June 25, 2017

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आधी आबादी- कार्यबल में महिलाओं की कमीं

भारत में 2005 के बाद से श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी घटती जा रही है। यह वाकई विचारणीय है, क्योंकि महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित किए बगैर देश में विकास प्रक्रिया को गति देना मुश्किल है।

प्रतीकात्मक चित्र।

हाल ही में आए स्कूली और प्रतियोगिता परीक्षा परिणामों में लड़कियों ने फिर बाजी मारी है, पर इन्हीं दिनों आई विश्व बैंक की इंडिया डेवलेपमेंट रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी के मोर्चे पर भारत आज भी बहुत पीछे है। एक सौ इकतीस देशों की इस सूची में हमारा देश एक सौ बीसवें स्थान पर है। विश्व बैंक की यह रिपोर्ट बताती है कि मौजूदा वित्तवर्ष में हमारे देश की आर्थिक वृद्धि दर 7.2 फीसद रह सकती है। ऐसे में कार्यबल में आधी आबादी की भागीदारी बढ़ाई जाए, तो इस दर में और इजाफा हो सकता है। अनुमान है कि कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ने पर यह वृद्धि दर दहाई के अंक तक जा सकती है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में 2005 के बाद से श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी घटती जा रही है। यह वाकई विचारणीय है, क्योंकि महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित किए बगैर देश में विकास प्रक्रिया को गति देना मुश्किल है।  दरअसल, महिलाएं हमारे समाज का वह बड़ा वर्ग हैं, जो क्षमता और योग्यता तो रखती हैं, पर कई कारणों से पीछे छूट रही हैं। नौकरी में लैंगिक भेदभाव, पारिवारिक जिम्मेदारियां, कार्यस्थल पर असुरक्षा और वरीयता पाने में भी मिलने वाला दोयम दर्जा, कुछ ऐसे कारण हैं, जो कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी उस गति से नहीं बढ़ने दे रहे, जितनी तेजी से लड़कियों की शिक्षा का आंकड़ा बढ़ा है।

विचारणीय है कि बीते कुछ बरसों में महिला साक्षरता के आंकड़े ही नहीं बदले हैं, उच्च शिक्षा में भी स्त्रियों का ग्राफ चढ़ा है, जिसके चलते कुछ हद तक शिक्षित और आत्मनिर्भर महिलाओं के बढ़ते आंकड़ों ने देश की अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका और भागीदारी सुनिश्चित की है। मगर ये आंकड़े संतोषजनक नहीं कहे जा सकते। एक समय था जब लैंगिक पूर्वाग्रहों के चलते बेटियों की शिक्षा में निवेश नहीं किया जाता था। उनके करिअर को लेकर भी अभिभावकों में इतनी सजगता और जागरूकता नहीं थी। लेकिन अब हालात काफी हद तक बदल गए हैं। 2011 की जनगणना के ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2001 से 2011 के दौरान देश में महिलाओं की शिक्षा का स्तर एक सौ सोलह फीसद बढ़ा है, जो कि एक बड़े बदलाव को रेखांकित करता है। तकनीकी शिक्षा में भी महिलाओं का दखल बढ़ा है। वर्तमान में उच्च शिक्षित हो या अशिक्षित, महानगरों से लेकर गावों तक परिवार का दायित्व संभालने के साथ-साथ अधिकतर महिलाएं अर्थोपार्जन के लिए काम भी कर रही हैं। जहां एक ओर शिक्षित महिलाओं की बड़ी संख्या कॉल सेंटर, आतिथ्य सत्कार क्षेत्र, नागरिक उड्डयन, चिकित्सा सेवा, वस्त्र उद्योग और मीडिया क्षेत्र में काम कर रही हैं, वहीं कम पढ़ी-लिखी और अशिक्षित महिलाओं का बड़ा प्रतिशत कल-कारखानों में कार्यरत है।
आज भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसमें आधी आबादी की भागीदारी की उपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐसे में यह सोचने वाली बात है कि लड़कियों के कामकाजी होने के मोर्चे पर हम पीछे क्यों हैं?

