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कहानी- विश्वास

मैं भूल गया था। आज जब एक झटका और लगा तो दिल्ली की तीस साल पुरानी बात याद आ गई। जब भी ऐसी घटना होती है, पत्नी उसे याद दिला देती है।
Author August 6, 2017 04:26 am
प्रतीकात्मक चित्र।

गंगा राम राजी

आज फिर ठगा गया। घर में फिर से माहौल गरम हो गया। बच्चे नाराज, पत्नी नाराज। अब तो उसे सामान्य होने में भी बहुत दिन लगेंगे।
मैं अपने काम में व्यस्त था कि मेरे कानों में पत्नी की आवाज पड़ी, ‘सुन रहे हो?…’
‘हां, सुन रहा हूं…’
‘श्यामलाल आपसे मिलने आया है।’
श्यामलाल नाम सुन कर मैं सोच में पड़ गया। कौन श्यामलाल? मुझसे क्या काम? रात के आठ बज रहे हैं… इस समय! फिर खयाल आया कि किराएदार लड़का, जो हमारे यहां दो साल से रह रहा है। वही श्यामलाल होगा।
‘अंदर ही भेज दो न।’
पत्नी भी उसके पीछे-पीछे आ गई और हाथ से इशारा इनकार के लिए करती जा रही थी। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि मामला क्या है। क्या इशारा कर रही है।
‘सर नमस्कार। सर मुझे पैंतीस सौ रुपए चाहिए, अभी इसी समय।…’
अब मेरी समझ में आ गया था कि पत्नी क्यों इनकार कर रही थी। मैं और सोच में पड़ गया। आज मेरे पास पैसे भी थे। इसे कैसे पता चला कि मेरे पास पैसे रखे हैं। इसको क्यों चाहिए। मैंने पूछा, ‘क्यों चाहिए पैसे?’
‘सर मेरी मोटरसाइकिल मिस्त्री ने रोक रखी है। मुझे उसके पैसे देने थे। घर भी फोन किया, तो इस समय वे मेरे अकाउंट में पैसा नहीं डाल सकते। सुबह मैं आपको ग्यारह बजे दे दूंगा।’
लंबी-सी कहानी उसने मुझे सुना दी। पीछे पत्नी इनकार के लिए हाथ हिला रही थी। तभी बड़े वाला लड़का भी पीछे आ गया। वह भी अपनी गर्दन से मना करने का इशारा कर रहा था। श्यामलाल प्रार्थना कर रहा था। बहू भी अपने पति के पीछे खड़े होकर मना करने लगी। घर के सभी सदस्यों का एक ही निर्णय और मैं…
मुझे लगा कि इस लड़के को पैसे दे देने चाहिए। हमेशा ही काम आता है। घर के काम से सब उसे दौड़ाते रहते हैं। दो साल से हमारी सेवा करता रहा है। उसे कैसे इनकार करूं? उसकी जरूरत को जांचने के लिए मैंने उससे पूछा, ‘किस मेकेनिक के पास मोटरसाइकिल है? मेरी बात उससे कराओ।’
उसने झट से अपना मोबाइल निकाला और मिस्त्री को मिला दिया। उससे बात करके मुझे तसल्ली हो गई कि श्यामलाल ठीक बोल रहा है। उधर देखूं तो तीनों मेरी ओर देख रहे थे कि मैं श्यामलाल को पैसे के लिए हां करता हूं या ना। मैं दुविधा में था। कभी मैं श्यामलाल को देख रहा था, कभी अपने तीन सदस्यों को, जो मेरी ओर देख रहे थे। मुझे न जाने क्या हुआ, अपने को रोक न सका। उठा और झट से अंदर जाकर अपने पर्स से पैसे निकाल कर उसे दे दिए। मेरे तीनों सदस्य मेरी ओर घूरते हुए देख कर इधर-उधर हो लिए। श्यामलाल ने मेरे पांव छुए, ‘सर कल ग्यारह बजे मैं…’
‘ठीक है, कल ग्यारह बजे दे देना, मुझे भी किसी को देने हैं… गॉड ब्लेस यू।’
वह तो चला गया, पर मैं अपने तीनों सदस्यों से मिलने नहीं गया। बहुमत के विरुद्ध मेरा फैसला था। अपने कमरे में चला आया। पत्नी से रहा नहीं गया। थोड़ी ही देर में मेरे कमरे में आई, ‘जब मैं पीछे से मना कर रही थी, तो पैसे क्यों दिए?’ उसके तेवर चढ़े हुए थे। मैं घबराने लगा। इन सदस्यों का मुकाबला करना मेरे लिए कठिन था। तभी बहू भी अपने पति को लेकर आ गई।
‘डैडी आप मानते ही नहीं… वह उन पैसों की शराब पीएगा।…’
‘आप अपनी मनमानी करने लगे हैं।’ बेटे ने कहा।
मैं चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा। मैं कुछ पढ़ रहा था। ध्यान भटक चुका था। मैंने किसी को कुछ जवाब नहीं दिया, तो पत्नी बोली, ‘आप बोलते क्यों नहीं हैं… क्यों ठगे जाते हो हमेशा इसी तरह। अभी राशन वाले के पैसे देने हैं। बस वही पैसे निकाल रखे थे। क्या करूं मुझसे ही लापरवाही हो गई, जो उसे देने में देरी कर दी… अगर पैसे नहीं आए तो सारा बजट…।’
मैंने कहा, ‘जरा शांत हो जाओ… यह लड़का कितने विश्वास से मेरे पास आया था। मैं इसके विश्वास को ठेस नहीं पहुंचाना चाहता था। पैसे तो अब मैंने दे दिए हैं, अब डिनर का इंतजाम करो, मुझे भूख लगी है।…’ मैं मुस्कराने की कोशिश करते हुए नेकी पर एक भाषण भी देने लगा, तो वह बीच में ही बोल पड़ी, ‘आप कब सुधरोगे… हमेशा इस तरह से चेले-चाटों से ठगे जाते रहे हो। यह आज की बात नहीं है, याद है दिल्ली की…’
मैं भूल गया था। आज जब एक झटका और लगा तो दिल्ली की तीस साल पुरानी बात याद आ गई। जब भी ऐसी घटना होती है, पत्नी उसे याद दिला देती है।
‘बात तब की है, जब बच्चे पांचवी और सातवीं में पढ़ते थे। वे छुट्टियों में दिल्ली देखने की जिद करने लगे। सो, हम दिल्ली गए।
चिड़िया घर के बस स्टाप पर स्कूटर का इंतजार कर रहे थे। तभी एक दंपति हमारे सामने आ खड़ा हुआ, ‘सर मेरी जेब कट गई है। सब पैसा लेकर चोर चले गए।…’ उस आदमी ने अपनी कटी हुई जेब दिखाते हुए कहा।
मैंने उस पर एक नजर डाली। वह बड़े दीन भाव से मेरी ओर देख रहा था। साथ में उसकी पत्नी इस तरह खड़ी हम दोनों को देख रही थी, मानो उसकी आंखें बरसने वाली थीं। कभी वह मेरी ओर देखती, कभी मेरी पत्नी की ओर। बच्चों ने हम दोनों को पकड़ लिया था और उन्हें देखे जा रहे थे।
‘हम आए थे दिल्ली घूमने, पर अब तो सीधे घर जांएगे। पर कैसे घर पहुंचें…।’ साथ खड़ी उसकी पत्नी ने मेरी पत्नी की ओर देख कर कहा।
‘मैं पेशे से स्कूल मास्टर हूं। आप हमें सौ रुपए उधार दे दें, मुझे अपना एड्रेस दे दें, मैं आपको मनीआॅर्डर से भेज दूंगा।…’
जब उसने अपने को मास्टर बताया तो मेरे मन में उसके प्रति सहानुभूति जाग गई। खुद भी तो मास्टर हूं! मन में कई विचार उठने लगे। मैंने पत्नी की ओर इशारा कर पूछा, तो उसने नजरें दूसरी तरफ कर लीं।
‘भाई साहब सौ रुपए की बात है, हम जाते ही आपको भेज देंगे, प्लीज।… यह मेरा पता है। आप मुझे अपना पता दें।’ उसने कागज के टुकड़े पर अपना पता मुझे दे दिया। लगता था कि उसने पहले ही अपना पता लिख कर रखा हो।
मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि क्या करूं। उन दिनों सौ रुपए बड़ी रकम थी। उन दिनों मुझे दो सौ पचास रुपए वेतन मिलता था। तभी एक स्कूटर वाला वहां आ गया। बच्चे स्कूटर पर बैठने को उतावले थे। पत्नी बच्चों के साथ स्कूटर पर बैठ गई थी। वह आग्रह करने लगा। उसकी पत्नी ने तो मुझे पकड़ ही लिया कि कहीं मैं उन्हें कुछ दिए बगैर ही स्कूटर पर न बैठ जाऊं। मैंने जल्दी से उसे अपना पता लिखवाया, दो पचास पचास के नोट उसे थमा दिए और मैं स्कूटर पर बैठ गया।
