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कहानी- तहखाने

उस दिन तो जैसे उन्हें काठ ही मार गया था... ! कैसे निकले होंगे वे बोल, व्योमेश के मुख से? एक पिता के मुख से? जन्मदाता के मुख से? कभी कल्पना भी कर सकती थीं वे। वे बच्ची को चम्मच से दूध पिला रही थीं । उनका दूध तो बच्ची पी नहीं पाती थी। चम्मच से ही थोड़ा-थोड़ा पीती थी। फर्श पर फैलाए अपने दोनों पैरों के बीच उसका सिर टिका कर वे दूध का भरा चम्मच उसके खुले मुख में डालतीं और वह मुंह के दोनों कोरों से बह निकलता। बच्ची दूध को भीतर ले ही नहीं पा रही थी।
Author August 13, 2017 00:13 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

उषा महाजन

रे, कोई रुलाओ इन्हें…’ किसी ने जोर से कहा था।
ज्यादातर लोग तो फुसफुसाहटों में ही कह-बोल रहे थे, ‘पत्थर ही बन गर्इं हैं ए तो, जब से… ’
‘अगर ए रोई नहीं, तो भीतर ही भीतर गम खाकर कहीं…’
‘क्या ही जोड़ी थी इन दोनों की! एकदम आदर्श पति-पत्नी! कभी ऊंची आवाज तक नहीं सुनी, इनके घर से…’
‘सब कहीं साथ-साथ ही आते-जाते थे दोनों… और व्योमेश वत्सजी तो इतने सौम्य स्वाभाव के थे कि… ’
वे वैसे ही बुत बनी बैठी थीं। शोकाचार के लिए तैयार किए गए इस कमरे में। लोगों का आना-जाना, बैठना, अफसोस जताना, उन्हें गले लगाते हुए किन्हीं-किन्हीं का आंसू भी बहाना, किसी रस्म की तरह जारी था!
वे क्या करें! कैसे कहें- उन्हें एकांत चाहिए। एकांत, नितांत एकांत। अकेली नहीं होने देना चाहते ये लोग उन्हें ऐसे वक्त में। कैसे बताएं इन्हें कि पिछले तीस सालों से कितनी अकेली रही हैं वे, आज के दिन से कितनी अधिक अकेली। कैसे बताएं इन्हें कि भीड़ में भी इंसान कितना अकेला हो सकता है, परिवार की गहमागहमी के बीच भी। अकेलेपन और एकांत के बीच का फर्क कैसे समझाएं वे इन्हें !
यह दुनिया इंसान को कितना अकेला कर देती है, चारों ओर से घेर कर। हर पल, सामाजिक नियमों-बंधनों से बांध कर!
वे सचमुच रोने-रोने को हुर्इं, रोना चाहतीं थीं, बुक्का फाड़ कर। पर आंसू तो जैसे भीतर ही कहीं सुख चुके थे। पुतलियों को तरल बनाने के लिए भी नहीं निकले।
फुसफुसाहटें अब श्रव्य स्वरों में तब्दील होने लगीं थीं, ‘अजी कभी देखा था, ऐसा संतुलन आपस में किसी पति-पत्नी का? ये तो मानसिक दिव्यांग बच्चों की अपनी एनजीओ- ‘जीवन आशा’ में ही व्यस्त रहती थीं और प्रोफेसर साहब पूरा घर संभालते थे, इनके पीछे। और ‘कामना’ को भी… इनकी बेटी कामना… जिसको संभालना भी इतना मुश्किल…’
एक साथ क्रोध और पीड़ा से उनका मन-बदन दहकने लगा था। जी हुआ कि उठ कर भीतर चली जाएं। पर नियम-आचार की बेड़ियां भी क्या कभी तोड़ पाई थीं वे? तोड़ना चाह कर भी! इन तमाम सालों!
शून्य में ताकती-सी वे किस गर्त में खोने लगी थीं! तीस वर्षों से खोद रखी किसी गहरी खाई में! ‘जीवन आशा’ के कामों में व्यस्त रखते हुए भी अपने आप को, क्या कभी बाहर निकाल पाई थीं वे अपने आप को अपने मन के अंधेरों से! क्या कभी मिटा पाई थीं वे अपने मानस से उन दहके हुए, धूसर दिनों की स्मृतियां?
बीते हुए दिन उनकी खुली आंखों के सामने चलचित्र से सरकने लगे।
विवाह के काफी बरसों बाद वह शुभ मुहूर्त आया था। परिवार में सभी को उनसे पुत्र की अपेक्षा थी, पर व्योमेश ने हमेशा उन्हें आश्वस्त किया था, ‘तुम इन सबकी बातों पर न जाओ। कहने दो, जो कहते हैं! यह अपने हाथ में तो नहीं होता किसी के! जो भी होगा, हमें प्यारा होगा, हमारा बच्चा, बेटा हो या बेटी! और मैं तो सचमुच बेटी ही चाहता हूं। हम सब भाई भाई थे, बहन एक भी नहीं। तो अब अपने यहां अगर बेटी हो जाए, तो…’ और सचमुच वही हुआ था, उनका मनचाहा। उन्हें लड़की हुई थी। व्योमेश खुश थे, सचमुच खुश, जैसा कि पहली बार पिता बनने पर कोई भी व्यक्ति हुआ करता है। उन्होंने तो उसका नाम भी तभी का तभी रख दिया- कामना। उनके मन की कामना पूरी जो हुई थी।
