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कहानी: एकांत का उजाला

बांह फैलाए भविष्य की ओर बढ़ते भी उसे लगता है जैसे अनगिनत साए उसे घेरे साथ ही बढ़े आ रहे हैं। प्रितपाल कौर की कहानी ।
Author October 2, 2016 01:26 am
प्रतिकात्मक तस्वीर।

 

प्रितपाल कौर

‘पीछे मुड़ कर क्यों देखती हो? क्या है वहां? सिर्फ दर्द, परेशानियां।…’‘जानती हूं।…’ चेहरे पर छाई रहने वाली हंसी कब की लुप्त हो चुकी थी। पीछे मुड़ कर नहीं देख रही थी, बल्कि बार-बार पीछे घूमती गर्दन को खींच रही थी। मरोड़ रही थी कि सामने देखे। सामने जहां भविष्य ने एक बार फिर जन्म लिया है। टूटन और बिखराव से अनजान दूध पीता उसका शैशव फुर्ती से हाथ-पैर चलाता जल्दी-जल्दी परवान चढ़ना चाहता है। अपनी दुनिया खड़ी करना चाहता है। जहां आंखों पर झिल्लियां नहीं चढ़ाई जातीं, पैरों में नाप से छोटे जूते नहीं पहनाए जाते। जहां खुल कर हंसने पर अंदेशों का हौव्वा नहीं दिखाया जाता, जहां हाथों को शिकंजों में नहीं कसा जाता, जहां दिमाग पर रंदा फेर कर कुंद करने का प्रयास सतत चलता नहीं रहता।…कितना कुछ दिखाई देता है। सामने देखती है तब भी विगत की परछाइयां कहां छोड़ पाती हैं। बांह फैलाए भविष्य की ओर बढ़ते भी उसे लगता है जैसे अनगिनत साए उसे घेरे साथ ही बढ़े आ रहे हैं।

सामने देखती आंखें जब पीछे घूमती हैं, तो दिखाई देती है एक लड़की। दुनिया के अथाह समंदर में एक बूंद सरीखी।… छोटी-सी दुनिया ही तो चाहती थी। अपने होने का अहसास था, उसी को जीना चाहती थी, आत्मसम्मान के साथ। पर शायद वक्त ही सही नहीं था। एक लड़की। रंग-बिरंगे फ्रॉक, गुड़ियां, किताबें, आइसक्रीम और भाइयों के साथ मस्ती। सिर्फ यही तो था। दुनिया में कदम रखे तो अपने औरत होने का अहसास जागा। और जगीं औरत होने की अपेक्षाएं जिंदगी से।… पर क्या औरत होने का मान मिला? कुछ समझ नहीं पाती। क्या सिर्फ कपड़े उतार कर खुद को परोसना।… मन का, तन का बलात्कार लगातार झेल कर, हर सुबह ताजादम हो, कपड़ेपहन कर चेहरे पर मुस्कराहट बिखेरना। इन सबके बीच खाना, चाय, मेहमाननवाजी और लगातार होता अपमान।… कारण सिर्फ इतना कि अपने होने का अहसास अभी तक बना हुआ क्यों है?

और फिर शुरू हुए ये लांछन। जीने की अदम्य लालसा जब सब झेल ले गई थी, तब सदियों पुराने पुरुष ने वही सदियों पुराना हथकंडा इस्तेमाल किया था। समर्पित के प्रेम को आर्थिक आलंबन से तौल कर एक घृणित नाम दिया था। शब्दों का भाव कोड़े की तरह आकर लगा था आत्मा पर। स्वयं अपने भीतर विचरते, खुद को टटोलते, प्राणों पर हुए इस आघात के बाद फिर और क्या शेष बचा था? मां होने का सम्मान तक धुल गया था। चीत्कार कर रोई थी एक बार। सब कोने भर लिए थे सैलाब से।… पर सब भीतर ही।बाहर झांका तो दया ही उमड़ी।… समाज… नारी थी न। इसीलिए तो उसकी लज्जाशीलता को बचाए रखने का दायित्व एक पुरुष को सौंपा था उसके समाज ने। जैसे वह खुद मिट्टी का कोइ लोंदा थी या फिर डंडे के बल पर हांका जाने वाला कोई पशु। जो अपनी लज्जा खुद नहीं ढक सकता, सिर पर छत नहीं डाल सकता, बहती हवा से मुंह का कौर नहीं पैदा कर सकता। पर यह सब भी कहां वह पुरुष दे सका? सालों साल केवल उसी के दम पर बिता कर भी एक अहसास था। एक झूठा विश्वास कि मां होने का सम्मान तो झोली में है। मगर वह भी पानी एक बुलबुला निकला।

