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सिनेमाः साहित्य, सिनेमा और बाजार

साहित्य से संबंध स्थापित करके फिल्मों ने अपने संवाद और कहन की शैली को परिमार्जित किया, जबकि फिल्मों ने साहित्य के आर्थिक पक्ष को मजबूत बनाया। इस मायने में दोनों एक-दूसरे के पूरक बन गए। पर आज जबकि बाजार और मुनाफा ही प्राथमिकता और जरूरत है, क्या यह रिश्ता इतना सरल और संजीदा है।
Author December 4, 2016 00:39 am
प्रतीकात्मक चित्र

पूजा खिल्लन

कला का संबंध व्यक्ति की रुचि से है। कलाकार अपनी कला का चुनाव दूसरों के कहने पर नहीं, बल्कि अपनी पसंद से करता है। कला शब्द अगर किसी ऐसी विधा से जुड़ जाए, जिसे पहले कला न माना गया हो, तो वह उसे समाज में एक रुतबा या इज्जत दिलाता है। जो विधा कला की श्रेणी में आ जाती है उसका संस्कार बदल जाता है। साहित्य, संगीत, नृत्य, नाटक आदि कलाओं से रहित मनुष्य को पूंछ रहित साक्षात पशु माना गया है। जहां तक एक कला का दूसरी कला से संबंध का प्रश्न है तो वह वर्ग, जाति, वर्ण, धर्म, ऊंच-नीच से परे ले जाता है। संसार की सभी कलाओं में आपस में संवाद है। और यह संवाद मनुष्यों को रोमांचित और स्तब्ध करता आया है, मनुष्यों के बीच जो संभव नहीं है कला उस असंभव के परे निकल जाती है।
अगर साहित्य और सिनेमा के संदर्भ में देखें, तो संस्कार का यह परिवर्तन जो एक-दूसरे के संपर्क से होता है बड़े पैमाने पर और स्पष्ट तौर पर सामने आता है। चूंकि यहां संपर्क तो होता है, पर माध्यम भी बदल जाता है, यह चित्रकला, संगीत या फिर नृत्य की साहित्य में या दूसरी कलाओं में आवाजाही जैसा नहीं है। साहित्य हमें भीतर के मर्म को उद्घाटित करने की छूट देता है और रचनाकार अपनी रचना में मुक्त होता है। इसलिए यह खुद पर रीझे बगैर स्वयं को साधने की कला है, जबकि फिल्म मीडिया, विज्ञापन आदि स्वयं पर रीझ कर दूसरों को रिझाने का पाठ सिखाते हैं। ये बाजार से जुड़े हैं। साहित्य भी आज बाजार से जुड़ गया है, लेकिन इस संदर्भ में उसका पहला तजरुबा बाजार नहीं, बल्कि फिल्म ही है। तभी फिल्मों में साहित्य के आने पर खूब हंगामा बरपा। यह स्वयं साहित्यकारों ने भी किया और साहित्य प्रेमियों ने भी।

खैर, फिल्म में अभिनय और साहित्य में शब्द महत्त्वपूर्ण हैं। जिस तरह शब्द या वाक्य कविता या कहानी को वह आधार देते हैं, जिससे उनका कवितापन या कहानीपन लेखक की कलम से साकार होता है उसी तरह अभिनय द्वारा फिल्म का फिल्मीपन साकार होता है। वैसे पटकथा का आधार यहां भी शब्द ही है, इसलिए साहित्य से फिल्म का रिश्ता यों भी है। मगर हिंदी फिल्मों में जिन्हें मुख्यधारा का सिनेमा या मेनस्ट्रीम कहा गया, उनमें एक ही तरह के अभिनय की भरमार है, जिसे मेलोड्रामाई शैली के नाम से अभिहित किया गया है और आलोचक इसे पारसी रंगमंच का प्रभाव बताते हैं। पर प्रेमचंद, शैलेंद्र, भीष्म साहनी, मोहन राकेश, रेणु आदि रचनाकार, जिनका संबंध फिल्म से जोड़ा जाता है यह तब की बात है जब इप्टा (1943) की स्थापना हो चुकी थी और फिल्मों में नई सोच को तरजीह दी जाने लगी थी। यह नई सोच उस मेलोड्रामाई शैली से हट कर भारतीय फिल्म को उसके यथार्थ से जोड़ कर देखने की थी। यह स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उद्योगीकरण के कारण देश में आए अवश्यंभावी परिवर्तन या बदलाव के कारण बन रहा था।

