December 09, 2016

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कहानी: निर्बाध

वह लड़की दस दिन बाद घर लौटी। इस बीच उस लड़की का एक महत्त्वपूर्ण नृत्य समारोह था, जो छूट गया।

Author November 20, 2016 01:17 am
प्रतीकात्मक तस्वीर ।

अशोक गुप्ता 

मैं तन्वी से माफी मांग कर लौट रहा हूं। मैंने सोचा था कि अगर माफी मांगनी ही है तो ऐसे माहौल में मांगनी चाहिए जहां शब्द, मनोभाव और एकाग्रता जस की तस उस तक पहुंच सके, जिसके लिए वांछित है। माफी का प्रसंग शनिवार की शाम का था, उस जमघट का, जिसे हम अक्सर प्राणवायु भी कहते हैं। रात काटते हुए मैंने चुना कि मैं कल, रविवार को ही, तन्वी से मिलूंगा। मुझे मालूम था कि रविवार को सुबह तन्वी अपनी बेटी को वायलिन क्लास तक पहुंचाने जाती है और जब तक बेटी वहां रहती है, तन्वी सामने के एक पार्क में बैठती है। उसके हाथ में कोई किताब होती है। वह पढ़ती है या किताब थामे अपने भीतर उतर कर कुछ मथती रहती है। इसके अलावा तन्वी को पेड़ों पर एक टहनी से दूसरी टहनी फुदकती, चहचहाती चिड़ियां देखना बहुत भाता है, या पार्क में भटकते उन चेहरों को पढ़ना, जिनका पार्क में आना अपने आप से एक पलायन होता है। जो भी हो, तन्वी का उस समय पार्क में होना फिजूल नहीं होता।

माफी का कारण शनिवार को बना। हमारा जमघट था, जिसे हम बतकही कहते हैं। वैसे तो इसका चेहरा मूलत: साहित्यिक है, लेकिन तमाम तरह के दूसरे मुद्दे भी इसमें आ बैठते हैं। अधिकतर हम लोग अपनी-अपनी नौकरी से निपट चुके हैं, लेकिन उन बीते चालीस एक बरसों के अभ्यास से पूरी तरह मुक्त नहीं हुए हैं। साहित्य संस्कृति के बीज इस दौरान भी हम सबके भीतर छिपे हुए थे, लेकिन उनके स्वतंत्र निर्वाह का अवसर कहां था। यहां तक कि जो साथी पत्रकारिता जैसी नौकरी में थे या साहित्य पढ़ने-पढ़ाने के काम में, उनका समय और ऊर्जा भी पूरी तरह उनके अपने लिए नहीं थी। और फिर परिवार का दायित्व था। कुल मिला कर अब यह समय था कि आजाद होकर, चालीस बरस से लदा कवच उतार कर, अंगड़ाई लेकर नए सिरे से प्राणवायु ग्रहण करने के लिए तैयार हुआ जाए। सैद्धांतिक रूप से बतकही थी ही इसी के निमित्त, लेकिन ऐसा होता कहां है? कम से कम सबके लिए तो नहीं होता। कुछ के कवच इतने भारी होते हैं कि उनसे उतारते नहीं बनता। कुछ के कवच जन्मजात होते हैं, जैसे प्लीज, थैंक यू, और आप जैसी संस्कृति से बाहर आना उनके लिए संभव ही नहीं होता।