दरअसल, इन आंकड़ों की कमी के पीछे जो कारण हैं, उनमें महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी चिंता सबसे अहम है। आज हमारे परिवेश में जो हालात हैं, उनमें दफ्तर हो या यातायात के साधन, महिलाएं दिन में भी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं। महिलाएं दिन हो या रात सार्वजनिक स्थल पर असुरक्षा और भय से घिरी रहती हैं। हाल ही में वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (एसोचैम) के सामाजिक विकास संस्थान की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली में हर चालीस मिनट में एक महिला का अपहरण और बलात्कार होता है। इसके अलावा शहर की सड़कों पर हर घंटे एक महिला शारीरिक शोषण की शिकार होती है और हर पच्चीस मिनट में छेड़छाड़ की घटना होती है। महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े एसोचैम के इसी सर्वेक्षण में दिल्ली, एनसीआर, मुंबई, कोलकाता, बंगलुरू, हैदराबाद, अमदाबाद, पुणे और देहरादून सहित कई शहरों को शामिल किया गया, जिसमें शत प्रतिशत महिलाओं ने माना कि उनकी सुरक्षा की समस्या देश की किसी भी समस्या से ज्यादा बड़ी है। यही कारण है कि असुरक्षित परिस्थितियों वाले माहौल में महिलाओं को कभी परिजन काम करने से रोकते हैं, तो कभी वे स्वयं नौकरी छोड़ देती हैं। असुरक्षा के साथ ही कई सामाजिक-पारिवारिक कारण भी कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी कम करने के लिए जिम्मेदार हैं। भले हमारे यहां बेटियों की शिक्षा के प्रति सोच बदल रही है, पर सामाजिक सोच में बड़ा बदलाव नहीं आया है। आज भी शादी कर परिवार बसाने को करिअर से पहले माना जाता है। ऐसे में कई बार आगे चल कर महिलाओं को पारिवारिक सहयोग नहीं मिल पाता और वे घर तक ही सिमट जाती हैं।

किसी भी देश में कामकाजी महिलाओं की बढ़ती संख्या कई मायनों में बदलाव की द्योतक होती है। लेकिन आज भी विकसित देशों की तरह भारत की श्रमशक्ति में आधी आबादी की भागीदारी अनिवार्य नहीं है। ऐसे कई सामाजिक, पारिवारिक और परिवेशगत कारक हैं, जो तय करते हैं कि काबिल और क्षमतावान महिला भी कार्यबल का हिस्सा बन पाएगी या नहीं। आज भी असुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं का अभाव एक बड़ा कारण है, जिसके चलते महिलाएं नौकरी नहीं कर पातीं। हालांकि मौजूदा दौर में हर तरह के व्यावसायिक संगठन स्त्री श्रमशक्ति के मायने समझ रहे हैं। इस बात की स्वीकार्यता भी बढ़ी है कि महिलाएं न केवल कई काम एक साथ करने में माहिर होती हैं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी को पूरी तन्मयता से निभाती हैं। लेकिन यह भी सच है कि कई मामलों आज भी उन्हें दोयम दर्जे पर ही रखा जाता है।  देश के सर्वांगीण विकास के लिए श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ना जरूरी है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि उन्हें हर क्षेत्र में सुरक्षा और सम्मान के साथ काम करने का अवसर मिले। यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए तो लाभदायक है ही, इससे महिलाएं भी आत्मनिर्भर और सशक्त बन सकेंगीं। देश की स्त्रियों का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना यकीनन महिला सशक्तीकरण का पहला कदम है। यह सब तभी संभव है जब बड़े संस्थानों और कंपनियों में महिलाओं की सहूलियत के अनुसार उन्हें माहौल दिया जाय।  आर्थिक विशेषज्ञ भी मानते हैं कि आज हर मोर्चे पर महिला कार्यबल की न केवल दरकार है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को संबल देने में भी उनकी प्रभावी भूमिका हो सकती है। महिलाओं को अधिकार संपन्न और सशक्त बनाने के लिए उनकी सुरक्षा बहुत आवश्यक है। यह तभी हो सकता है जब सही मायने में देश की आधी आबादी को अस्मिता और सम्मान के साथ काम करने का अवसर और सुरक्षा मिले। ०

 

 

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First Published on June 18, 2017 3:44 am

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