जब वे बच्ची को घर लेकर आर्इं, पता तो तब चला कि वह न ठीक से दूध पी पा रही थी, न उनकी बाहों में उसका ढुलमुल शरीर ठहर पाता था। बच्ची तो ठीक से रो भी नहीं पाती थी। किन-किन डॉक्टरों को नहीं दिखाया! पर जो सच था, वह था। बच्ची मानसिक रूप से बाधित थी, ‘सेरेब्रल पॉल्सी’ की शिकार। एक ऐसी स्थिति, जो कोई बीमारी नहीं थी कि इलाज से ठीक हो जाती। शरीर की, मस्तिष्क की एक स्थिति थी, जो हमेशा उसके साथ रहने वाली थी।
वे फूट-फूट कर रोई थीं, ‘हे भाग्य विधाता, मेरे साथ यह क्या किया, मेरे ही साथ क्यों किया ऐसा? ‘दिन-रात रो-रो कर बुरा हाल हो रहा था उनका। परिजनों-मित्रों के तसल्ली देते बोल भी उन्हें जहर बुझे तीरों से चुभते।
और, उस दिन तो जैसे उन्हें काठ ही मार गया था… ! कैसे निकले होंगे वे बोल, व्योमेश के मुख से? एक पिता के मुख से? जन्मदाता के मुख से? कभी कल्पना भी कर सकती थीं वे।
वे बच्ची को चम्मच से दूध पिला रही थीं । उनका दूध तो बच्ची पी नहीं पाती थी। चम्मच से ही थोड़ा-थोड़ा पीती थी। फर्श पर फैलाए अपने दोनों पैरों के बीच उसका सिर टिका कर वे दूध का भरा चम्मच उसके खुले मुख में डालतीं और वह मुंह के दोनों कोरों से बह निकलता। बच्ची दूध को भीतर ले ही नहीं पा रही थी। हताश-सी वे रोने-रोने हो आर्इं थीं।
व्योमेश पास ही, किताब खोले हुए बैठे थे, पर उनका ध्यान उन्हीं में लगा था, मां बेटी में। किताब को बंद कर, कुर्सी पीछे खिसका कर, वे उनके करीब चले आए। कुछ देर वैसे ही उन्हें और बच्ची को ताकते रहे। फिर उनकी आंखों में आंखे डाल, शांत, सपाट स्वर में बोले, ‘मणि, एक बात मन में आ रही है… तुम्हारी यह तकलीफ देखी नहीं जाती… क्यों न… हम कामना को, मदर टेरेसा के ‘निर्मल हृदय’ आश्रम को सौंप दें! वहां इसकी अच्छी देखभाल…’
वे अवाक-सी उन्हें ताकने लगी थीं। यह व्योमेश ने कहा? उनकी बच्ची के अपने पिता ने कहा? विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र पढ़ाने वाले एक प्रोफेसर ने कहा? व्योमेश इतने संवेदनहीन थे- उनके सहने की क्षमता से परे था उनका कहा वह वाक्य।
वे किसी हिंस्र पशु-सी उग्र हो उठी थीं। बच्ची को वहीं बिस्तर पर छोड़, उन्होंने दोनों हाथों से व्योमेश को कंधों से पकड़, झकझोरते हुए पूछा, ‘इंसान हो तुम? पिता तो हरगिज नहीं… प्लीज प्लीज, जाओ तुम! तुम्हारी कुछ नहीं लगती यह बच्ची! … यह मेरी है, सिर्फ मेरी… और इसकी सारी जिम्मेदारी भी मेरी… तुम्हें कुछ नहीं करना होगा इसके लिए… तुम इसकी चिंता कतई मत करो।…’
और सचमुच, उसी दिन से उन्होंने अपनी लाचारी का जामा उतार फेंका था। किस-किस से नहीं मिली थीं! कहां-कहां नहीं गर्इं थीं! उन्होंने अपनी बच्ची के जीवन को जीने योग्य बनाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। यह तय कर चुकी थीं वे। किसी शुभचिंतक ने ही सलाह दी थी कि वे कामना को दिल्ली ले जाएं। वहां ऐसे बच्चों के लिए कुछ बहुत अच्छी गैर-सरकारी संस्थाएं थीं। तभी उन्होंने दिल्ली जाने का इंतजाम कर लिया था। व्योमेश की सहमति भी नहीं ली थी उन्होंने, पर खुद व्योमेश ने उनके लिए सारे इंतजाम किए थे। व्योमेश ने उन्हें मनाने-समझाने की बहुत कोशिश की थी कि उनका वैसा मतलब बिलकुल नहीं था, वे तो सिर्फ उनकी तकलीफ देख कर , उनकी यातना देख कर, बिना सोचे-समझे ही वह सब कह बैठे थे। पर उनके दिल का वह कोना, जो रिक्त हुआ था, अपनी बेटी के पिता के लिए, उसे क्या इतने से ही भर सकते थे व्योमेश!
वे कामना को लेकर दिल्ली चली आर्इं थी। ‘अंतर्ज्योति’ की संचालिका सविता दी से सलाह-मशविरा किया। उन्हें भरोसा हो गया कि कामना ठीक हो सकती है।
‘अंतर्ज्योति’ में कामना की तरह-तरह की थेरेपी से लाभ हो रहा था। साथ ही वे यहां काम करते हुए, खुद भी सब प्रकार की थेरेपी करना सीख रहीं थी। दिल्ली में रहते इन दो वर्षों में व्योमेश न जाने कितनी बार उनसे मिलने आते रहे, पर उनका हृदय उनके प्रति वैसे ही पत्थर बना रहा। व्योमेश जिद न करते, तो शायद वे कलकत्ता वापस लौटती ही नहीं।
