सोचने लगा कि क्या दुनिया में ऐसे भी लोग हैं, जो अपने मित्र के लिए इस प्रकार अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार हैं!

डामन की बेड़ियां खोल दी गर्इं और पेथियस को पहना दी गर्इं। पेथियस जेल में मन ही मन यह दुआ करता रहता कि डामन को लौटने में देर हो जाए और उसे मृत्युदंड दे दिया जाए। इससे दुनिया को पता चलेगा कि दोस्ती क्या होती है?
उधर डामन जहाज में यह सोच-सोच कर बेचैन हो रहा था कि अगर मैं समय पर नहीं पहुंच पाया, तो मेरे प्रिय निर्दोष मित्र को फांसी हो जाएगी। मुझे हर हाल में समय से पहले वहां लौटना होगा। लेकिन वही हुआ, जो पेथियस सोच रहा था। हवा विरुद्ध होने के कारण डामन समय पर नहीं लौट पाया।
जब पंद्रह दिन बीत गए तो राजा डायनोसस उसके पास आया और व्यंग्य से बोला, ‘तेरा दोस्त बहुत बड़ा धोखेबाज निकला। तुझे फंसा कर खुद चैन की जिंदगी जी रहा है। अब तुझे उसकी जगह फांसी पर चढ़ना होगा।’ यह बोल कर वह क्रूरता से हंसता हुआ बोला, ‘हा… हा… हा… धोखेबाज डामन।’
अपने मित्र पर लांछन लगते देख पेथियस गुस्से से बोला, ‘मेरा दोस्त धोखेबाज नहीं है। हवा का रुख विरुद्ध और तेज है, इसलिए वह तूफान में फंस गया और समय पर नहीं लौट सका। मेरे दोस्त पर इल्जाम मत लगाओ।’ इतने कठिन क्षणों में भी अपनी जान की परवाह न करते हुए मित्र की परवाह करते देख डायनोसस एक बार फिर हैरान हो गया।

आखिरी वक्त तक इंतजार करने के बाद पेथियस को फांसी के तख्ते की ओर ले जाया जाने लगा। जल्लाद ने फांसी की डोरी तैयार की और उसे पेथियस के मुंह पर कपड़ा चढ़ा कर चढ़ा दिया। जल्लाद रस्सी खींचने जा ही रहा था कि तभी जोर की आवाज सुनाई दी- ‘ठहरो… रुको… रुको… मैं आ गया।’ जल्लाद के हाथ वहीं रुक गए। सब लोगों ने आवाज की दिशा में देखा तो पाया कि डामन धूल-मिट्टी से सना घोड़े पर सवार तेजी से वहां आ गया था। वह उतर कर तुरंत अपने मित्र पेथियस से जा लिपटा और उसके गले से उसने फांसी का फंदा उतार दिया।
इसके बाद वह राजा डायनोसस से बोला, ‘महाराज, मैं आ गया। अब मैं फांसी के तख्ते पर चढ़ने के लिए तैयार हूं।’ डामन को मौत के मुंह में जाते देख पेथियस आंखों में आंसू भर कर बोला, ‘हे ईश्वर, मैं दिन-रात यह कहता था कि मेरा मित्र समय पर न लौट पाए, तूफान में अटक जाए, लेकिन आपने मेरी प्रार्थना नहीं सुनी।’ इस पर डामन बोला, ‘पेथियस ईश्वर ने तुम्हारी प्रार्थना सुन ली थी, लेकिन मुझे अपनी दोस्ती की लाज भी रखनी थी, नहीं तो आज के बाद दुनिया में कोई किसी को सच्चा मित्र न बनाता।’

उन दोनों की बातें सुन कर और गहरी सच्ची मित्रता देख कर डायनोसस की भी आंखें खुल गर्इं। उसे अपने दुर्व्यवहार पर बहुत पछतावा हुआ। इसके बाद वह फांसी के तख्ते तक स्वयं उठ कर आया और डामन का हाथ पकड़ कर उसे पेथियस के पास ले जाकर बोला, ‘तुम दोनों दोस्तों की सच्ची दोस्ती की मिसाल आज के बाद विश्व के कोने-कोने में दी जाती रहेगी। आज तुमने मुझे भी बदल दिया है।’
इसके बाद राजा डायनोसस बिल्कुल बदल गया। वह अपनी प्रजा का ध्यान रखने लगा।
आज भी डामन और पेथियस की सच्ची मित्रता लोगों को मित्रता का पाठ पढ़ाती है।

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