ताज़ा खबर
 

कहानी- महाविस्फोट

और तभी वह हुआ जो उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। वह दरवाजे के बीचो-बीच जड़ होकर खड़ी रह गई। अगले ही पल अंदर का दृश्य उसकी आंखों को गरम सलाखों की तरह भेद कर दिमाग में ज्वार की तरह चढ़ आया और एक विस्फोट सुनीता के पूरे वजूद में आग की-सी तेजी से भभक कर फैल गया।
Author July 16, 2017 00:27 am
प्रतीकात्मक चित्र।

प्रितपाल कौर

फाइल पर आखिरी टिप्पणी लिख कर, झटके से फाइल बंद की और सामने दीवार पर लगी घड़ी पर नजर डाली। साढ़े छह बज चुके थे। उसे खुद पर गुस्सा आया। वह जानती है कि उसके देर तक रुके रहने से कुछ और लोगों को असुविधा होती है। उनकी तीखी नजर और पीठ पीछे बोले जाते अस्पष्ट तीखे लफ्ज सुने तो नहीं, लेकिन अंदाजा है उसे। आज भी इसी अंदेशे ने उसे झटके से उठाया। खड़ी हुई, साड़ी का पल्लू ठीक किया, हैंडबैग कंधे से लटकाया और चल पड़ी। उसके कमरे के बाहर बैठा कर्मचारी शायद दरवाजे के हैंडल की क्लिक से सजग हुआ था। सुनीता ने उड़ती-सी नजर उस पर डाली, वह खड़ा तो हुआ था, लेकिन पैर अभी स्थिर नहीं हुए थे, कमर कुछ झुकी-सी थी। अभी सावधान खड़े होने की प्रक्रिया चल ही रही थी। वह उसके अभिवादन का उत्तर देती हुई तेज कदमों से आगे बढ़ गई। कनखियों से उसने देखा, उसका अलसाया चेहरा पल भर को चुस्त हुआ और फिर उसी ढहते हुए से जिस्म में घुल-मिल कर लटक गया। सुनीता ने महसूस किया उसके पीठ फेरते ही वह कुर्सी पर लगभग ढह गया था। जबकि उसे उम्मीद थी कि वह तुरंत उसके दफ्तर के दरवाजे को ताला लगाएगा और घर जाने की तैयारी में जुट जाएगा। सीधे-सादे रत्तीराम पर उसे दया भी आती है। उसे नौकरी पर आए कुछ महीने ही हुए हैं। अस्थायी है, इसलिए ऐसा सिटपटाया-सा रहता है। वह जानती है कि स्थायी होते ही यूनियन वालों के हत्थे चढ़ जाएगा। फिर उसकी भाव-भंगिमा भी बदल जाएगी। तब खुद उसके मन में भी रत्तीराम के लिए सहानुभूति बची नहीं रह जाएगी। बल्कि उसकी मौजूदगी को नकारते वह इन्हीं ढेरों-ढेर फाइलों में मगजपच्ची करती अपने हस्ताक्षरों की चिड़ियां बैठाती रहेगी।