दूसरी बार मां बन कर भी जब बाहें खाली रह गर्इं तब कितना कुछ यों ही रेत के ढूह-सा बिखर गया था। उसी को समेटती अपने ही किसी किनारे पर ठिठकी खड़ी थी जब कुछ शब्द चीर कर उसके वजूद के कई हिस्से कर गए थे। मां का क्रंदन, प्रेमिका की गुहार, पत्नी की गरिमा सब शांत हो गए थे। एक ठंडा बेजान पत्थर खुद वहां अपने हाथों रख दिया था, जहां कभी जीवंत मांस का लोथड़ा, लहू से सराबोर धड़का करता था। समाज पर उस दिन भी हंसी थी। पागलों सरीखा भरपूर अट्टहास।… पत्नी होने की गरिमा, मां होने का सम्मान, सभी तो अवसरवादी थे। बड़े समाज के हर छोटे-छोटे हिस्से में, जिसे वे लोग घर कहते थे, वही विद्रूपता नंगी खड़ी दिखाई दे रही थी। हर एक अंगुली जो उसकी तरफ उठी थी, बची तीनअंगुलियां अपने-अपने उठाने वाले पर ताने खड़ी थी। इसी समाज के उस सदस्य पर जिसका नाम पति था, जितना क्षोभ था, उस दिन मिट गया था।… उसके नन्हे कद पर मात्र दया बची है। और प्रेम दया पात्र में नहीं डाला जा सकता। लेकिन ठंडे बेजान पत्थर के नीचे जो अब भी रह-रह कर धड़क उठता है।… आंखें पनीली हो आर्इं। अपने भीतर की औरत का क्या करे? यह नहीं मरती। आज भी इसे लगता है कोई पुरुष हो, और यह उसकी छाती पर सिर रख कर सांस ले सके। लेकिन सिर्फ सांस लेने भर से क्या होगा? सांसें प्राण फंूकेंगी तो देह कटेगी, भूख जागेगी, और एक गोल दायरा फिर इसी छोर से शुरू हो जाएगा। इसी से डरती है। डरती हूं आज भी। अपने आप को पूरी तरह आज भी नहीं जीत पाई।’
‘नहीं, तुम्हें देख कर ऐसा नहीं लगता। तुम जीत चुकी हो खुद को। सिर्फ पहचान नहीं पा रही।’
प्रश्नवाचक निगाहें उसकी तरफ उठाई, तो वह कट कर रह गया।

‘तुमने ही कब पहचाना मुझे? आज भी सोच कर देखो तो समझ पाओगे। तुम्हें जो आकर्षित कर रहा है वह मेरा शरीर ही है।’ मेज पर रखा पानी का गिलास उठा कर एक ही सांस में पी गया। गले के कांटे पेट में उड़ेले तो वहां भी उन्हें झेलना दुष्कर लगा। ‘लुक। तुम जो भी हो, मैं तुम्हें तुम्हारी संपूर्णता के साथ देखता हूं। मन, आत्मा, बुद्धि, देह… अच्छा, तुम्ही बताओ।क्या तुम्हारी देह तुमसे अलग है? फिर इसकी आवाज नकारने पर क्यों तुली हो?’ कुछ देर चुप्पी छाई रही। बहुत धीमे से बुदबुदाती उसकी आवाज उठी तो वह सुनने के लिए आगे झुक आया। ‘इस देह ने छला है।… हमेशा छला है। वह दौर, जब पहली बार पुरुष को पाना चाहती थी। कटती रही, टीसती रही।… मन के बहकावे में आकर भी मनमर्जी जी पाने मेंअसमर्थ। समर्थ हुई तो एक और देह गढ़ने लगी। भीतर उठती हिलोरें सिवाय इस देह के, मन और आत्मा सभी को भाती थी। यह देह… ऐंठती थी। हर पल डंसती थी।… मन के सुख पाने की चाहमें यह हमेशा कष्ट देती है।’उस पर झुंझलाहट पूरी तरह हावी हो गई थी। ‘फिर भी यह ढीठ मन कितना चाहता है इसे। इसे तंदरुस्त रखना चाहता है। सजाता है। संवारता है। खुद मुझे पीछे धकेल देता है।…’ स्वयं से उकता कर बायां हाथ मेज पर पटका तो दर्द से कराह उठी।

