January 19, 2017

ताज़ा खबर

 

अपना अंदाज अपनी पहचान

भारत जैसा परंपरागत देश आज लिंग परिवर्तन के चिकित्सा बाजार के तौर पर उभर रहा है। बड़ी संख्या में युवा अपने लिंग की पहचान को मन मुताबिक बदल रहे हैं। इस बारे में जायजा ले रही हैं नाज़ ख़ान।

Author October 8, 2016 22:47 pm
ट्रांसजेंडर वह व्यक्ति होता है जो जन्म के समय कुछ और था और बड़ा होने पर खुद को अपने लिंग के विपरीत महसूस करने लगता है।

उच्चतम न्यायालय ने ट्रांसजेंडरों को थर्ड जेंडर के तौर पर मान्यता दे दी है। साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि थर्ड जेंडर को शैक्षिक संस्थानों में दाखिले और सार्वजनिक नियुक्तियों में आरक्षण उपलब्ध कराने के लिए उनको सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ी श्रेणियों के रूप में मानें। दरअसल, ट्रांसजेंडर वह व्यक्ति होता है जो जन्म के समय कुछ और था और बड़ा होने पर खुद को अपने लिंग के विपरीत महसूस करने लगता है। जो ट्रांसजेंडर अपने शरीर में दवाओं और सर्जरी के जरिए हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी, सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी से बदलाव करवाते हैं उन्हें ट्रांससेक्सुअल कहा जाता है। इससे पहले 2012 में मुंबई हाईकोर्ट में दायर की गई विधान बरुआ की एक याचिका के जवाब में मुंबई हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि, ‘लिंग परिवर्तन से रोकने के लिए कोई कानून नहीं बना है। कोई भी अपना लिंग परिवर्तन करा सकता है।’

इसके बाद से ही भारत में लिंग परिवर्तन को एक तरह की सामाजिक मान्यता मिल गई। यह याचिका इक्कीस वर्षीय युवक विधान बरुआ ने दायर की थी और कहा था कि वह बालिग है और अपने फैसले खुद ले सकता है, इसलिए उसे लिंग परिवर्तन का अधिकार है। आज हालात यह है कि साल में करीब चार-छह लिंग परिवर्तन के मामले चिकित्सकों के सामने आ रहे हैं। भारत में शुरुआत में लिंग परिवर्तन कराने वालों में मफतलाल समूह के उद्योगपति अजय मफतलाल का नाम भी शामिल है। वह भारत के पहले लिंग परिवर्तन कराने वाले व्यक्तियों में से एक थे। बीते साल उनका निधन हो गया। 2003 से पहले वह अपर्णा मफतलाल थे और उनका विवाह भी हुआ था जो असफल रहा। बाद में छियालीस वर्ष की आयु में उन्होंने लिंग परिवर्तन करा लिया था। उनका कहना था कि वह एक पुरुष की तरह रहना चाहते थे इसलिए उन्होंने लिंग परिवर्तन का विकल्प चुना। हालांकि, लिंग परिवर्तन कराने की शुरुआत 1930 के दशक में बर्लिन से हुई थी।

तब पहली बार लिली एल्बे का लिंग परिवर्तन आॅपरेशन नाकाम रहा था और उनकी मृत्यु हो गई थी, लेकिन 1950 में एक बार फिर लिंग परिवर्तन का आॅपरेशन किया गया और यह सफल रहा था। इसे न्यूयार्क के एक युवक जॉर्ज योर्गेसन ने कराया था। दरअसल, योर्गेसन को बचपन से ही अपने शरीर में एक महिला होने का आभास होता था। मगर जब भी वह अपनी बात किसी के सामने रखते तो या तो उन्हें पागल समझ कर नजरअंदाज कर दिया जाता या फिर उनकी इन बातों को समाज विरोधी बता कर चुप करा दिया जाता था। हालांकि, उन्होंने करीब सत्ताईस वर्ष की आयु में अपने अंदर की स्त्री को बाहर लाने में सफलता हासिल की और 1950 में लिंग परिवर्तन का सफल आॅपरेशन कराकर योर्गेंसन से क्रिस्टीन बन गए। अपने लिंग परिवर्तन के बाद उन्होंने अपने माता-पिता को लिखे एक खत में कहा था, ‘कुदरत की गलती को मैंने सुधार दिया है और अब मैं आपकी बेटी हूं।’ इसके बाद हॉलीवुड से भी उन्हें नाटकों और फिल्मों के प्रस्ताव मिलने लगे। हालांकि, सामाजिक तौर पर देखें तो योर्गेंसन से क्रिस्टीना बनने के बाद वह कभी वैवाहिक जीवन नहीं जी सके।