सोच कर ही अजीब आनंद से भर गई वह। सुनीता पर काम नशे की तरह हावी रहता है। जब काम नहीं कर रही होती, तो लोगों के बारे में सोचती रहती है। अब इस वक्त भी रत्तीराम को लेकर यह सब ऊटपटांग सोचना! उसे खुद पर हंसी आ गई। सिर को एक और झटका देकर कंधे पर लटका बैग ठीक किया, तो याद आया कि सुभाष को उसकी यही बात बहुत पसंद है। ‘तुम सिर को ऐसे झटकती हो तो यों लगता है जैसे ढेर सारा पानी अचानक आसमान से मेरे ऊपर आ पड़ा हो, छल छल करता।’ सुनीता की मुस्कुराहट चौड़ी हो आई।
तभी पीछे दरवाजे बंद होने, ताले लगने की आवाजें और बातचीत के टुकड़े कानों में पड़े। स्टाफ के लोग होंगे। सोचती सीढ़ियों से नीचे उतर आई। ग्राउंड फ्लोर पर पहुंचते ही उसे देख कर रिसेप्शन काउंटर पर मौजूद मेहता फोन पर बात करता हुआ अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। इस आठ माले की बिल्डिंग में कई सरकारी दफ्तर हैं, जिसकी भी ड्यूटी रिसेप्शन पर हो, वह फोन कॉल्स के बोझ तले दबा रहता है। एक पल की भी फुर्सत नहीं। इसके बावजूद मेहता का मूड हमेशा अच्छा रहता है। उसका चेहरा हर वक्त खिला रहता है। इस वक्त उसके होठों की हरकत से लगा, उसने माउथ पीस में कहा, ‘एक्सक्यूज मी’ और बार्इं हथेली से उसे ढक कर बेहद खिले हुए स्वर में बोला, ‘गुड इवनिंग मैडम, वर्किंग लेट अगेन!’
सुनीता को अधेड़ वय का बाल-बच्चेदार दीखता मेहता बहुत पसंद है। हर वक्त खिला-खिला चेहरा, जैसे परेशानियां उसके घर का रास्ता जानती ही नहीं। सुनीता की थकान और सुस्ती पल में काफूर हो गई। मन किया, रुक कर मेहता से ढेर सारी बातें करे। पर फिर याद आया कि सुभाष आज घर पर है। उसने दफ्तर से छुट्टी के लिए छुट्टी ली है। उसकी इस बात पर सुबह कितना हंसी थी सुनीता।

अब तक दो फिल्मों देख चुका होगा, गजलों की सीडी सुनते हुए शाम की ड्रिंक के साथ उसका इंतजार करता हुआ उकता चुका होगा। लेकिन एक बात है, कितना भी बोर हो, उसकी याद में परेशान हो, उसे दफ्तर के वक्त फोन नहीं करता। इस बात का खयाल पति-पत्नी दोनों रखते हैं। काम के वक्त एक-दूसरे को कतई डिस्टर्ब नहीं करते।  अभी सुनीता ने सोचा कि बाहर निकल कर एक बार फोन करेगी, लेकिन फिर सोचा कि रहने दो। घर जाकर सीधे गले लग लिया जाए। बातों से क्या होना है? अब देर हो ही गई है तो आधा घंटा और सही। अभी मेहता के अभिवादन के प्रत्युत्तर में कुछ चौड़ी मुस्कराहट चेहरे पर रखे उसने कहा था, ‘वैरी गुड इवनिंग मिस्टर मेहता। इवनिंग शिफ्ट?’ सुनीता की मुस्कराहट को उसी जोश के साथ लौटाते हुए मेहता ने कहा था, ‘यस मैडम।’ तेज चाल से वह कार पार्किंग तक आई थी। उसके दफ्तर की ऊपरी मंजिल वाले सूचना केंद्र की सफेद एंबेसडर का ड्राइवर समय काटने के लिए गाड़ी को कपड़े से रगड़-रगड़ कर चमका रहा था। वह मुस्कुरा उठी। सोचा, पुरुषों को कितना शौक होता है गाड़ी चमकाने का। सुभाष को ही लो, उसकी काली गाड़ी पर जरा-सी भी धूल नजर आ जाए तो फौरन डस्टर हाथ में लेकर शुरू हो जाता है। हालांकि नौकर हरी हर सुबह पूरा एक घंटा दोनों गाड़ियों को साफ करता है। वैसे इस एक घंटे में सुनीता की गाड़ी के हिस्से पंद्रह मिनट ही आते हैं। उसके बावजूद अक्सर हरी को सुभाष की डांट पड़ जाती है। कारण कि कहीं न कहीं कोई धूल का कण रह जाता है।