यायावरी, आवारगी, जी खोल कर उन्मुक्त भाषा में बोलना, ठठाना, रूठना, दोस्ताना हक के साथ लड़ पड़ना यह सब उनके खाते में वर्जित होता है। वे गहरे दोस्त के सामने भी उसी शैली में बंधे होते हैं, जिसमें वे लंबे समय तक अपने बॉस के सामने होते रहे हैं। ऐसों के सामने, वे लोग, जो भले प्राणवायु के प्राण हों, उन खास लोगों के सामने कसूरवार पाए जाते हैं, जिनकी संरचना में उन्मुक्तता के लिए जगह नहीं होती। मैं कसूरवार था और मुझे तन्वी से माफी मांगनी थी, हालांकि तन्वी ‘बंधुआ संस्कृति’ टाइप लड़की नहीं थी। पर, मैं उस जमघट में सबके सामने अपने इस आश्वासन के साथ कि मैं अब अपनी निजता की परिधि में हूं, वैसा कु्रद्ध और असहमति भरा व्यवहार कर बैठा था, जो दफ्तर की बिजनेस मीटिंग में किए जाने योग्य कतई नहीं था और उस दशा में तो ‘घोर अनुशासनिक’ था जब उस मीटिंग में कंपनी के महानिदेशक भी उपस्थित हों। मुद्दा क्या था, मैंने क्या किया-कहा, तन्वी ने मेरे तेवर का जवाब किस तेवर में दिया, यह सब अप्रासंगिक है। प्रासंगिक केवल वह परिदृश्य है, जो अपने-अपने पदों पर शालीन और घोर डिप्लोमैट अधिकारी रह चुके लोगों के बीच प्रस्तुत हुआ, जिनमें मैं भी शामिल था।
मैं पार्क में पहुंचा कि तन्वी को खोज लूंगा, लेकिन इसके पहले ही उसने मुझे देख लिया। उसने ताली बजा और हाथ हिला कर मेरा ध्यान खींचा, और उसके इस व्यवहार भर से मैं आश्वस्त हो गया कि मेरा माफीनामा आधा तो कबूल कर लिया गया है, अब जो बचा है वह बस ‘किंतु परंतु’ भर होगा। तन्वी मुझसे उम्र में छोटी है, लेकिन पढ़ने-लिखने और समझ में कमतर कतई नहीं है। मेरी तरह बिंदास है। कुछ भी, जो उसे सही लगता है कह-बोल सकने का साहस उसमें है। बेटी होने के पहले वह एक संस्थान में अधिकारी थी, जो काम उसने बाद में छोड़ दिया। उसके पति एक सफल व्यवसायी हैं। इस तरह उसका अपनी तरह का होना निभ जाता है। अपनी तरह का होना, यानी उसकी उन्मुक्तता, जो उसकी अपनी प्रकृति के अनुकूल है।  वह जिस बेंच पर बैठी थी उसके सामने एक खाली मैदान था, जिसमें बच्चे खेल रहे थे। तन्वी के हाथ में कोई किताब नहीं, एक डायरी थी और अंगुलियों के बीच फंसा कलम। मुझे आता देख उसने कलम को डायरी के खुले हुए पन्नों के बीच पुस्तक चिह्न की तरह रख कर डायरी बंद कर दी और किलक पड़ी।

‘मजा आ गया… मैं चाह ही रही थी कि कोई साथ आकर जुड़े।’
‘क्यों। कोई खास बात?’
‘हां, एक कहानी कल रात ही पूरी की है। साथ लाई हूं। उसे ही पढ़ रही थी कि कहीं फांक मिले तो पूर दी जाय… सुनोगे?’
‘हां… क्यों नहीं।’ मैंने उत्सुकतापूर्वक कह तो दिया, लेकिन मेरा मन एक अजीब से भाव से भर उठा। कल रात का जमघट ही करीब साढ़े सात बजे खत्म हुआ था, वह भी तन्वी से मेरी तकरार के साथ, जो भले करीब पांच मिनट को चली थी, लेकिन उसका असर इतनी जल्दी खत्म हो जाने वाला था क्या, कि तन्वी मेरे घर से, जहां हमारी प्राणवायु की बतकही चल रही थी, वहां से बीस मिनट में अपने घर पहुंचे, और घरेलू काम निपटा कर अपनी कहानी पर लौट जाए, बिना किसी मानसिक व्यतिक्रम के। खैर, उसने कहानी सुनानी शुरू कर दी।

तन्वी की कहानी एक ऐसी लड़की के बारे में थी, जो नर्तकी बनाना चाहती थी। उस लड़की का पति एक शौकिया पर्वतारोही था और एक बीमा कंपनी में अधिकारी था। एक बार वह लड़की अपने पति के साथ एक पर्वतारोहण अभियान पर निकली, लेकिन बीच में एक गांव में रुक गई। वह गांव कुछ दिन पहले हुए भूस्खलन की तबाही से गुजर रहा था। कुछ ही देर के अहसास में उस लड़की ने वहीं ठहर जाने का निर्णय लिया। उसने अपने पति को यह कह कर आगे जाने दिया कि वह वहीं से घर लौटेगी। कब, यह तय नहीं है। इस तरह वह लड़की उस गांव में लोगों की त्रासदी के बीच एक होकर रहने का अनुभव बटोरने लगी।