मेज का किनारा हथेली में धंस गया। लंबी-सी लकीर गुलाबी से लाल हुई और लाल बूंदें टपकने लगीं। दाएं हाथ से इसे लपेटा और वाश बेसन की तरफ चल पड़ी। ठंडे पानी की धार के नीचे कुछ देर हाथ को रखा। साफ पारदर्शी पानी के हथेली को छूकर लाल होते हुए नीचे बहता देखती रही। ठंडे पानी से चमड़ी के अहसास कुछ कुंद पड़े, दर्द धीमा हुआ तो दाएं हाथ से बांया हाथ थामे पीछे मुड़ी। जाने कबसे पीछे खड़ा था। उसके चेहरे पर जो देखा तो उसे झेल नहीं पाई। आंखें झुकाई तो फिर दोनों हाथ नजर में आ गए। दर्द उठा तो याद आया कि पट्टी बांधनी है। बाथरूम की तरफ बढ़ी, पीछे उसकी पदचाप स्पष्ट थी। आगे बढ़ कर उसने पट्टी का रोल, बीटाडीन, कैंची संभाल लिए तो कुछ कह नहीं पाई। चुपचाप घाव धोने की जलन को झेला, दवा की नरमाई से पिघलते घाव को सहलाते उसके हाथों को देखती रही।… पट्टी बांधने लगा तो अनामिका में पहनी अंगूठी आड़े आने लगी। एक बार चार आंखें मिलीं, शायद पल भर को ठिठकी भी और फिर उसने सधे हाथों से अंगूठी उतार कर पास के शेल्फ पर रख दी। बल्ब की तेज रोशनी अंगूठी पर पड़ी, तो उसमें जड़े पत्थरों में से कुछ झिलमिलाया। उसने आंखें फेर लीं। अंगूठी से खाली हुई हथेली देखने की उत्सुकता जागी। मुंह घुमाया तो घायल हाथ उसके दोनों हाथों में रखा सुकून से सांस ले रहा था। लगभग पूरी हथेली पट्टी में लिपटी चैन से सो रही थी। अंगुलियों के ऊपरी हिस्से भर खाली थे। धीमे से हाथ छुड़ा लिया।

उसके शांत चेहरे की झिझक में दबी चैन की उसांस दिखी तो नहीं, फिर भी जैसे बंद किताब के भीतर का आभास शीर्षक से ही हो गया हो। जिस आत्मीयता से वह पट्टी बांधता रहा था, उसके निश्चल हाथ को सहलाता रहा वह भीतर कुछ थमा गया। तिलमिलाता-सा एक प्रश्न खड़ा हो गया। क्यों पहले नहीं समझ सका खुद को? इसे? और दोनों के बीच जो था उसको? क्यों खुद एक जिंदगी बुनने में लगा रहा? ऐसा ताना-बाना, जो आज पंद्रह साल के बाद भी अधूरा ही था। हर बार धूप में तपते किसी चेहरे पर छांव दिखी भी तो परछार्इं इसी की थी। तपते मन को कहीं भी ठौर नहीं मिला। लेकिन भीतर कहीं एक विश्वास भी था कि पंद्रह साल में जो चादर उधर उसने बुनी होगी, उसमें लिपटी वह तो चैन से तकिए पर सिर टिकाए आंखों में मुस्कुराहट समेटे होगी। आकर देखा तो जड़ हो गया। चेहरे पर मुस्कराहट ओढ़े आग उगलती आंखों से लगातार झुलसते उसे देख कर तिलमिला उठा था। जिस पुरुष की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाने की बात सोच कर आया था, उसके प्रति क्षोभ से भर उठा था। आज उसकी चादर के ताने-बाने में जो अपमान के दाग जगह-जगह काले धब्बों की तरह जड़े थे, उन्हीं को रह-रह कर कुरेद रहा था। चाहता था वह अपने अतीत की गिरफ्त से पूरी तरह छूट जाए, तो शायद दोनों ही एक नई जिंदगी बन सकें। पति शब्द का जो अर्थ उसने जाना है, उससे अलग उसमें उम्मीद जगा सके, तो दोनों ही जी सकें। यही सोचते आंखों में विशवास उतर आया।