यह आम आदमी का यथार्थ था, जो उसके सपनों और आकांक्षाओं से जुड़ा था और सरकार, व्यवस्था और स्वयं इसके भुक्तभोगी समाज को सोचने पर विवश करता था। यह मेनस्ट्रीम सिनेमा द्वारा परोसे जा रहे यूरोपीय यथार्थ या फार्मूलाबद्धता के विरुद्ध एक प्रतिपक्ष तैयार कर रहा था। समांतर सिनेमा, जो एक क्षेत्रीय आंदोलन की तरह बंगाल से उठा था, ने इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। सत्यजित राय की फिल्में ‘घरे-बाइरे’, ‘पथेर पंचाली’, ‘अप्पू’ आदि ने कला को चरम पर पहुंचा दिया। ये फिल्में क्षेत्रीय थीं, पर इन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली। ये फिल्में सत्तर के दशक की हैं, जब मुख्यधारा और समांतर के बीच बंटवारा हो चुका था, पर प्रयास उससे पहले भी हुए। इप्टा द्वारा 1943 में निर्मित ‘धरती के लाल’ इसका उदाहरण है। फिल्म और साहित्य के रिश्ते पर लौटें तो पाएंगे कि फिल्मों में भी जहां-जहां साहित्य को फिल्मों ने केवल मुनाफे के लिए, बल्कि उसके वास्तविक उद्देश्य की परख करके अपनाया है, वहां फिल्म और साहित्य दोनों का भला हुआ है, पर जहां उसने इस उद्देश्य को पीछे केवल बाजार की वस्तु बन जाने पर बल दिया है, वहां वह पिछड़ गया है।

साहित्य से संबंध स्थापित करके फिल्मों ने अपने संवाद और कहन की शैली को परिमार्जित किया, जबकि फिल्मों ने साहित्य के आर्थिक पक्ष को मजबूत बनाया। इस मायने में दोनों एक-दूसरे के पूरक बन गए। पर आज जबकि बाजार और मुनाफा ही प्राथमिकता और जरूरत है, क्या यह रिश्ता इतना सरल और संजीदा है। शायद इस प्रश्न का उत्तर आसान नहीं है, मगर इससे उलझे बगैर भी तो बात नहीं बनती। चूंकि साहित्य तभी साहित्य है, जब उसे पढ़ने वाला कोई हो। यही बात फिल्म और अन्य चाक्षुष कलाओं के संदर्भ में भी है। स्पष्ट तौर पर बाजार के संदर्भ में इसका मतलब टीआरपी से है, पर साहित्य आदि कलाओं का रसास्वादन पाठक तभी कर सकता है जब वह सहृदय हो। फिल्मों में भी जो लोग कला और कहानी की तलाश करते हैं उनके लिए वह तब तक बेमानी है जब तक उनमें वैसी कोई बात न हो।

ऐसे में सारी बात आकर पाठक या फिर दर्शक पर घूम जाती है। चूंकि जब अश्लील साहित्य या फिल्में परोसी जाती हैं, तो यही तर्क दिया जाता है कि दर्शक या श्रोता यही चाहता है। कोई बाद में यह नहीं कहता कि उसमें मुनाफा अधिक था इसलिए अश्लीलता से बचने का मार्ग उसके पक्ष में तर्क गढ़ने वालों से नहीं, बल्कि उनसे निकलेगा, जिन्हें अश्लीलता परोसी जा रही है। जनता सिर पर बिठाना जानती है, तो औंधे मुंह गिराना भी जानती है। मगर यह मार्ग जितना सरल दिखता है उतना है नहीं। चूंकि जनता को तर्क में उलझा कर आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है। सबसे आसान है वाग्जाल रचना, पर विचार में अगर तर्क रहता है तो तथ्य भी रहता है और तर्क भी तो तथ्य पर ही आश्रित है। इसलिए बाजार को अगर अपनी लाठी से हांकना है यानी बाजार को बाजार के खिलाफ देखना है, तो जानकारियों और तथ्यों के उपलब्ध समूह में से सही को चुनना होगा। जिसकी आजादी बाजार शायद कभी न दे। ०

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