बहरहाल, लौटी तो थीं वे कलकत्ता और पत्नी के सारे फर्ज भी निभाती ही रही थीं, पर मन से दोबारा फिर व्योमेश की कभी हो ही नहीं सकीं। कभी माफ नहीं कर सकीं वे मन से उन्हें।
कलकत्ता लौट कर उन्होंने अपनी एक अलग ही दुनिया बना ली थी, अपनी और कामना की और कामना जैसे हर उस बच्चे की, जिसकी खबर उन्हें मिलती। कलकत्ता बड़ा शहर था, पर रिश्तों में इतना घना बुना हुआ कि उनके दिल्ली जाने और वहां दो साल रह कर कामना को चलने-फिरने लायक बना कर लाने की खबर सारे परिजनों, पड़ोसियों और मित्रों में उनके लौटते ही फैल गई थी। उन्हें शीघ्र ही पता चल गया था कि मां के रूप में उनकी त्रासदी अकेले उन्हीं की नहीं थी, उनके परिचितों में ही कुछ और दंपति भी थे, जिन्हें प्रारब्ध ने ऐसी ही स्थिति में डाला हुआ था। कामना की हालत में सुधार का सुन कर वे खुद ही उनके पास आने लगे थे।
तो इस तरह शुरुआत हुई थी, उनकी एनजीओ ‘जीवन आशा’ की, सिर्फ सात मानसिक बाधित बच्चों के साथ।
आज इसमें तीन सौ से अधिक बच्चों को तरह-तरह की थेरेपी द्वारा जीवन जीने योग्य बनाया जा रहा था। पांच कुशल इंस्ट्रक्टर थीं और बड़ा स्टाफ था उनका। अपनी खुद की नई इमारत भी। सब अपने ही बलबूते किया था उन्होंने। कैसे बसों में लटक-लटक घूमी थीं वे शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक, डोनेशन मांगती, मंत्रालयों, अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगातीं, इस इमारत को खड़ा करने के लिए जमीन आबंटित कराने के लिए! आज उनका नाम है, आसपास के कस्बों-शहरों से लोग अपने बच्चों को लेकर आते थे उनके पास। विदेशों तक में उनकी पहचान होने लगी थी। तरह-तरह के पुरस्कार-सम्मान उन्हें आए दिन मिलते रहते थे। कितनी ही संस्थाओं के बोर्ड पर थीं वे। कभी यहां मीटिंग में शामिल होतीं, कभी वहां। आए दिन देश-विदेश से सेमिनारों-संगोष्ठिओं के न्योते आते रहते।
कामना की देखभाल के लिए उन्होंने एक पूरे समय रहने वाली कामवाली तो पहले ही लगा रखी थी, अब एक प्रशिक्षित नर्स भी दिन भर उसके साथ रहती। पर, जब भी घर से बाहर निकलतीं वे, व्योमेश उन्हें आश्वस्त करना न भूलते कि उनके पीछे बच्ची की पूरी देखभाल वे कर लेंगे। देखभाल! ये करेंगे? वे मन ही मन व्यंग्य से मुंह सिकोड़तीं! पर, उनकी तमाम निरपेक्षता के बावजूद व्योमेश हर तरह की मदद की पेशकश उन्हें करते ही रहते। घर से बाहर किसी को जाहिर ही नहीं होता कि उनके बीच अब कैसे अनजान से रिश्ते बन आए थे। जहां-तहां, जिद करके व्योमेश उनके साथ जाते और कामना को अपने पास ही बिठाते। वे मन ही मन कुढ़तीं कि आज उनका नाम था, तो साथ आने में गर्व महसूस कर रहे हैं जनाब! कामना को अपने साथ तो बिठाते हैं, पर मन में न जाने क्या होगा? वे भूली नहीं थी वह दिन, जब इसी शख्स ने इसे मदर टेरेसा के ‘निर्मल हृदय’ में…
स्त्री का हृदय- एक गहरा तहखाना होता है, जिसके भीतर उसने क्या-क्या नहीं छिपा रखा है, कोई क्या जाने! पति के प्रति मन की तमाम घृणा, विरक्ति उन्होंने अपने मन में ही छिपाए रखी थी। न कामना को कभी इसकी भनक लगने दी और न समाज को। वे जानती थीं कि कामना व्यक्त भले न कर पाती हो, पर मन के भीतर उसके भी वही भावनाएं थीं, जो किसी भी सामान्य इंसान के भीतर हो सकती हैं। घर में लड़ना-झगड़ना, कलह उसके लिए घातक हो सकता था। वैसे भी, वे घर में रहती ही कितना थीं! दिन तो सारा ‘जीवन आशा’ के कामों में ही बीत जाता, थक-हार कर घर आतीं, तो थोड़ी देर में कामना के सोने का वक्त हो जाता। महीने के कई दिन तो कहीं न कहीं सेमिनार आदि में सम्मिलित होने के लिए जाते रहना पड़ता। रिटायर होने के बाद से व्योमेश दिन भर घर में ही रहते थे। जब भी घर लौटतीं तो देखतीं वे कामना के साथ ही होते। कभी कोई गेम खेल रहे होते, कभी उसे कुछ पढ़ कर सुना रहे होते। उनका हृदय तब भी न पिघलता और वे मन ही मन व्यंगात्मक-सी हंसी हंस देतीं- ‘वाह रे दिखावा…’