दो कदम पीछे हट कर सीधी खड़ी हुई, तो सामने उसकी आंखों की मुस्कराहट अपनी रौ में बहती उसे गुदगुदाने लगी। गंभीर स्वर गूंजा तो लगा आज पहली बार किसी पुरुष का स्वर सुना है। ‘जिस मजबूत लड़की से बिना कुछ कहे चला गया था। वही औरत आज सामने खड़ी है।… आॅफ कोर्स, हाथ पर बंधी पट्टी के साथ।… यही तो एडिशनल चरम भी है।… विल यू एक्सेप्ट मी?’ वही शाश्वत डोर पैरों को बांधने के लिए फंदा बुनने लगी। वैसे ही कुछ दाने पेड़ के नीचे बिखरे दिखे, तो डालियों में छिपा जाल भी नजर आ गया।… नहीं।… अब और नहीं।
सारे संशय मिट गए। मन पर छाई नीरवता धुल गई। एक भरपूर खिलखिलाहट उसके गले से उभरी और खिलखिलाते ही वह कमरे में लौट आई। पीछे आती पदचाप गर्व जगाए रखने को काफी थी। उसके अकबकाए चेहरे पर दायां हाथ हल्के से फिराते, शेव की हुई स्निग्ध नरमाहट से आनंदित होते खिलखिलाहट फिर उभर आई। ‘कम आॅन, बेकार की बातें मत करो। हम दोनों सचमुच एक-दूसरे को झेल सकते हैं। हमारे रिश्ते में मर्द और औरत का क्या काम?’ कुछ देर ठहर कर उसे देखती रही। दो कदम आगे बढ़ी। उसे बाहों में समेटा। हथेलियों से उसकी पीठ थपथपाई और झटके से अलग कर दिया। रसोई की तरफ जाते एक बार ठिठकी, मुड़ कर खड़ी हो गई। उसकी खाली आंखों में झांक कर बोली, ‘मेरा वह समय चुक गया जब मैं किसी के लिए जी सकती थी। तुम चले गए और हमने उसे खो दिया। अब मेरे सामने जो है, वहां टिकने के लिए मेरे पास पुरुष को पीठ देने की गुंजाइश नहीं है। मैं कम हो गई हूं। सिर्फ खुद के लिए बची हूं।’ और फिर गंभीर चेहरे पर खींच कर मुस्कराहट लाते हुए बोल पड़ी, ‘याद है, जब हम कॉलेज में थे, तुम चाय कितनी अच्छी बनाते थे। आज चाय पिलाओ, उन दिनों की याद में। मैं आॅमलेट बनाती हूं।’चेहरे पर वही पुरानी जानी-पहचानी मुस्कराहट लौट आई थी। सॉसपैन उसे पकड़ाया तो वह भी अपने आपे में लौट आया। हल्की-सी हंसी के साथ एक धौल उसकी पीठ पर लगा दिया। होंठ खुद ही गोल होकर सीटी बजाने लगे। पानी डाल कर पैन गैस पर रखा और कैबिनेट खोल कर चाय का सामान ढूंढ़ने लगा। फ्रिज में से अंडे निकालते हुए उसे भी वह धुन याद आ गई। उसके साथ स्वर मिलाते वह भी गुनगुना उठी। ०

 

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First Published on October 2, 2016 1:26 am

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