वह लड़की दस दिन बाद घर लौटी। इस बीच उस लड़की का एक महत्त्वपूर्ण नृत्य समारोह था, जो छूट गया। उसमें लड़की की नृत्य प्रस्तुति होनी थी और वह इस आयोजन की आतुरता से प्रतीक्षा कर रही थी। लौटने पर लड़की के पति ने उससे यह अवसर चूक जाने का जिक्र किया, तो उसने हंसते हुए जवाब दिया, ‘नृत्य का सुख केवल पैर में घुंघरू बांध कर मंच पर थिरकने से नहीं मिलता राघव, वह उस थिरकन से मिलता है, जो मन के आवेग से जुड़ कर पैदा होती है। मुझे वह सुख वहां उस गांव में मिला।… सच में, तृप्ति का व्याकरण बंधे-बंधाए फार्मूले के सहारे नहीं साधी जा सकती। उसके लिए निर्बाध होना पड़ता है।’
अपने विस्तार और बारीकियों से इतर कहानी इतनी भर थी। कहानी का शीर्षक तन्वी ने ‘थिरकन’ बताया था और वह मुझसे जानना चाहती थी कि ‘निर्बाध’ शीर्षक कैसा रहेगा? उसका मन ‘निर्बाध’ की ओर झुकता जैसा लग रहा था। जितनी देर तन्वी कहानी पढ़ कर सुना रही थी, मैं उसके चेहरे पर तैरती-उतराती लहरों को देख रहा था। वहां एक तन्मयता थी, यह संवाद देते हुए कि वह कहानी पढ़ नहीं रही है, बल्कि उस लड़की के साथ, उस गांव में वहां के परिवेश का अनुभव जी रही है।

कहानी पढ़ चुकने के बाद तन्वी ने पहले मुझसे शीर्षक के बारे में जिज्ञासा की और बात वहीं ठहर गई। बेहतर हुआ कि उसने मुझसे कहानी के बारे में मेरी विस्तृत टिप्पणी की मांग नहीं की। सचमुच मैं उस स्थिति में नहीं था, मेरे दिमाग में तो मेरा माफी प्रसंग चल रहा था, जिसकी राह अभी तक नहीं बनी थी। मेरे दिमाग में शांतिस्वरूप की ललकार भी थी, जो कल रात उसने एक गरम सलाख से मेरे भीतर दाग दी थी। तन्वी मेरा चेहरा देख कर निर्बाध और थिरकन की बारीक परतें खोल रही थी, और यह वृत्तांत मेरे भीतर शांतिस्वरूप द्वारा रोपे गए अपराधबोध और द्वंद्व को और गहरा कर रहा था।

द्वंद्व सचमुच था। निस्संदेह मैं तन्वी से ऊंची आवाज में लड़ पड़ा था और उसने भी टक्कर देते हुए तेवर दिखाया था। लेकिन इस प्रसंग में मेरे भीतर मेरा अपना अपराधबोध नहीं था, बल्कि एक तृप्ति का अहसास था कि मैंने अपना मत, तन्वी के सामने ही नहीं सबके सामने साफ कर दिया है, भले तन्वी तस्वीर के दूसरे स्वतंत्र रुख का सामना कर रही है।  कहानी पाठ खत्म करके तन्वी सामने खेलते बच्चों को देखने लगी। बच्चे कच्ची जमीन पर चौकोर आकृति बना कर इक्कल दुक्कल खेल रहे थे। देखते-देखते तन्वी उनके खेल में ड़ूबने लगी और फिर यकायक उठ खड़ी हुई, ‘आओ अशोक।’

पल भर में तन्वी उन बच्चों के बीच थी। एक लड़की के आउट होने के बाद तन्वी ने उससे निहायत सहज ढंग से सपाट चौरस गिट्टी ले ली और खेलना शुरू कर दिया। बच्चे उस चौकोर आकृति के कुछ और पास घिर आए और मैं मुस्काता हुआ यह दृश्य देखता रहा। दो घर पार कर लेने के बाद तन्वी तीसरे घर के लिए गिट्टी फेंकते हुए आउट हुई। उसने हंसते हुए गिट्टी उठाई और एक बच्चे को सौंप कर अपनी बेंच की ओर चल दी।
हम दुबारा वहीं आकर बैठ गए। अब तन्वी ने सवाल किया, ‘इधर कैसे निकले थे?’