कई बार तो ऐसा भी हुआ कि सुभाष की गाड़ी चमकाने में हरी इतना खो गया कि सुनीता की गाड़ी का नंबर ही नहीं आया। वह दफ्तर जाने के लिए घर से निकली और हरी सुभाष की गाड़ी पर लगा हुआ था। ऐसे में सुनीता को गुस्सा भी बहुत आता है। भुनभुनाती-सी वह हरी से डस्टर छीन कर अपनी गाड़ी का विंड स्क्रीन पोंछ कर निकल लेती है। हरी खड़ा मैडम का गुस्सा देखता है और फिर साहब की गाड़ी पर पिल पड़ता है। अब दोनों को तो नाराज कर नहीं सकता। मैडम तो आज नाराज हो ही गर्इं। कल मैडम की गाड़ी पहले साफ करेगा। कुछ दिन ठीक चलता है। फिर किसी दिन कोई कमी रह जाती है, सुभाष की डांट पड़ती है और फिर हरी गफलत कर बैठता है। यह कभी न खत्म होने वाला सिलसिला बन गया है।
गाड़ी स्टार्ट करते ही सुनीता को याद आया कि आज शुक्रवार है। यानी वीकेंड शुरू। शनिवार का दिन सुनीता के लिए बाकी पांच दिनों जैसा ही दौड़-भाग भरा होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह भाग-दौड़ घर के अंदर ही रहती है। वैक्यूम क्लीनर से कालीन, दीवारें और छतें साफ करना। खिड़कियां, दरवाजे हरी से साफ कराना, फर्नीचर को चमकवाना, परदे बदलना, टूटे बटन टांकना, हफ्ते भर के लिए खाने की तैयारी करना। वाशिंग मशीन में कपड़े धोना, हरी से आयरन करवाना, ड्राई क्लीनिंग के कपड़े भेजना और शाम को हफ्ते भर की शॉपिंग के बाद किसी रेस्तरां में खाना खाना। सब काम दोनों मिल कर करते हैं और प्यादा होता है उन्नीस साल का बच्चा-सा दिखता हरी।

मध्यवर्गीय परिवार की गृहणी, सुनीता की मां जब उनकी शादी के कुछ महीनों बाद एक हफ्ते के लिए आर्इं, तो अवाक देखती रह गई थीं। उन्होंने तो अब तक यही देखा था कि मर्द बाहर का काम करते हैं, जिसमें पैसा कामना मुख्य काम है, बाकी सब औरतें ही संभालती हैं। सुनीता और सुभाष को यों कंधे से कंधा मिला कर घर में हर काम करते देख काफी कुछ सोचती रहीं। एक दिन सुनीता को अपने पास बिठा कर सिर पर स्नेह से हाथ फेरती हुई बोली थीं, ‘बेटा, ऐसा पति भाग से मिलता है। बहुत खयाल रखना इसका। कितना चाहता है तुझे। मरद होकर घर के सारे काम में साथ लगा रहता है।’मां ही क्यों, वह खुद भी नाज करती है सुभाष पर। दूसरे पतियों की तरह नहीं है वह। हर बात में सुनीता का खयाल रखता है, सिर्फ गाड़ी चमकाना छोड़ कर। हंसी आ गई उसे। खुल कर हंस पड़ी। टैक्स विभाग में ऊंचे पद पर तैनात सुनीता को अपना करिअर सुभाष के भरोसे ही चलता दिखाई देता है।