मास्टर और उसकी पत्नी की आशीषें मेरे कानों में गूंजती रहीं। याद आने पर आज भी गूंज जाती हैं। साथ में पत्नी के ताने भी याद आ जाते हैं।
घर पहुंच कर मैं रोज डाकिए से मनीआर्डर के बारे में पूछता। कुछ दिन के बाद तो यह हो गया था कि डाकिया मुझे देखते ही कह जाता कि आपका कोई मनीआर्डर नहीं। अब खयाल आता है कि वे पत्नी-पति दोनों इसी तरह लोगों को ठगने निकल जाते होंगे, कभी एक बस स्टाप पर तो कभी दूसरे पर। शाम तक वे कुछ न कुछ तो पैसे इकट्ठा कर ही लेते होंगे।
पत्नी कहती है, ‘सब बदल गए, तुम नहीं बदले। कोई न कोई तुम्हें ठगता ही है और तुम ठगे जाते हो, फिर भी मानते नहीं…।’
‘क्या आज फिर ठगा गया हूं?’ दिल्ली की कहानी याद आते ही मन में विचार आने लगा।
अब डिनर का मन नहीं हो रहा था। घर के सदस्य एक ओर और मैं एक ओर।
‘पता नहीं कब समझ पाओगे, चलो रोटी खाते हैं।’ पत्नी ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा। अब उसका मूड कुछ बदल गया था। वह घर में सामान्य स्थिति बनाने का प्रयत्न करने लगी। मुझे कुछ राहत मिली। मैं उठ कर खाने की टेबल पर आ गया। बेटा-बहू मुझसे बात नहीं कर रहे थे। मैं पोतों से बतियाता रहा। खैर, कैसे भी रोटी खा ली।
अब तो कल की तैयारी करने लगा। कल का इंतजार ऐसे होने लगा जैसे मुझे दसवीं के परीक्षा परिणाम निकलने पर घबराहट होने लगी थी। उस रात भी मैं सोया नहीं था।
दसवीं की याद आते ही ‘बाबा भारती’ की कहानी याद हो आई। डाकू खड्ग सिंह ने अपाहिज बन कर बाबा भारती का घोड़ा हथियाने का जो नाटक रचा था वह मेरे सामने आ गया।
अगली सुबह आई। दस बज गए और सारे घर वाले ग्यारह बजे का इंतजार करने लगे। मैं किसी से नजरें नहीं मिला रहा था। सोचने लगा कि घर के सदस्य अपनी जीत के लिए बेताब नहीं थे, वे चिंतित थे हाथ से जाते पैंतीस सौ रुपए के। अगर पैसे नहीं आए तो सारे घर का बजट बिगड़ जाएगा। लोगों के पैसे नहीं लौटाए, तो काफी कुछ सुनने को मिलेगा, वह अलग। वे सब इसलिए भी चिंतित थे।
घर के सभी सदस्य मुझ पर आक्रमण की तैयारी में थे। आपस में बातें कर रहे थे। मुझे उनकी बातों की भनक पड़ ही जाती।
‘तेरे पापा अपनी ही मर्जी चलाते हैं।’
‘हमारी तो डैड मानते ही नहीं। एक दिन मुझे पैसे की जरूरत पड़ी, तो मुझे दिए ही नहीं, इस पराए को…’
‘आज वह लड़का आएगा ही नहीं।’
‘मम्मी मैंने उस लड़के को शराब पीते देखा है।’
‘तेरे पापा तो हमारी बात का यकीन ही नहीं करते।’

बातें मेरे कानों में पड़ रही थीं। इन बातों से मुझे भी घबराहट होने लगी थी कि कहीं श्यामलाल भी मुझे डाकू खड्ग सिंह की तरह चकमा तो नहीं दे गया। घर की जरूरतें मैं भी समझ रहा था। इसके साथ दूसरे के विश्वास का भी अपना स्थान है। यह सारी पृथ्वी, ब्रह्मांड के सारे ग्रह एक-दूसरे के विश्वास पर ही तो चलते हैं। मनुष्य का एक-दूसरे पर विश्वास लगभग खत्म हो गया है क्या?