‘तुम्हारे पास ही आया था, कल के लिए माफी मांगने।’
‘अरे!’
‘हां। कल मैं बहुत गुस्से में आ गया था…’
‘मैं भी तो…’
‘मैं बहुत जोर से बोल रहा था…’
‘मैंने भी क्या तुम्हें कम सुनाया था।’
‘मैंने किताब उठा कर फेंक दी थी।’
‘फिर वापस भी तो ले ली थी बच्चू। उठा कर माथे से लगाई थी।’
‘सब एकदम सकते में आ गए थे।’
‘तो क्या हो गया?’
‘नहीं, मुझे खुद पर काबू रखना चाहिए था।’

‘ये क्या शांतिस्वरूप जैसी बात कर रहे हो। गुस्सा आया, उतार दिया। गाली-गलौज तो नहीं हुआ न, और होता भी तो हम चौराहे पर थोड़ी थे।’
तन्वी अब भी हंस रही थी। उसने शांतिस्वरूप का नाम लिया था, वह भी इस ढंग से, क्या शांतिस्वरूप ने तन्वी से भी कुछ कहा है।’  ‘क्या सोचने लगे अशोक? प्राणवायु ग्रहण करने वाले व्यक्ति हो और इतना बंधे हुए हो? बतकही का मतलब भी नहीं जानते। वह सिर्फ प्लीज और थैंक्यू नहीं होता।’

मैं चुप रह गया, लेकिन मेरे भीतर शांतिस्वरूप घुमेर उठाने लगा। कल रात ही, करीब दस बजे उसका फोन आया था। पहले तो उसने देर रात में फोन करने पर ‘सॉरी’ कहा और फिर तन्वी के साथ मेरे अभद्र व्यवहार पर बरस पड़ा। बुरा-भला उसने तन्वी के लिए भी कहा, लेकिन उसका बड़ा आरोप मुझ पर ही था। उसने मुझसे पूछा, ‘क्या तन्वी अगली बार कभी जमघट में आएगी?’ और फिर खुद ही उत्तर दिया, ‘उसे नहीं आना चाहिए। उसे इतनी बहस भी नहीं करनी चाहिए थी। उसकी जगह मैं होता तो बस चुपचाप उठ कर चल देता और वह जाना बतकही से अलविदा लेना होता।’

‘क्या सोचने लगे अशोक? शांतिस्वरूप सोचने लगे क्या? वह तो मर्यादावादी है। भीतरी बाहरी स्वातंत्र्य की अवधारणा उसमें नहीं व्यापती। लेकिन वह पारदर्शी है, उसका लिखना-बोलना और व्यवहार सब पारदर्शी है, इसलिए वह निर्बाध है। तुमने और मैंने अपनी-अपनी भड़ास एक-दूसरे पर निकाली और उसने अपना आवेग तुम पर खाली कर दिया। कोई अंतर नहीं है। उसे भी ‘सॉरी’ कहने की कोई जरूरत नहीं थी। खैर।’तन्वी की इस बात से मैं कुछ द्रवित हुआ।

‘सच कहता हूं तन्वी। घर, दफ्तर, पारंपरिक समाज, इस सबसे इतर मैं इस खोज में था कि कोई तो जगह ऐसी हो, जहां हम निर्बाध हंस-बोल कह सकें। आपे से बाहर हो सकें। लड़ सकें, आवेग में आकर किसी दूसरे से लिपट सकें। अपने विगत की कोई याद आई बात, या भीतर की कोई वाहियात-सी इच्छा भी साझा कर सकें। दरअसल, बतकही का दरवाजा मैंने इसीलिए खोला था। इसी उम्मीद से मैं जमघट से जुड़ा था कि यहां अब तक की उम्र का अनुभव, बिंदास मन और किलकते बचपन का समागम एक साथ जिया जा सकेगा। कोई गाएगा, कोई ठठाएगा, और मैं फूल वाले प्रिंट का कुरता पहन कर आऊंगा तो कोई ठठ्ठा भले करे, मुंह नहीं सिकोड़ेगा।’

अचानक ताली बजा कर उठ खड़ी हुई तन्वी, ‘ओह अशोक, तुमने तो मेरी दुविधा ही दूर कर दी। अब मैं अपनी कहानी का शीर्षक ‘निर्बाध’ ही रखूंगी। और तुम घोषणा कर देना, बतकही के अगले ही जमघट में मेरी इस कहानी का पाठ होगा। और सुनो, शांति स्वरूप से कुछ मत कहना, वह सही अर्थ में निर्बाध भले न हो, लेकिन निर्मल है। समझ गए न।’ मैं अब उस पार्क से बहुत आनंदित मन लिए अपने घर लौट रहा हूं।

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First Published on November 20, 2016 1:10 am

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