पहली बार उनकी रिश्ता विवाह से पहले ही टूट गया और दूसरी बार उन्हें शादी की अनुमति दस्तावेजों में पुरुष दर्ज होने के आधार पर नहीं मिली। बासठ वर्ष की उम्र में 1989 में उनकी मृत्यु हो गई, जहां तक भारत जैसे परंपरागत देश की बात है तो आज हर साल दो सौ के करीब लिंग परिवर्तन आॅपरेशन किए जा रहे हैं। दरअसल, इस विकल्प को चुनने के पीछे कई कारण भी हैं। एक तो चिकित्सा पद्धति ने युवाओं को अपने मन के मुताबिक लिंग चुनने और जीवन जीने की आजादी दी है। वहीं कुछ लोग समाज से बहिष्कृत होकर इसलिए भी लिंग परिवर्तन करा रहे हैं ताकि उनकी अपनी एक पहचान बने और वह इसके सहारे समाज में सम्मान का जीवन जी पाएं। सफलता हासिल कर सकें। इस दिशा में बदलाव भी आ रहे हैं। हालात यह है कि आज यूरोपीय देश ही नहीं बल्कि भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश जैसे परंपरागत देशों में भी लिंग परिवर्तन कराने वालें लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

आंकड़ों के मुताबिक अकेले भारत में लिंग परिवर्तन कराने का बाजार करीब तीन अरब डॉलर है। तेजी से बढ़ते इस बाजार को देखते हुए 2020 तक इसके दोगुना होने की संभावना जताई जा रही है। इसकी एक वजह सरकार की साल भर का वीजा जारी करने वाली योजनाएं भी हैं। ऐसे में विदेशी अपनी सहूलियत के मुताबिक भारत आकर अपनी सर्जरी करा सकते हैं। भारत जैसे विकासशील देश में इस बाजार के बढ़ने का कारण यह भी है कि यूरोपीय देशों की तुलना में यहां सर्जरी कराना सस्ता है बल्कि यहां इस तरह के लोगों के लिए कोई प्रतीक्षा सूची जैसी समस्या भी नहीं है। हाल में, अमेरिकी पूर्व सैनिक डेल आर्चर ने चौसठ वर्ष की उम्र में दिल्ली में लिंग परिवर्तन सर्जरी कराई। इस तरह की ज्यादातर सर्जरी दिल्ली और मुंबई में की जा रही है। हालांकि, अभी तक इसके लिए थाइलैंड लोगों का मनपसंद देश रहा है। मगर क्योंकि वहां रहना महंगा है इसलिए भारत एक बेहतर विकल्प के तौर पर उभरा है। इसके अलावा इस तरह की सर्जरी में दक्षिण कोरिया भी काफी आगे है। वहां के डॉ. किम सियोक ऐसे सर्जन हैं जिन्होंने अभी तक इस तरह के सबसे ज्यादा आॅपरेशन किए है।

अभी तक महानगरों में इस तरह के मामले सामने आ रहे थे, लेकिन अब नोएडा, मेरठ, इंदौर, लखनऊ जैसे शहरों से भी लोगों के लिंग परिवर्तन की खबरें सामने आ रही हैं। लिंग परिवर्तन कराने वालों में वह लोग भी शामिल हैं जिन्होंने सामाजिक दबाव से तंग आकर अपना लिंग परिवर्तन करा लिया। 2010 में भुवनेश्वर की एक महिला ने अपने लिंग परिवर्तन का कारण सामाजिक दबाव को बताया था और कहा था, ‘महिला के रूप में तकलीफें सहने से ज्यादा बेहतर यही है कि वह पुरुष बनकर जिए।’ विदेशों में लिंग परिवर्तन का मूल कारण भले ही व्यक्ति की निजी इच्छा पर निर्भर हो मगर भारत में समाज का दबाव और लड़के की चाहत भी लड़कियों को इस सर्जरी की तरफ मोड़ रही है। यही वजह है कि एक से पांच साल तक के बच्चों के लिंग परिवर्तन के भी मामले सामने आ रहे हैं। हालांकि इसके पीछे बच्चों की शारीरिक बनावट या कोई विकृति भी जिम्मेदार है।
लिंग परिवर्तन को लेकर समाज का नजरिया कुछ भी हो, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह दरअसल, एक चिकित्सकीय समस्या यानी जेंडर आइडैंटिटी डिसआॅर्डर है। इसमें व्यक्ति खुद को अपने लिंग के विपरीत मानता है और इस तरह वह अक्सर तनाव का शिकार भी हो जाता है। ट्रांसजेंडर यानी वह लोग जो अपने जन्म से निर्धारित लिंग के विपरीत लिंगी की तरह जीवन बिताते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो ट्रांससेक्सुअल या ट्रांसजेंडर वह लोग हैं जिनका शारीरिक विकास यों तो पुरुष या स्त्री की तरह ही होता है मगर मानसिक रूप से वह पुरुष होते हुए भी खुद को स्त्री या स्त्री होते हुए भी पुरुष जैसा महसूस करते हैं। विश्व का नजरिया भी इस समुदाय की तरफ से बदल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी अभी तक मानसिक विकार के रूप में दर्ज इंटरनेशनल आइडेंटिटी डिसआॅर्डर की इनकी पहचान को हटाने के लिए प्रयासरत है।
जहां तक लिंग परिवर्तन का सवाल है तो यह बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। लिंग परिवर्तन के बाद भी काफी वक्त तक काउंसिलिंग की जरूरत होती है। जब भी किसी का लिंग परिवर्तन किया जाता है तो सबसे पहले उसकी काउंसिलिंग कराई जाती है। इसमें व्यक्ति से लगातार संपर्क रखा जाता है और उसके दोस्तों, परिवार, दफ्तर आदि के संबंधित व्यक्ति से बात की जाती है। तब कहीं इस सर्जरी की शुरुआत होती है। इसके पीछे सामाजिक कारण भी हैं, क्योंकि लिंग परिवर्तन के बाद भी समाज का भेदभाव भरा रवैया जारी रहता है। ऐसे में वह उन स्थितियों के लिए भी तैयार रहे यह कोशिश की जाती है। एक बार सर्जरी होने के बाद फिर व्यक्ति को उसी पहचान के साथ सारी उम्र रहना पड़ता है और इसके जरिए महिला से पुरुष शरीर में परिवर्तित हुआ व्यक्ति न तो कभी पिता बन सकता है और न ही पुरुष से महिला बनी स्त्री कभी गर्भधारण कर सकती है। कई बार के आॅपरेशन के बाद करीब दो-ढाई साल में पूरी तरह लिंग परिवर्तन हो पाता है। चिकित्सकों के मुताबिक, जिनिटोप्लास्टी एक विशेष प्रकार की सर्जरी है। इसमें कई चरणों में शरीर के अंदर हार्मोनल इंजेक्शन दिए जाते हैं ताकि लड़की के शरीर को लड़के में परिवर्तित किया जा सके। वहीं वैजिनो प्लास्टी में स्त्री अंगों को हटा कर पुरुष अंग विकसित किए जाते हैं। इसमें हार्मोन परिवर्तन की दवाओं के सहारे शरीर में बदलाव लाए जाते हैं और करीब आठ महीने तक चलने वाली इस प्रक्रिया में करीब दो से छह लाख रुपए तक खर्च होते हैं।
जहां न्यायालय ने इस समुदाय को थर्ड जेंडर कहा है और स्पष्ट किया है, ‘वे महिला नहीं है, क्योंकि उनके पास प्रजनन अंग नहीं हैं।’ वहीं भारत के चुनाव आयोग ने भी ट्रांससेक्सुअल लोगों के लिए ‘अन्य’ का एक अलग कॉलम बना दिया है। पिछले साल इस समुदाय की बेहतरी के लिए ‘द राइट्स आॅफ ट्रासंजैंडर पर्सन्स विधेयक 2015’ राज्य सभा में भी पारित हुआ था। 2016 में कुछ बदलाव के साथ ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन एंड राइट्स) विधेयक 2016 लोकसभा में पेश किया गया। ट्रांसजेंडर के लिए काम करने वाले कुछ लोगों का कहना है कि बाद में पेश हुआ यह विधेयक आधा-अधूरा है और इस पर यह कहकर सवाल उठा रहे हैं कि इसमें ट्रांसजेंडर की परिभाषा को पूरे तौर पर स्पष्ट नहीं किया गया है। ट्रांसजेंडर समुदाय का कहना है, ‘सरकार ये क्यों नहीं समझ पा रही कि लिंग किसी व्यक्ति की शारीरिक संरचना नहीं बल्कि रुचि पर निर्भर करता है।

ऐसे लोग भी हैं जो किसी लिंग के होने के बावजूद अपनी शारीरिक पहचान से संतुष्ट हैं और उन्होंने किसी तरह का शारीरिक बदलाव नहीं कराया है। वहीं 2015 में केरल सरकार ने ट्रांसजेंडरों को सामाजिक, आर्थिक अधिकार देने के लिए पहल की। वहीं दक्षिण भारतीय अन्य राज्यों और छत्तीसगढ़ और बिहार जैसे प्रदेशों में भी इस समुदाय के लिए योजनाएं बनाई गई है। कानून के जानकार बताते हैं कि लिंग परिवर्तन का व्यक्ति के अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वहीं न्यायालय ने भी स्पष्ट किया है कि ‘संविधान में बराबरी का अधिकार देने वाले अनुच्छेद 14, 15, 16 और 21 का लिंग से कोई संबंध नहीं है।’  आज चिकित्सा तकनीक के चमत्कार से कितने ही लोग लिंग परिवर्तन के सहारे समाज में सफलता के मुकाम तय कर रहे हैं। कोई बैंकर है, कोई मॉडल तो कोई डॉक्टर। इसमें पश्चिम बंगाल की मानबी बंद्योपाध्याय भी खास हैं, क्योंकि वह पहली ऐसी ट्रांसजेंडर हैं जो किसी कॉलेज की प्रिंसिपल बनीं। एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने अपनी पीड़ा बयान करते हुए कहा था, ‘एक समय मुझे ट्रांसजेंडर होने के कारण काफी प्रताड़ना सहनी पड़ी।’ हालांकि, इतनी प्रताड़ना के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और 2003-04 में लिंग परिवर्तन चिकित्सा तकनीक का सहारा लिया।

आज वह प्रसन्न हैं। दरअसल, ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ भेदभाव और शोषण आम बात है। समाज और परिवार से बहिष्कृत यह लोग पेट पालने और आसरे के लिए भीख मांगते हैं और जब इससे भी गुजारा नहीं होता तो देह व्यापार में भी उतर जाते हैं। यही वजह है कि एचआईवी और एड्स से प्रभावित लोगों में सबसे ज्यादा इसी समुदाय के लोग शामिल हैं। ट्रांसजेंडर जानकारी के अभाव में भी इस रोग का शिकार ज्यादा बन रहे हैं। अपने शरीर में महिला गुण बढ़ाने वाले हार्मोन के इस्तेमाल के लिए जो इंजेक्शन इस्तेमाल करते हैं वह अक्सर दूषित होते हैं। आकड़ों के मुताबिक ज्यादातर ट्रांसजेंडर देह व्यापार में लिप्त हैं। लिंग परिवर्तन कराने के बाद भी अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए देह व्यापार को अपनाना इनकी मजबूरी होती है।

हालांकि अब इनके अंदर उत्साह है और अपने लिए समाज को जागरूक करने का हौसला भी। आज न सिर्फ इस समुदाय की बड़ी संख्या है बल्कि इनके अपने ग्रुप भी हैं जो सोशल साइट्स पर भी अपनी पहुंच बनाए हुए हैं। कोयंबटूर में देश का पहला ट्रांसजेंडर स्पा खोला गया है। वहीं दिल्ली में देश की पहली ट्रांसजेंडर मॉडल एकेडमी स्थापित की गई। इसके पीछे मकसद लोगों में जागरूकता पैदा करना है। जर्मनी में एक कानून बनाया गया है जिसमें बच्चे के जन्म प्रमाण पत्रों या अन्य दस्तावेजों पर लिंग लिखना जरूरी नहीं होगा। ताकि बच्चे बड़े होकर खुद ही अपना लिंग तय कर सकें। वहीं 2015 में पाकिस्तान में मुफ्तियों ने एक फतवे के तहत ट्रांसजेंडरों के निकाह को इस्लामी कानून के मुताबिक वैध ठहराया है। उन्होंने कहा है कि ऐसे लोग, जिनमें शारीरिक रूप से पुरुषों के अंग मौजूद हैं, वह स्त्रियों के अंग वाले दूसरे व्यक्ति से निकाह कर सकते हैं। इसी में संपत्ति से बेदखल करने वाले अभिभावकों के खिलाफ कार्रवाई करने और ट्रांससेक्सुअल पर तंज करने वालों पर भी पाबंदी लगाने को कहा है। ०.

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on October 8, 2016 10:47 pm

सबरंग