सुभाष का खयाल आया तो दिल खिल उठा और चेहरे पर एक मीठी-सी मुस्कान आ गई। ‘साइड व्यू मिरर’ को खोलते हुए उसने खुद को देर तक निहारा। चमकीली भूरी आंखें, सुतवां नाक, थोड़े मोटे, लेकिन बेहद खूबसूरत भरे-भरे होंठ, गुलाबी रंगत, कंधों तक झूलते रेशमी घने घुंघराले बाल। अपने आप पर मोहित हो उठी। रास्ते भर खुद में खोई सुनीता जब घर के पास पहुंची, तो देखा घड़ी सात बजा रही थी। तभी अचानक याद आया, आज दफ्तर में काम ज्यादा था, सोमवार की मीटिंग के लिए प्रोजेक्ट रिपोर्ट फाइनल करनी थी, इसलिए उम्मीद नहीं थी समय पर घर आने की। इसलिए सुबह ही कह दिया था सुभाष से कि शाम को आठ बजे से पहले नहीं आ पाएगी। रोज ही दोनों को घर पहुचते-पहुंचते सात बज जाते हैं। कॉरपोरेट में सीनियर मैनेजर सुभाष की भी व्यस्तताएं कम नहीं हैं। कई बार तो पार्टी में होता है, तो देर रात को आता है।
आज सुनीता का टाइपिस्ट बहुत फुर्ती से काम कर रहा था, सो एक घंटा पहले ही घर पहुंच गई। बेहद खुश है। आज मूड कुछ ज्यादा ही अच्छा है सुनीता का। कोई खास वजह नहीं, बस यों ही। घर की तरफ तेजी से लपकती, सड़क का तीखा मोड़ वैसी ही तीखी स्टीयरिंग की काट से काटती सुनीता आज सुभाष को सरप्राइज देने के मूड में है। घर जल्दी आ जाने का। मोड़ मुड़ते ही दूर से दिख गई थी नलिनी दी की मैरून होंडा सिटी। मन खिल उठा। सुभाष की रिश्ते की बहन नलिनी दी, रेल मंत्रालय में ऊंचे ओहदे पर हैं। अमीर कारोबारी परिवार की नलिनी ने शादी नहीं की है। करने का इरादा भी नहीं है उनका। कहती हैं, ‘शादी की उम्र तीस तक ही होती है। तब तक कोई भा जाए तो ठीक, वरना अकेले रहने की ऐसी आदत हो जाती है कि फिर किसी और के साथ रहना सजा है। सो, मैं तो सजा नहीं काटूंगी।’

परिवार का दबाव भी नहीं है, सो आजाद हैं। जिंदगी अपनी शर्तों पर, अपने हिसाब से जीती हैं। नलिनी दी से मिलने की उम्मीद से सुनीता की खुशी कुछ और बढ़ गई। वीकेंड की पहली शाम अच्छी रहेगी आज। खुशमिजाज नलिनी सुनीता को बहुत पसंद हैं। उनके कॉलेज के जमाने में जमाल खान से चला रोमांस और उसी से शादी करने की जिद के चलते अविवाहित रह जाना, यह सारी कहानी सुभाष से सुन चुकी है सुनीता। काफी दिनों से दीदी से मिलना नहीं हुआ था। लगता है अभी आई होंगी। चलो कुछ देर उनके साथ गप्पें हो जाएंगी। और फिर उनके साथ डिनर के लिए कहीं बाहर जाने का प्रोग्राम बना लिया जाएगा। कब से उधार है एक डिनर। छह महीने पहले सुभाष का प्रमोशन हुआ है, तबसे कभी उसके पास वक्त नहीं होता, कभी सुनीता को तो, कभी नलिनी को। नलिनी दी की गाड़ी के पास से गुजरते हुए अपनी निर्धारित जगह पर गाड़ी पार्क करके बाहर निकलने से पहले बैग से घर की चाभी निकाल ली। दोनों बैठे होंगे हॉल में ताश खेलते या फिर गजलें सुनते। एकदम से जाकर बच्चों की तरह ‘हौव्वा’ कह कर उन्हें डराएगी।