कमरे में पति के पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन करने वालों का आना-जाना लगा हुआ था। वे वैसे ही पथराई-सी, अन्यमनस्क हुई बैठी थीं।
‘पापा पापा…’ एकदम उनकी तंद्रा टूटी। उन्होंने मुंह ऊपर उठाया। असंयत कदमों से भीतर घुसती उनकी बेटी कामना उनके सामने थी। ‘धप्प’ की आवाज के साथ, वह वहीं सफेद चादर में लिपटे, पिता के शव के पास बैठ गई और उनकी ओर देखते हुए, छोटे बच्चे की सी निश्छलता से अपने टूटे-फूटे स्वर में पूछने लगी, ‘म म ममा! नर्स कहती है कि मेरे पापा मर गए! मर गए मेरे प पा पापा?’ शव को अपने कमजोर हाथों से झकझोरती, वह अस्फुट स्वर में विलाप कर रही थी, ‘अब मेरे को कौन प्यार करेगा, ममा? पापा लव्ड मी सो मच! कितना प्यार करते थे पापा मुझे… मेरे पापा, मेरे पापा…’
वे अवाक-सी हुर्इं, एकटक अपनी बेटी को ताकने लगीं। आंखों के आगे अंधेरा-सा छाने लगा। तरह-तरह से याचना करता, क्षमा चाहता, उन्हें मनाता, मनुहार करता व्योमेश का चेहरा, अपने उपेक्षित पति का चेहरा उनकी धुंधलाई आंखों के आगे दिप-दिप करने लगा।
उनके कलेजे में हूक-सी उठी। विक्षिप्तों-सी उठ कर वे बेटी की ओर दौड़ीं।’ नहीं, नहीं…’ उसे बांहों में भर, वे झर-झर रोने लगीं।
लोगों में फुसफुसाहटें हुर्इं- ‘बेटी के भविष्य का सोच कर ही रोर्इं आखिर मणिमाला जी!’ ०

 

 

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