मुझे भी चिंता होने लगी। सोचने लगा कि मेरे विश्वास को आज ठेस नहीं लगनी चाहिए। बात पैंतीस सौ रुपए की नहीं, विश्वास की है। अगर मेरा विश्वास टूट जाएगा तो मेरी मदद की भावना भी खंडित हो जाएगी। दुनिया की देखादेखी मुझे भी बदलना नहीं चाहिए। मैं मन ही मन प्रार्थना करने लगा कि श्यामलाल पैसे लेकर आ जाए।
ग्यारह बजने वाले थे। मेरे भीतर उथल-पुथल बढ़ने लगी थी। मैं अपने विश्वास को अपने ही घर में टूटने नहीं देना चाहता था। मुझे न जाने क्या सूझी, अपना एटीएम कार्ड लेकर बाजार की ओर चल पड़ा और पैंतीस सौ रुपए निकाल लाया। घर में यह बताने के लिए कि श्यामलाल पैसे छोड़ गया है, अपने को खुशी की परत में ढालने के लिए तैयारी करने लगा।
मैं प्रसन्न मुद्रा में पैंतीस सौ रुपए सामने की जेब में डाल कर प्रवेश किया ही था कि पत्नी सामने रानी झांसी की तरह एक हाथ में कलछी और दूसरे हाथ में फोन पकड़ कर किचन से बाहर आई। उसकी यह मुद्रा देख मेरे चेहरे की परत गायब, घबराने लगा। हौसला करके बोलने ही वाला था कि पत्नी कलछी वाले हाथ को हिलाते हुए बोली, ‘अच्छा, एटीएम गए थे, पैंतीस सौ रुपए निकाल आए… घर वालों से चोरी करना… मोबाइल भूल गए… पैंतीस सौ रुपए का यह है मैसज… चोर चोरी से जाए, पर हेरा फेरी से न जाए…’
सुनते ही मेरी हवा निकल गई। मेरा ब्रह्मास्त्र परास्त!

वह तो कह कर किचन में चली गई। मैं वहीं बैठ गया। अरे मैं तो घर का माहौल ठीक करना चाहता था। ऐसे कामों में मैं झूठ भी बोलता आया हूं, पर हर बार पकड़ा जाता हूं। आज भी तो मुझे एक विश्वास जीतना था। मैं अपने सिर पर हाथ रख कर मुंह लटकाए बैठा रहा। बारह बज चुके थे। सोचने लगा कि अब तो श्यामलाल की आने की कोई उम्मीद नहीं है।
मुझे उदास देख पत्नी, बहू और बेटे के साथ मेरे पास आई। अब मुझे घबराहट होने लगी। विरोधी पक्ष सामने था। मैं डरने लगा। मुझ पर बड़ा हमला होने वाला है। सब मुझे हारता देख मुस्करा रहे थे। मेरा विश्वास टूट चुका था। उनकी मुस्कुराहट मुझे अखरने लगी थी। मुझमें अब हिम्मत नहीं थी कि उनका मुकाबला कर सकंू। मैं उनके साथ नजरें नहीं मिला रहा था। पास रखे अखबार को अपने सामने किए पढ़ने का नाटक करने लगा था। तभी पत्नी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। मैं कांप गया। वह प्रसन्न मुद्रा में थी। मेरी नजरें उससे चार हुर्इं।
‘अच्छा, यह बताओ एटीएम से पैसे निकालने की क्या जरूरत थी?’
मैं चुप उसकी ओर देखता रहा। वह आगे बोली, ‘घर वालों को ठगने के लिए यह नाटक कर रहे थे। नाटककार तो तुम हो ही।…’
फिर बेटे से पैसे पकड़ कर मेरी ओर करते हुए, बहू और बेटे के साथ हंसी का ठहाका मारते हुए वह बोली, ‘तुम्हारे पीछे श्यामलाल पैसे छोड़ गया था।…’
मैं स्तब्ध उन्हें देखता रहा। मेरे आंनद की कोई सीमा नहीं थी। मेरे विश्वास की जीत हुई थी। ०

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