यही सोच कर बाहरी गेट अहिस्ता से खोला और बंद किया, ताकि आवाज भीतर तक न जाए। दरवाजे के पास तक दबे कदमों से गई, दाहिना कान लगा कर सुना- कोई आवाज नहीं।
की होल में चाभी डाली, घुमाई, हलके से हैंडल घुमा कर थोडा-सा दरवाजा ठेल कर भीतर झांका। हॉल में कोई नहीं था। घनघोर सन्नाटा। हैरान सुनीता अपने पीछे हलके से दरवाजा बंद करके अंदर आ गई। ‘कहां हैं दोनों?’हैरान सुनीता ने अब अपने पैरों की आहट छिपाने का कोई जतन नहीं किया, लेकिन कालीन का गुदगुदापन उसकी आहट को छिपा गया था। तभी हल्की-सी सम्मिलित हंसी उसे अपने बेडरूम के बंद दरवाजे से आती हुई सुनाई दी। हूं! तो आज बैठक आज वहां जमी है। एक पल पहले आई मायूसी और हैरानी को फिर से उल्लास में बदलने में पल भी नहीं लगा था। सुनीता लपकी बेडरूम की तरफ और एक ही झटके में फटाक से दरवाजा खोल दिया। और तभी वह हुआ जो उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। वह दरवाजे के बीचो-बीच जड़ होकर खड़ी रह गई। अगले ही पल अंदर का दृश्य उसकी आंखों को गरम सलाखों की तरह भेद कर दिमाग में ज्वार की तरह चढ़ आया और एक विस्फोट सुनीता के पूरे वजूद में आग की-सी तेजी से भभक कर फैल गया। उसके हाथों-पैरों में इस कदर जलन होने लगी कि जी किया उन्हें उसी वक्त एक पल भी बिना गवाए काट कर कहीं फेंक दे। दरवाजे का खुलना था कि बिस्तर पर इत्मीनान से लेटे हुए दो जिस्म झटके के साथ उठ खड़े हुए थे। उनकी नजदीकी का बायस उनकी जिस्मानी हकीकत थी, जो उस वक्त बेहद खुले और उघड़े हुए ढंग से बयान हो रही थी।

दोनों के जिस्मों पर जो एक चादर ढकी हुई थी वह अब सुनीता के देख लिए जाने के बाद सरक कर एक किनारे से नीचे गिर चुकी थी। वे दो जिस्म इस अचानक हुए खुलासे के झटके से अपनी हद में वापस आने को उतावले थे, लेकिन हालात ऐसे थे कि कुछ किया नहीं जा सकता था। दरवाजे के बीचो-बीच मूर्ति बनी खड़ी सुनीता की सारी खूबसूरती एक ही पल में स्वाहा हो गई थी। निर्जन उचाट चेहरे पर न आंखें बची थीं, न कान। उसका मुंह भी चेहरे से गायब हो गया था। वहां सिर्फ एक काली-सी परछार्इं बची थी। उसके होंठ कमरे की तपतीहवा ने सिल दिए थे। वरना शायद वह कोई सवाल करती सुभाष से या निलिनी से। लेकिन क्या सवाल करती? इन सवालों के कोई जवाब हुआ करते हैं भला?  खड़े रह कर भी क्या करती दरवाजे के बीचो-बीच? यह दरवाजा तो अब टूट चुका था। एक अदृश्य दीवार वहां आ खड़ी थी, जिसके आरपार सिर्फ सुनीता देख सकती थी। उसने अपनी जलती हुई आंखें उठा कर देखा तो सिर्फ घनघोर अंधेरा नजर आया। वह चुपचाप वहां से हट गई। दिमाग में कुछ नहीं था सोचने के लिए। कुछ भी नहीं।
यह विस्फोट सृष्टि के आरंभ का था या अंत का, सुनीता तय नहीं कर पाई। सृष्टि का विनाश इसी तरह होता है, एक ही पल में और उद्भव होता है तो वह भी विस्फोट के ही साथ। महाविस्फोट- बिग बैंग के नाम से। सुनीता का जीवन इन दोनों विस्फोटों के बीच मानव मन की विकृति के अंधकार भरे सन्नाटे में खो गया था। उसने अपने थके हुए पैरों को घसीट कर गेस्ट रूम तक किसी तरह ठेला और फिर अपने वजूद की तलाश से बचने के लिए बिस्तर पर ढह गई। ०

 

 

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग