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नाज खान का लेख : खेलकूद की जगह

महानगरों में जैसे-जैसे सुख-सुविधाएं बढ़ी हैं वैसे-वैसे बच्चों के लिए खेलकूद के रकबे घटते चले गए। बनिस्बतन गांवों में आज भी भागने-दौड़ने और सुकून के दो पल गुजारने की गुंजाइश ज्यादा है। शहरों की भीड़भाड़ और संकरी जगहों ने सबसे ज्यादा नुकसान बच्चों का किया है। बच्चों की दिनचर्या कॉपी-किताबों या कंप्यूटर और वीडियो गेमों तक सिमटती जा रही है। बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास ऐसे में हो तो कैसे ?
Author नई दिल्ली | June 5, 2016 06:30 am
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बड़ी-बड़ी इमारतें, गाड़ियों की आवाजें और तेज कदमों की चहलकदमी शहरों की भागम-भाग भरी जिंदगी दिखाती हैं। ऐसे में बचपन की वे मीठी शरारतें और खेल अपार्टमेंटों और कॉलोनियों में शायद ही सुनाई पड़ते हों। करीब दो दशक में शहरीकरण और आधुनिकता ने भले ही सपने दिखाए, रोजगार दिए और वे सब सहूलियतें दीं, जिनकी ख्वाहिश आमतौर पर इंसान को होती है। मगर इसके एवज में वह मासूमियत और बचपन भी छीन लिया जो बच्चों की मानसिक जरूरत भी है और शारीरिक भी। शहरी मोहल्लों में वैसे मैदान नहीं रहे जहां बच्चों वाले खेल खेले जा सकें। न ही आम के वे बगीचे जिनके आम तोड़ने की कोशिशें बच्चे कभी पत्थर मार कर तो कभी एक-दूसरे पर चढ़कर करते थे। मासूम शरारतों से भरा वह बचपन जो खुले दिल से जीने और बहुत कुछ करने की आजादी देता था, शहरों से नदारद है। इसकी बजाय तकनीकी तौर पर सक्षम खिलौनों, कंप्यूटर, टैबलेट, वीडियो गेम को थमा कर मासूमों का बचपन बहलाया जा रहा है।

सवाल यह है कि किसी बंद कमरे में तन्हा खेलकर क्या वाकई बचपन की जरूरत पूरी होती है? इसका जवाब हां में दिया जाए या न में क्या फर्क पड़ता है, क्योंकि यह शहरी परिवेश की जरूरत बन गया है और मजबूरी भी। बच्चों के शारीरिक विकास को लेकर शहर में न माहौल है, न चिंता। माता-पिता का सारा जोर बच्चों की पढ़ाई के प्रति रहता है, न कि शारीरिक स्वास्थ्य पर।

ऐसे में खास बनने की दौड़ में खास गेम खेलते हुए बच्चे बड़े तो हो रहे हैं लेकिन इस बीच उनका बचपन तकनीकी यंत्रों में उलझ कर रह गया है, जहां दिमागी कसरत हावी है। एक गीत जो आज भी कभी-कभार सुनाई दे जाता है, ‘बचपन बचपन प्यारे प्यारे बचपन ओ लल्ला यह बतला कहां गया तू छोड़ के’, बचपन को ढूंढ़ती जवानी का यह गीत उस बचपन की याद दिलाता है जो शरारती था, जिसमें भाग-दौड़ थी और बहुत कुछ ऐसा भी था जो परिवारों को समाज को एक-दूसरे से जोड़े रखता था। संयुक्त परिवार थे, एकाकीपन नहीं था। मगर शहरी जीवन ने न सिर्फ संयुक्त परिवारों का बिखराव किया बल्कि एकाकीपन के उस जीवन को भी रच दिया जहां बच्चों का जीवन क्लास, ट्यूशन, स्पेशल क्लासेज और होमवर्क में उलझ कर रह गया। ऐसे में वक्त की कमी हुई और दोस्त और खेल भी एक सीमित वक्त के साथी बन कर रह गए।

बच्चे या तो बुद्धू बॉक्स के शिनचैन, नोबिता जैसे कार्टूनों में मनोरंजन तलाशने लगे या फिर कंप्यूटर, टैबलैट, मोबाइल या फिर वीडियो गेम में दिमाग खपाने लगे। अकेले ही खेलने के इस चलन ने बच्चों में एकाकीपन को जन्म दिया और उन्होंने कल्पनाओं की अलग ही दुनिया गढ़ ली। इस तरह गेम से भले ही मानसिक विकास हुआ हो मगर शारीरिक विकास कहीं दब कर रह जाता है। आज पहले की तरह वह कॉमिक्स, कहानियां या दादी-दादा, नानी-नाना आदि की वह लोककथाएं भी नहीं रहीं जो मानसिक विकास तो करती ही थीं साथ ही एक जिज्ञासा को भी जन्म देती थीं। मगर आज के तकनीक पर आधारित यह हिंसात्मक खेल-कार्टून जहां शिनचैन को अपने माता-पिता से मुंहजोरी करते हुए दिखाया जाता है।

इससे बदले की भावना को बल मिलता है और जो प्रवृत्ति जन्म ले रही है वही बच्चों को हिंसक बना रही है। वहीं बच्चों पर ज्यादा अंक लाने का अतिरिक्त दबाव उनके दिमागी संतुलन को बिगाड़ रहा है। बच्चे न सिर्फ हिंसक हो रहे हैं बल्कि ज्यादा अंक न लाने की वजह से आत्महत्या जैसे गंभीर कदम भी उठा रहे हैं। यहां यह सवाल उठाना लाजिमी है कि शहरी परिवेश में पले बच्चों में ही क्यों जीवन समाप्त करने की भावना घर कर रही है। शायद ही कभी सुना हो कि गांव में रहने वाले साधन विहीन बच्चे जो आधुनिक शिक्षा से वंचित हैं, उन्होंने कम अंक पाने के कारण आत्महत्या कर ली हो। जबकि साधन संपन्न बच्चों की तुलना में ऐसे बच्चों का जीवन संकटों से ग्रस्त रहता है।

इसका कारण यही है कि इनके गरीब, अशिक्षित मां-बाप इन्हें शिक्षा तो देते हैं पर थोपते नहीं। इन बच्चों पर ज्यादा अंक लाने का न तो दबाव होता है और न ही उनका बचपन तकनीकी खिलौनों में व्यतीत हुआ होता है। खुले माहौल में बच्चे खेलते, सीखते और मानसिक तौर पर मजबूत बनते हैं। देहाती और खुले इलाकों में आज भी इतनी तरह के खेल खेले जाते हैं कि उनसे भरपूर शारीरिक और मानसिक कसरत होती है। जलेबी रेस, सुतोलिया, चम्मच रेस, लंगड़ी टांग, लट्टू कंचे, रस्सी कूदना, तीन टांग की रेस, मटका रेस, कबड्डी, खो-खो, छुप्पन छुपैया ऐसे खेल हैं जो बच्चों में निर्णय लेने, सोचने-समझने और शारीरिक तौर पर उन्हें सक्षम बनाने का काम भी करते हैं। मगर शहरों में बच्चे वर्चुअल गेम जैसे सॉलिटेयर, हार्ट, कैंडी क्रश सागा, टेंपल रन, रोड फाइटर, गैलेक्सी, ऐज आॅफ एंपायर्स और एंग्री बडर््स गेम बच्चों से लेकर युवाओं तक की पसंद बन चुके हैं। इन्हें खेलने के लिए किसी साथी की जरूरत नहीं होती।

कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट और मोबाइल फोन पर इन्हें अकेले खेला जा सकता है। हालांकि इस तरह के गेम खेलने की एक वजह वक्त और जगह की कमी भी है। इस तरह के आॅनलाइन गेम दिमाग पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं, हिंसात्मक होते हैं। अकेले खेलते समय बच्चे जीत-हार के पलों में स्वाभाविक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर पाते, इससे उनमें खेल भावना और सहनशीलता का अभाव हो जाता है। अपने मन-मुताबिक वे कुछ न होने पर बहुत जल्दी उत्तेजित, उद्वेलित हो जाते हैं। अपने इर्द-गिर्द एक ख्याली दुनिया बनाना शुरू कर देते हैं। धीरे-धीरे वे इसके आदी हो जाते हैं और उनमें एकाकीपन की भावना घर कर जाती है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं, जो बच्चे अपने बचपन में भरपूर खेल नहीं पाए, उन्हें बढ़ती उम्र में मानसिक और शारीरिक समस्याओं से जूझना पड़ सकता है।

पहले शहरों में पल रहे बच्चों की स्कूली छुट्टियां नाना, दादा आदि के घर बीता करती थीं और इस तरह उन्हें परिवार का साथ व खुले माहौल में खेलने का मौका मिल जाता था, लेकिन आज स्कूलों की छुट्टियां होने पर भी समर कैंप के नाम से म्यूजिक क्लास, पर्सनैलिटी डिवेलपमेंट, एक्टिंग क्लास, टैटू क्लास, जिम, स्विमिंग, जूडो क्लास, ब्यूटीशियन कोर्स जैसी कई बंदिशें बच्चों पर थोपी जा रही हैं। पढ़ाई के दौरान तो ऊंचे ग्रेड लाने की रेस बच्चों के बीच चलती ही है, परीक्षा के बाद भी यह सिलसिला जारी रहता है।

पहले खेलों के अलावा बाइस्कोप और कठपुतली के करतब जैसे अन्य मनोरंजन भी बच्चों के लिए होते थे। आज बच्चे विडियो गेम, टीवी या कंप्यूटर से चिपके रहते हैं। कई-कई घंटे इस तरह के गेम शारीरिक तौर पर नुकसान पहुंचाते हैं और इन यंत्रों की चमक आंखों को कमजोर करती है। आज बच्चों का जीवन प्रभावित हुआ है, इसके लिए आधुनिक शिक्षा का वह ढांचा भी कम जिम्मेदार नहीं है जहां दो-ढाई साल की उम्र से ही बच्चों पर किताबों का बोझ लाद दिया जाता है। पहले बच्चे एक खास उम्र के बाद दुनिया-जहां की खबर जानना शुरू करते थे और पांच साल की उम्र में उनको बस्ता थमाया जाता था। अब ढाई साल का शिशु बस्ता उठाए नर्सरी में पहुंच जाता है और एबीसी रटने की मानसिक कवायद शुरू कर देता है। सवाल इसके अच्छे या बुरा होने का नहीं है। दरअसल, खासकर शहरी परिवेश में यह अनिवार्य हो गया है और इसमें बच्चों की अपनी रजामंदी का कोई महत्त्व नहीं है।

शहरी सपनों और हसरतों ने कामयाबी देने के बदले वह हसीन बचपन बिसरा दिया है जो दादी, नानी की गोद में लेट कर शूरवीर राजकुमारों, राक्षसों की कहानियां सुनते-सुनाते बीतता था। तब आसमान में चमकती बिजली, बादलों की गरज और पानी के बरसने का कारण बच्चे बुजुर्गों की लोककथाओं से जान पाते थे। मगर आज बच्चे हर सवाल का जवाब गूगल पर तलाशते हैं। संयुक्त परिवारों के टूटने से भी यह हालात पैदा हुए और कुछ शहरों के रहन-सहन ने भी बचपन के साथ-साथ दादी-नानी की कहानियों को भी बचपन से छीन लिया।

छुटपन के मुन्ना, गुड़िया अब रिंकी, चिंकी हो गए और नन्ही-नन्ही मीठी गोलियों की जगह चॉकलेट ने ले ली। बचपन के वे खेल और आवाजें अब कहां सुनाई देती हैं जो शरारतों से घर और माहौल भर देती थीं। कोड़ा जमालशाही, पीछे देखो मार खाई, हरा समंदर गोपी चंदर, बोल मेरी मछली कितना पानी, जैसे बच्चों के कितने ही अंतरे फजाओं में गूंजा करते थे तो अपना भी बचपन याद आ जाता था।

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